लोया विवाद के बाद मामले से जुड़े जज आये सामने,कहा-हाईकोर्ट को करनी चाहिए आदेशों की समीक्षा

इंटरव्यूु , , बुधवार , 14-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

(जस्टिस अभय एम थिप्से बांबे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज हैं। बांबे हाईकोर्ट का जज रहते उन्होंने सोहराबुद्दीन शेख मामले में जमानत की चार अर्जियों की सुनवाई की थी। इसमें पूर्व डीआईजी डीजी वंजारा, एटीएस गुजरात के पूर्व डिप्टी एसपी एम परमार, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के डॉ. नरेंद्र के अमीन और गुजरात पुलिस के एसआई बीआर चौबे शामिल थे। इनमें से अमीन को 2013 और वंजारा को 2014 में उन्होंने जमानत दी थी। लेकिन अब रिटायर होने के तकरीबन एक साल बाद उनका कहना है कि सीबीआई जज लोया की मौत के विवाद ने उन्हें फिर से पूरे मामले पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। लिहाजा अपने द्वारा पारित विभिन्न आदेशों का उन्होंने फिर से परीक्षण शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि इस मामले में बहुत सारी चीजें संदेहास्पद होने के साथ ही सामान्य सोच के बिल्कुल विपरीत हैं। उन्होंने पूरे मामले पर विस्तार से इंडियन एक्सप्रेस से बात की है। इंडियन एक्सप्रेस के मूल अंग्रेजी साक्षात्कार का यहां हिंदी में अनुवाद दिया जा रहा है। पढ़िए उनका पूरा साक्षात्कार-संपादक)

प्रश्न: किस चीज ने आपको कथित सोहराबुद्दीन फेक एनकाउंटर के मामले में बोलने के लिए प्रेरित किया?

जस्टिस थिप्से: जज लोया की मौत से संबंधित विवाद के बाद केस को लेकर मेरे भीतर विचार शुरू हो गया था। यही वजह है कि आदेशों को मैंने गौर से देखना शुरू किया। मामले की गंभीरता बढ़ती जा रही है। उसके बाद मैंने इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट पढ़ी जिसमें लिखा था कि गवाह लगातार पलटते जा रहे हैं। उसके बाद जब मैंने आदेशों को पढ़ना शुरू किया तो उनमें लोगों को बरी करने के मामलों में कई गैर स्वाभाविक चीजें दिखीं।

प्रश्न: सीबीआई जज लोया की मौत के विवाद को आप कैसे देखते हैं?

जस्टिस थिप्से: मैं मौत पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता हूं लेकिन इसे गैरस्वाभाविक बता पाना कठिन होगा। जिसमें मैं विश्वास नहीं करता हूं। लेकिन लोया के काल डिटेल रिकार्ड को जरूर देखा जाना चाहिए। जब किसी शख्स की रजिस्ट्री द्वारा नियुक्ति की जाती है तो उसे तुरंत कोई वापस नहीं भेज सकता है। ये बिल्कुल एक असामान्य चीज है। उसके पहले जेटी उत्पट (लोया से पहले के सीबीआई जज) का अचानक तबादला कर दिया गया। मैं क्यों कह रहा हूं अचानक? तबादले आम तौर पर तीन साल बाद किए जाते हैं जब तक कि कोई असामान्य परिस्थिति न खड़ी हो। वो अपना तीन साल का कार्यकाल नहीं पूरा कर पाए थे। क्या आपने सुप्रीम कोर्ट से इजाजत ली थी? जब उन्होंने अपने कार्यकाल का तीन साल नहीं पूरा किया था तो क्या कोई ऐसी परिस्थिति खड़ी हो गयी थी जिसमें उनके तबादले की जरूरत थी? जब उन्हें (सेशन जजों को) ले आया जाता है तो आम तौर पर उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त किया जाता है। क्योंकि वहां तीन साल के लिए स्थायित्व होना चाहिए। कभी-कभी कुछ मजबूरियों के चलते कार्यकाल नहीं पूरा हो पाता है। लेकिन यहां क्या उस तरह की परिस्थितियां खड़ी हो गयी थीं। उसे देखे जाने की जरूरत है। यहां तक कि अगर वो परिस्थितियां थीं भी तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया जाना चाहिए था। फिर सुप्रीम कोर्ट उसके मुताबिक अपने आदेश में परिवर्तन करता।

जज लोया की मौत की जांच के लिए प्रदर्शन।

प्रश्न:फेक एनकाउंटर केस में आपने क्यों चुप्पी तोड़ने का फैसला किया?

