चुप्पी बन गयी है लोया केस का ट्रेड मार्क! परिवार के बाद अब फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ.शर्मा ने साधा मौन

ख़ास रपट , नई दिल्ली, सोमवार , 12-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

 (‘दि कारवां’ में छपी अतुल देव की रिपोर्ट का हिंदी में अनुवाद)

नई दिल्ली। 

डॉ. आरके शर्मा: वह एडिशनल सेशन जज थे?

अतुल देव: वह स्पेशल सीबीआई कोर्ट के जज थे सर।

डॉ. आरके शर्मा: वो उन्हें क्यों नहीं अच्छे अस्पताल में ले गए? नागपुर तो अस्पतालों से भरा है। नागपुर छोटा है। 

अतुल देव: मैं एम्स और दूसरी जगहों पर गया था लेकिन वहां कोई बातचीत करने के लिए तैयार नहीं है।

डॉ. आरके शर्मा: वो नहीं बात करेंगे। वो नहीं बात करेंगे। वो बीजेपी समर्थक हैं।

अतुल देव: सुधीर गुप्ता? मैंने उनसे बातचीत की। जब मैंने उनसे बात की तो उन्होंने बताया कि वह दिल्ली से बाहर हैं। ऐसे में सर, क्या मैं इसको लिख सकता हूं? आपके नाम का इस्तेमाल करके? केवल सावधानी बरतने के लिहाज से। एक बार मैं स्टोरी लिख लेता हूं और आपके कथन को भी फ्रेम कर लेता हूं। तो उसे ह्वाट्सएप या मेल किस पर भेजना ठीक रहेगा? 

डॉ. आर के शर्मा: इसे ह्वाट्सएप पर ही भेज देना।

अतुल देव: मैं उसे ह्वाट्सएप पर ही भेज दूंगा। केवल पुष्टि के लिए। और अगर आप चाहते हैं तो मैं उसको मेल भी कर सकता हूं। ठीक है।

डॉ. आरके शर्मा: ये मामला एक जांच की मांग करता है।

महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत की जांच का विरोध करने के क्रम में साक्ष्यों को निर्मित करने के अपने पुराने रवैये, जिसमें पत्रकारों को पूर्व में दिए गए बयानों को बदलने, उसे तोड़ने मरोड़ने या फिर पूरी तरह से वापस लेने की बातें शामिल हैं, के साथ अपनी बहस को जारी रखा। राज्य का कहना था कि देश के सबसे बड़े मेडिको-लीगल विशेषज्ञों में से एक आरके शर्मा - जिन्होंने मुझे पहले के एक साक्षात्कार में बताया था कि लोया की मौत से जुड़े मेडिकल दस्तावेज दिल के दौरे का कोई लक्षण नहीं दिखाते हैं- पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। राज्य ने कहा कि शर्मा की एक पत्रकार से केवल औपचारिक बातचीत हुई थी और उन्हें संदर्भ से बाहर कोट किया गया था। पहले की गवाहियों की तरह इस बार भी राज्य की शर्मा के बारे में राय को उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आसानी से खारिज किया जा सकता है। 

11 फरवरी को ‘दि कारवां’ ने दिल्ली एम्स के फोरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलाजी डिपार्टमेंट के पूर्व हेड और 22 वर्षों से इंडियन एसोसिएशन ऑफ मेडिको लीगल एक्सपर्ट्स के अध्यक्ष रहे शर्मा को कोट करते हुए एक लेख प्रकाशित किया था। शर्मा ने मुझे बताया कि “हिस्टोपैथोलाजी रिपोर्ट में मायोकार्डियल इन्फ्राक्शन के कोई प्रमाण नहीं हैं।” “इस रिपोर्ट से निकली चीजें दिल के दौरे का इशारा नहीं करती हैं”। लेख के आधार पर एक गैर लाभकारी कानूनी समूह सेंट्रल फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) ने सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई में हस्तक्षेप कर अपना पक्ष रखने का एक आवेदन दे दिया। जिसमें उसने जज लोया की दिल के दौरे से मौत की आशंका को खारिज करने वाली मेडिकल विशेषज्ञों की राय को पेश करने की इच्छा जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने 8 और 9 मार्च को सीपीआईएल के आवेदन पर सुनवाई की। आपको बता दें लोया के मौत की जांच की मांग वाली याचिकाओं के एक समूह की यही बेंच सुनवाई कर रही है,