जस्टिस थिप्से: मैं बहुत असहज था क्योंकि मैंने केस को डील किया था और मैं सरसरी तौर पर मामले के तथ्यों को जानता था जैसा कि आरोपियों में से कुछ के जमानत आवेदनों को मैंने डील किया था। 38 में से 15 आरोपी बरी हो गए थे। मैं वंजारा को जमानत देते हुए बहुत सहज महसूस नहीं कर रहा था। लेकिन मुझे ऐसा करना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों सह आरोपियों राजकुमार पांडियन और बी आर चौबे को जमानत देने का निर्देश दिया था। हालांकि अपने आदेश में मैंने इस बात को साफ कर दिया था कि प्रथम दृष्ट्या उनके खिलाफ मामला बनता है। इसी वजह से मुझे खास तौर पर दुख हुआ क्योंकि उन्होंने (ट्रायल कोर्ट) उसको छुपाया भी नहीं। मैंने कहा कि इस मामले में प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है और वहां बहुत घृणित अपराध हुआ था। हालांकि इन आधारों पर जब हमने लोगों की जमानतें देने से इंकार किया तब सुप्रीम कोर्ट ने इन पक्षों को देखे बगैर जमानत देना शुरू कर दिया और केवल ट्रायल से पहले लंबे दिनों तक हिरासत में होने के आधार पर ही जमानत दे दी गयी। इसलिए उसके बाद दूसरों को भी हिरासत में रखना उचित नहीं रहता। इसी वजह से वंजारा को जमानत दी गयी। यहां तक कि हाईकोर्ट के जज जस्टिस एम एल तहलियानी ने दो-तीन लोगों को जमानत दी। 

प्रश्न: तो क्या आप कहना चाहते हैं कि इस केस में बरी किए गए लोगों के मामलों की फिर से समीक्षा होनी चाहिए?

जस्टिस थिप्से: हां। क्योंकि वैसे बहुत सारे आरोपियों को जमानत दी गयी थी, किसी ने भी जमानत देते समय ये नहीं कहा था कि प्रथम दृष्ट्या कोई मामला नहीं बनता है। हर एक शख्स ने कहा था कि जमानत समानता के आधार पर दी गयी थी जब दूसरे आरोपियों (वंजारा) को छोड़ दिया गया था। वास्तव में जब प्रथम दृष्ट्या कोई मामला नहीं बनता है तब जमानत बगैर पूछे मिल जाती है। इस मामले में आरोपियों को जमानत देने से लगातार इंकार किया जा रहा था। और फिर उनको जेल में एक अच्छा खासा समय बिताने के बाद जमानत मिली थी। ये बेहद बेतुका है। मैं कहना चाहता हूं कि ये सहज ज्ञान के विपरीत है कि ऐसे मामले में जिसमें एक शख्स को बार-बार जमानत देने से इंकार किया जाता रहा हो कोर्ट पांच-सात साल बाद पाता है कि उसमें प्रथम दृष्ट्या कोई मामला ही नहीं है। ऐसा नहीं होता है। इसलिए इन आदेशों की उचित फोरम के सामने उचित तरीके से समीक्षा होनी चाहिए। और हाईकोर्ट को इस मामले को देखना चाहिए।

प्रश्न: आपके विचार से इन मामलों में क्या विसंगतियां हैं?

जस्टिस थिप्से: बहुत सारे आरोपी इस आधार पर बरी हो गए कि उनके खिलाफ प्रमाण बहुत कमजोर हैं। जबकि उन्हीं प्रमाणों के आधार पर ट्रायल कोर्ट पाता है कि कुछ आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को आगे बढ़ाया जा सकता है। एक ही गवाह की बात को कुछ आरोपियों के लिए विश्वसनीय माना गया है जबकि दूसरे बरी लोगों के मामले में अविश्वसनीय करार दे दिया गया है। अपहरण पर विश्वास किया गया है। इसका मतलब है कि आप विश्वास करते हैं कि उसका (शेख) अपहरण किया गया था। आप ये भी मानते हैं कि एनकाउंटर फेक था। आप ये भी मानते हैं कि उसे अवैध रूप से फार्महाउस में बंधक बनाकर रखा गया था। और आप ये नहीं मानते कि वंजारा, दिनेश एमएन (तब राजस्थान में एसपी) या राजकुमार उसमें शामिल थे।

कांस्टेबल या इंस्पेक्टर के स्तर के अफसरों का उसके साथ कैसे संपर्क हो सकता था? इसका मतलब आप कहना चाहते हैं कि एक सब इंस्पेक्टर उसका (सोहराबुद्दीन शेख) हैदराबाद से अपहरण किया और फिर वो उसे दूसरे राज्य में ले आया? जब उसी सामग्री के आधार पर आप कहते हैं कि एसपी (पांडियन और दिनेश) लोगों के खिलाफ केस नहीं बनता है। तो ये संदेह हो जाता है कि बड़े अफसरों के साथ अलग तरीके से व्यवहार किया गया है। ये संदेहास्पद है। 

प्रश्न: आरोपियों को जमानत का आदेश पारित करते समय आपके सामने क्या बाधाएं आती थीं?

जस्टिस थिप्से: सुप्रीम कोर्ट के पांडियन और चौबे दो आरोपियों को जमानत देने के सिवाय उसमें कोई बाधा नहीं थी। उन परिस्थितियों में मेरा इंकार न्यायिक विवेक और न्यायिक अनुशासन के लिए उचित नहीं होता। समग्रता में सुप्रीम कोर्ट अपराध की गंभीरता, केस की जघन्य प्रवृत्ति और प्रथम दृष्ट्या मामले की मौजूदगी को दरकिनार कर रहा है। और जमानत भी केवल दो आधारों पर दी जा रही है- ज्यादा दिनों तक हिरासत में रखा जाना और ट्रायल के जल्द खत्म होने की संभावना का नहीं होना। अगर सुप्रीम कोर्ट ने उन आधारों को ही महत्व दिया है तो दूसरे आरोपियों के मामलों में भी ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए। हालांकि कोई भी उसे खारिज करने के लिए अधिकृत है....लेकिन ये उचित नहीं होगा। जेल में बिताया गया समय भी बहुत ज्यादा था। इसलिए समस्या जमानत देने से नहीं शुरू होती है। समस्या तब खड़ी होती है जब बरी किया जाना शुरू हो जाता है।

प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के बावजूद क्या आप दूसरे आधारों पर उसे खारिज कर सकते थे?

जस्टिस थिप्से: यहां तक कि किसी खास केस में अगर सुप्रीम कोर्ट का विचार गलत माना जाता है और उसके पहले के निर्णयों के विपरीत होता है तब भी हाईकोर्ट को उस केस में वही विचार रखना होगा। ये हाईकोर्ट का काम नहीं है कि वो सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए विचार को दुरुस्त करे। अगर इस तरह का कोई प्रयास किया जाता है तो वो कानून के शासन के लिए ठीक नहीं है। आपको निश्चितता की जरूरत होती है। 

वंजारा (जमानत) मामले में उस आदेश के खिलाफ ही मेरी दुविधा बहुत स्वाभाविक थी। आरोप ये था कि मंत्री (गुजरात के गृह राज्यमंत्री अमित शाह) के कहने पर उन्होंने इसे अंजाम दिया है। मंत्री दो महीने में बाहर हो गया। पुलिस अफसर जेल में बने रहे। उन्हें सबक सिखाने के लिए ये काफी होना चाहिए था। इस लिहाज से सात साल (सजा) काफी था। उन परिस्थितियों में जमानत देना बिल्कुल अलग होता जब ये कहा जाता कि आरोपियों के खिलाफ कोई प्रथम दृष्ट्या मामला नहीं बनता।

प्रश्न: जमानत के आवेदनों के मामले में किस चीज ने आपको परेशान किया?

जस्टिस थिप्से: अगर कोई तात्कालिकता है तो वो स्वाभाविक है आरोपी जमानत के आवेदन पर जल्द से जल्द सुनवाई चाहता है। इस मामले में वो केवल जमानत के लिए आवेदन कर देते थे और उसे पेंडिंग में रख लेते थे। ये अपने आप में संदेहास्पद था। आमतौर पर ऐसा नहीं होता है। 99 फीसदी मामलों में आरोपी जमानत के आवेदन पर जल्दी सुनवाई चाहता है। अगर कोई शख्स इजाजत देता है तो जमानत का आवेदन एक से लेकर दो साल तक पेंडिंग में रह सकता है। उस दौरान जिम्मेदारियों में बदलाव (जजों के तबादले) होता है वो अपने आप में संदेहास्पद है और उसके परीक्षण की जरूरत है।

जज लोया, सोहराबुद्दीन, कौसर बी और अमित शाह।

प्रश्न: ट्रायल कोर्ट में कार्यवाहियों, 38 आरोपियों में से 15 के बरी होने और मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी की आवश्यकता को आप किस रूप में देखते हैं?