सुप्रीम कोर्ट के सामने महाराष्ट्र सरकार द्वारा अपनी रक्षा में निचोड़ के तौर पर अंतिम समय में लोया के साथ रहने का दावा करने वाले चार जजों और जज लोया के परिवार से हासिल गवाहियां हैं। सुनवाई के दूसरे दिन पूर्व एटार्नी जनरल और यहां कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे मुकुल रोहतगी ने कहा कि “अगर इन चार जजों पर विश्वास किया जाए तो ये केस आज ही खत्म हो जाएगा।” इन गवाहों की पवित्रता ही रोहतगी की पूरी बहसों का एकमात्र सूत्र रहा है- इसने ही राज्य की बहस का पूरा आधार तैयार किया है। 9 मार्च को शर्मा की मेडिकल ओपिनियन को खारिज करने के लिए रोहतगी ने मुंबई आधारित फोरेंसिक मेडिसिन एंड टाक्सिकोलाजी के प्रोफेसर एचएम पाठक की एक रिपोर्ट पेश कर दी जिसने हर उस चीज को खारिज कर दिया जिसे शर्मा ने हमें बताया था। 

मैंने शर्मा से नेहरू प्लेस में स्थित उनके दफ्तर में 10 फरवरी को मुलाकात की थी। उसके पहले हमने फोन पर बात की थी और शर्मा मेडिकल दस्तावेजों को देखना चाहते थे और मुझे अपनी एक्सपर्ट ओपिनियन भी देना चाहते थे। एम्स के फोरेंसिक डिपार्टमेंट के तकरीबन सभी डाक्टरों के केस के बारे में बोलने से इनकार करने के बाद भी वो इसके लिए तैयार थे। रिपोर्टों को देखने के बाद शर्मा ने मुझे बताया कि “पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक ड्यूरा सिकुड़ गयी है।” उन्होंने आगे कहा कि “ड्यूरा मैटर हमारे मस्तिष्क को चारों तरफ से ढंकने वाली बाहरी पर्त है। ट्रौमा के केस में ये क्षतिग्रस्त हो जाती है जो मस्तिष्क पर किसी तरह के घातक चोट की तरफ इशारा करती है। एक शारीरिक चोट।” पूरी बातचीत की आडियो रिकार्डिंग कारवां के पास मौजूद है और उसके कुछ हिस्सों को इस स्टोरी के साथ प्रकाशित भी किया जा रहा है।

आर्टिकिल के प्रकाशित होने से पहले मैंने शर्मा से जुड़े हर कथन को ह्वाट्सएप के जरिये उनके पास भेजा था। इसमें उनका वो बयान भी शामिल था जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल के दौरे का कोई लक्षण नहीं है और यह कि उसमें जहर और मस्तिष्क पर शारीरिक हमले की आशंका है। इन सब चीजों को देखने के बाद उन्होंने उत्तर दिया था कि “ये सब ठीक है।” उसके बाद कुछ विवरणों की पुष्टि के लिए मैंने उनसे एक बार और बातचीत की। स्टोरी के प्रकाशित होने के बाद मैंने शर्मा को लिंक भेजने के साथ ही उनसे फोन पर बात भी की।

9 मार्च को बेंच के सामने बहस के दौरान सीपीआईएल का प्रतिनिधित्व कर रहे प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में आर्टिकिल को पढ़ा जिसका रोहतगी ने कड़ाई से विरोध किया। उन्होंने बेंच को संबोधित करते हुए कहा कि “मी लार्ड मैं इसमें नहीं जाना चाहता था।” “लेकिन वह लगातार उसी में जा रहे हैं और शर्मा, शर्मा, शर्मा कर रहे हैं। इस शर्मा ने अपना बयान वापस ले लिया है।”