जस्टिस थिप्से: सभी बरी लोगों के मामलों में, उनके बरी होने के लिए मुकदमा चलाने की मंजूरी की जरूरत को आधार नहीं बनाया गया है। ये सवाल कुछ आरोपी पुलिस अफसरों के मामलों में ही सामने आया है। सीआरपीसी का सेक्शन-197 (मुकदमे के लिए सरकार की इजाजत) पुलिस अफसरों के निचली रैंक तक पर लागू होता है। अगर मंजूरी नहीं है तो आप मामले का संज्ञान नहीं ले सकते हैं। ये ठीक है। लेकिन अगर वहां कोई प्रथम दृष्ट्या केस ही नहीं है तो आप किसी भी तरीके से आरोपी के खिलाफ कार्रवाई में नहीं जा सकते हैं और इस तरह के मामले में मंजूरी की जरूरत का सवाल ही नहीं उठता। प्रथम दृष्ट्या मामले के आधार पर कार्यवाही को रद्द करना और मुकदमे की इजाजत के लिए कार्यवाही को रद्द करना दो बिल्कुल अलग-अलग मसले हैं।

एक दूसरे का पूरक नहीं हो सकता है। अगर किसी आरोपी के खिलाफ कोई प्रथम दृष्ट्या मामला नहीं है तो कोर्ट ये नहीं कह सकता है कि मुकदमा चलाने की मंजूरी मिल गयी है इसलिए प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है। मौजूदा मामले में कुछ आदेशों में ट्रायल जज ने बेहद हास्यास्पद तरीके से दोनों पक्षों को जोड़ दिया और फिर कुल मिलाकर उसके बाद बरी होने का आदेश पारित कर दिया। वो कहते हैं कि प्रमाण कमजोर है लेकिन आरोपी को ये कहते हुए बरी नहीं करते हैं कि वहां प्रथम दृष्ट्या कोई मामला नहीं है। वो जो कहते हैं कि प्रमाण कमजोर है और इसलिए मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी जरूरी हो जाती थी। बरी किए जाने के कुछ आदेश इस तरह का आभास देते हैं कि वो पूरी तरह से न तो सामग्री की कथित अविश्सनीयता पर भरोसा कर सकते हैं और न ही एक आरोपी के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने के पीछे मुकदमा चलाने की मंजूरी के न होने को आधार बना सकते हैं। लेकिन अगर आप एक आरोपी को इन दोनों आधारों पर बरी करने में अक्षम हैं। तब आप दोनों को जोड़कर संकर नहीं बना सकते हैं और फिर सबको मिलाकर कहते हैं कि दोनों आधारों को मिलाकर बरी करने के पर्याप्त कारण हैं लिहाजा मैं बरी करता हूं। ये शरारत है। आप 30 यहां से लेते हैं और 30 वहां से और फिर दोनों को मिलाकर 60 बना देते हैं।

मैंने बरी होने के आदेशों को देखा है। तर्क की उस प्रक्रिया में काबिल जज कुछ गवाहों पर पूरी तरह से भरोसा कर पाना अनुचित पाते हैं और फिर उन्होंने इन गवाहों द्वारा फंसाए गए आरोपियों को बरी कर दिया। जबकि उन्हीं गवाहों के बयानों पर विश्वास कर काबिल जज ने बरी होने के आवेदनों को खारिज कर दिया है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य में किसी को परिस्थितियों के प्रमाण को देखना चाहिए और फिर किसी खास आरोपी की उसमें क्या भूमिका है ये बात उसके बाद देखी जाएगी। मैंने गहराई से सभी आदेशों को नहीं देखा है लेकिन मेरा विचार ये है कि किसी को उसमें और गहराई में उतरने की जरूरत है। हाईकोर्ट को अपनी समीक्षा के अधिकार का प्रयोग करना चाहिए। और उन सभी आदेशों का परीक्षण करना चाहिए कि वो उचित हैं या नहीं....और यह कि उनमें निरंतरता है कि नहीं।

एक और चीज मुझे संदेहास्पद लगी कि आरोपी हमेशा ट्रायल के खुले होने को प्राथमिकता देते हैं। आमतौर पर मुकदमे का सामना कर रहा कोई शख्स तब ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहा होता है जब वो जनता की निगाह में हो। आरोपी के लिए खुला ट्रायल सबसे बड़ी सुरक्षा होती है। ये एक मानवाधिकार है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता हासिल है। खुले में ट्रायल बुनियादी तौर पर आरोपी का अधिकार है। यहां एक ऐसा मामला है जहां आरोपी कोर्ट से आवेदन के जरिये प्रार्थना करता है कि मीडिया को केस की कार्यवाही को प्रकाशित करने से रोका जाए। ट्रायल कोर्ट इस तरह का आवेदन पारित करता है जिसे हाईकोर्ट रद्द कर देता है। सवाल ये है कि आरोपी कैसे सुरक्षित महसूस कर सकता है जब जनता जान ही नहीं रही है कि कोर्टरूम में क्या हो रहा है? मेरे मुताबिक वो बहुत अचरज भरा है।

उसके बाद उसके छोटे प्रभाव दिखने शुरू हो जाते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान से आने वाले चार पुलिस अफसरों में एसपी दिनेश बरी हो जाते हैं और दूसरों पर मुकदमा जारी है। षड्यंत्र के सिद्धांत और एनकाउंटर के प्रथम दृष्ट्या फर्जी होने की बात को कोर्ट ने भी स्वीकार की है। वरना बाकी तीनों भी बरी कर दिए जाते। अगर ऐसा है तो दिनेश के खिलाफ भी कार्यवाही का कोई केस क्यों नहीं है? क्या ये तार्किक है? ऐसे में क्या हम उस सिद्धांत को स्वीकार कर रहे हैं कि राजस्थान के एक इंस्पेक्टर और दो सब इंस्पेक्टरों ने दिनेश की गैरजानकारी में अपराध को अंजाम दिया। वो राजस्थान से आए और गुजरात के डिप्टी एसपी के साथ षड्यंत्र किए और फिर हैदराबाद गए? हैदराबाद का भी एक पुलिस अफसर बरी नहीं हो पाया है। उसने केवल उनकी सहायता की थी। विडंबनापूर्ण ये है कि शख्स जिसने पुलिस को अपना फार्म हाउस दिया जिसे अभियोजन पक्ष ने एक छोटी भूमिका के लिए आरोपी बनया है। बरी नहीं किया गया है। कम से कम उसके केस को सोहराबुद्दीन को वहां रखने वालों से खराब नहीं बता सकते। इस मामले में इस तरह की ढेर सारी विसंगतियां हैं।

प्रश्न: इन आदेशों की फिर से समीक्षा से केस के ट्रायल पर क्या असर पड़ेगा?

जस्टिस थिप्से: अगर कुछ गवाह पलट गए हैं जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट किया गया है तब इन आदेशों की समीक्षा से भी कोई उद्देश्य हल नहीं होने जा रहा है। लेकिन मैं इस मामले को इस नजरिये से देखूंगा कि उनके मुकरने के पीछे भी कुछ कारण होगा। जैसे कि गवाहों को घूस दिया गया हो या फिर उन पर दबाव डाला गया हो और उन्हें धमकी दी गयी हो। अगर हम ट्रायल में घटनाओं की प्रक्रिया देखें तब ये संदेहास्पद हो जाता है। यहां तक कि अगर बरी होने के आदेशों को भी पुलिस को दिए गए गवाहों के बयान के आधार पर रद्द कर दिया जाता है। तब भी वो बेकार चला जाएगा अगर गवाह कोर्ट में उस पर खड़े नहीं होते हैं।

प्रतीकात्मक रेखाचित्र।

प्रश्नः इन सब आकलनों के बाद क्या आप सोचते हैं कि ये न्याय की असफलता है?

जस्टिस थिप्से: ये न्याय और न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था की असफलता है। ये बिल्कुल असामान्य बात है कि बहुत सारे आरोपियों को सालों तक जमानत नहीं दी गयी और फिर कोर्ट कहता है कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्ट्या कोई मामला नहीं बनता है। छोटे दर्जे के अफसर नहीं बरी होते हैं लेकिन बड़े दर्जे के अफसर बरी हो जाते हैं। जबकि सामग्री की प्रकृति दोनों के खिलाफ एक ही है। सुप्रीम कोर्ट ने ढेर सारे मामलों में ये प्रतिपादित किया है कि अगर एक आरोपी जमानत पर रिहा हो गया है तो सह आरोपी अपने आप जमानत पर रिहा नहीं हो सकता है। जब तक कि उसकी भूमिका रिहा होने वाले के बराबर नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जमानत देने और खारिज करने के आदेशों में न केवल वो इस बात का जिक्र करते हैं कि उसमें प्रथम दृष्ट्या मामला नहीं बनता बल्कि इसके बजाय प्रथम दृष्ट्या मामले की मौजूदगी को चिन्हित करते हैं। और इस बात को साफ करते हैं कि जमानत ट्रायल शुरू होने के पहले बहुत ज्यादा दिनों तक हिरासत के चलते दी जा रही है। उसके बाद ट्रायल कोर्ट के पास ऐसा कहने का साहस था कि उनमें से कुछ आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या केस ही नहीं बनता।

  










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