उसके बाद भी प्रशांत भूषण ने अपना पक्ष रखना जारी रखा। चीफ जस्टिस ने रोहतगी से कहा कि “हम एक दूसरे से बहस नहीं कर सकते हैं।” और उनसे भूषण को अपनी बात रखने देने के लिए कहा। इस पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि “श्री भूषण हम आपके ही विचारों का पालन कर रहे हैं। कृपया इससे विचलित मत होइये।” प्रशांत भूषण ने अपनी बात जारी रखी। जिसमें उनका कहना था कि प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ उपेंद्र कौल की राय और आर के शर्मा के बयानों की रोशनी में ये विश्वास नहीं किया जा सकता है कि लोया दिल के दौरे से मरे थे।

रोहतगी जब बेंच को संबोधित करने के लिए खड़े हुए तो वो पहले क्या कहना चाहते थे उसे विस्तार से बताया। रोहतगी ने कहा कि “वो लगातार शर्मा, शर्मा, शर्मा करते रहे।” “अब देखिए क्या हुआ”। 

रोहतगी के मुताबिक आरके शर्मा को कोट करने वाली स्टोरी के प्रकाशन के बाद सुनील बोंडे- लोया के केस में नागपुर आधारित इन्वेस्टिगेटिंग आफिसर जो संयोग से बीजेपी नेता का भाई है- एम्स के डिपार्टमेंट आफ फोरेंसिक मेडिसिन के हेड डॉ. सुधीर गुप्ता के पास पहुंच गया। रोहतगी ने ये नहीं बताया कि बोंडे ने गुप्ता से क्या पूछा।  लेकिन उन्होंने आगे कहा कि बोंडे की पूछताछ के संबंध में गुप्ता ने स्टोरी में प्रकाशित राय के बारे में शर्मा से पूछा और उसके बाद शर्मा ने दावा किया कि उनकी मेरे साथ केवल एक औपचारिक बातचीत हुई थी और उन्हें संदर्भ से बाहर कोट किया गया है।

उनके दफ्तर जाने से पहले मैंने शर्मा से फोन पर बात की थी और वहां आने के पीछे के उद्देश्य के बारे में भी उन्हें बता दिया था। मैं मेडिकल दस्तावेज साथ ले लिया था। मुझसे बात करने से पहले उन्होंने उन दस्तावेजों का अध्ययन भी किया। हमारी बातचीत के दौरान जो तकरीबन आधे घंटे चली, मैंने शर्मा से पूछा कि एम्स का कोई शख्स मुझे क्यों अपनी ओपिनियन नहीं देना चाह रहा है। उन्होंने कहा कि “वो नहीं देंगे, वो नहीं देंगे।” “वो बीजेपी के समर्थक हैं।” मैंने उनसे पूछा कि “आपका मतलब डॉ. सुधीर गुप्ता से है?” उन्होंने हां के संकेतों के साथ सिर हिलाया। मेरे बातचीत करने के बाद उन्होंने स्टोरी में प्रकाशित सभी कोटों की ह्वाट्सएप पर भी पुष्टि की- इस बातचीत के स्क्रीन शॉट्स यहां नीचे दिए जा रहे हैं।

ये पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र सरकार ने अपने सामने रखे गए तथ्यों के जवाब में गवाहियां पेश की है। कारवां के लोया के मौत की संदेहास्पद परिस्थितियों से जुड़े परिवार के पक्ष को प्रकाशित करने के बाद, परिवार से एक सप्ताह तक कोई संपर्क ही नहीं हो सका। उसके बाद स्टेट इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट ने परिवार की तरफ से बयान जारी किया। परिवार के प्रत्येक सदस्य ने ऐसे बयान दिए जो कैमरे पर दिए गए उनके अपने बयानों को ही खारिज कर रहे थे। कहा जा सकता है कि लोया मौत की जांच के विरोध में राज्य के पास केवल और केवल गवाहियां हैं।   

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे दुष्यंत दवे ने इसके पहले की एक सुनवाई के दौरान कहा था कि “इन बयानों को दबाव में लिया गया है।” एक दूसरे बिंदु पर उन्होंने कहा था कि “पूरी राज्य मशीनरी आपको दबा रही है- कौन उस दबाव को सह सकता है?”

ढेर सारे कॉल करने और मैसेज भेजने के बाद भी डॉ. शर्मा ने उनका कोई जवाब नहीं दिया।

अतुल देव और आरके शर्मा के बीच बातचीत का ह्वाट्सएप शाट।

अतुल देव और आरके शर्मा के बीच बातचीत का ह्वाट्सएप शाट।









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