लोया पर बांबे हाईकोर्ट में नयी याचिका: मामले से जुड़े जजों से छीने जाएं काम और अमित शाह के बरी होने पर लगे स्टे

ख़ास रपट , नई दिल्ली/मुंबई, बुधवार , 05-12-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। सीबीआई जज बीएच लोया मामले में बांबे हाईकोर्ट में एक अभूतपूर्व याचिका दायर हुई है। इस याचिका की सुनवाई के लिए सात जजों की संविधान पीठ गठित करने की मांग की गयी है। इसके साथ ही इस मामले से जुड़े सभी जजों का बांबे हाईकोर्ट से तबादला करने तथा इनमें शामिल गवाह जजों तक को मामले में आखिरी फैसला आने तक कोई काम न सौंपने की मांग की गयी है। इसके साथ ही याचिका में तीन आईपीएस अफसरों के नेतृत्व में एसआईटी गठित कर हाईकोर्ट की निगरानी में मामले की जांच कराने का निवेदन किया गया है।

इसमें सलाह दी गयी है कि ये तीनों अधिकारी उन राज्यों से होने चाहिए जहां बीजेपी की सरकारें नहीं हैं। सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह को बरी करने का फैसला सुनाने वाले सीबीआई जज एमबी गोसावी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने की मांग की गयी है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट समेत 25 लोगों और संस्थाओं को पार्टी बनाया गया है। कारवां मैगजीन में स्टोरी ब्रेक करने वाले निरंजन टाकले भी इसमें एक पक्ष हैं। और इन सबमें सबसे अहम मांग ये है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत तमाम आईपीएस अफसरों के बरी किए जाने के फैसले पर तत्काल रोक लगायी जाए। 

याचिका में एसपीजी के मुखिया से अपील की गयी है कि मामले की जांच होने तक नागपुर कलेक्टर के प्रोटोकाल रजिस्टर में दर्ज एसपीजी के सदस्य लेफ्टिनेंट कर्नल सुशांत डांगरे को किसी भी तरह की ड्यूटी पर न तैनात किया जाए।

याचिका में कहा गया है कि इस याचिका की सुनवाई के लिए सात सदस्यों की एक संविधान पीठ बनायी जानी चाहिए। साथ ही याचिका को एफआईआर के तौर पर लिए जाने की मांग की गयी है जिससे विभिन्न राज्यों के तीन आईपीएस अफसरों के नेतृत्व में गठित एसआईटी मामले की जांच शुरू कर सके। इसमें कहा गया है कि ये राज्य बीजेपी शासित नहीं होने चाहिए और न ही उनमें उसकी सहयोगी पार्टी की सरकारें होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता के वकील नितिन शिवराम सतपुते का कहना है कि न्याय के हित में सुप्रीम कोर्ट के लिए ये जरूरी हो जाता है कि वो बांबे हाईकोर्ट के उन जजों का तबादला करे जिनका नाम जज लोया मामले में मीडिया या और किसी भी रूप में सामने आया है। याचिका कहती है कि सरकारी अफसरों, जांच अधिकारियों और गवाहों के भीतर से भय को निकालने के लिए ये प्राथमिक शर्त बन गयी है। साथ ही एडवोकेट सुभ्रांशु जोशी या फिर केतकी को हाईकोर्ट के जज के तौर पर प्रमोट न किया जाए क्योंकि इनके नाम जज लोया मामले से केंद्रीय रूप से जुड़े हुए है। 

लोया मामले में बांबे हाईकोर्ट में याचिका।

याचिका में हाईकोर्ट से रजिस्ट्री विभाग को ये निर्देश देने के लिए कहा गया है कि वो ऐसे जजों को कोई काम न सौंपे जिनके नाम जज लोया मामले से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और एक्टिविस्ट संजय रमेश भालेराव की ओर से दायर इस याचिका में उन पुलिसकर्मियों को भी बांधने की कोशिश की गयी है जिन्होंने इसकी जांच की थी। याचिका में कहा गया है कि मामले की पूरी जांच होने तक उन्हें कोई अन्य काम न सौंपा जाए। गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने एक डिस्क्रीट जांच बैठायी थी और उसी की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा हुई थी। इसमें चार जजों ने लिखित तौर पर गवाही दी थी।

याचिका में इस बात को विशेष तौर पर चिन्हित किया गया है कि न्याय विभाग के कुछ अफसरों की भूमिका बेहद संदिग्ध रही है। उसमें डेस्क अफसर ईएम भार्गव और एपी श्रीमती केतकी जोशी प्रमुख रही हैं। याचिका में इनके किसी भी सरकारी दफ्तर में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की गयी है।

एक महत्वपूर्ण मांग में पीएमओ को भी शामिल कर लिया गया है। जनचौक द्वारा ब्रेक की गयी एसपीजी से जुड़ी स्टोरी का संज्ञान लेते हुए याचिका में संबंधित अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल सुशांत डांगरे को किसी भी तरह की ड्यूटी न दिए जाने की मांग की गयी है।

याचिकाकर्ता के साथ ही उसके वकील एडवोकेट नितिन सतपुते को सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की गयी है साथ ही लोया के परिवार को भी अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराने का निवेदन किया गया है।

यहां ये सवाल उठना लाजिमी है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुनवाई करके अपना फैसला सुना चुका है फिर कोई हाईकोर्ट कैसे उस पर विचार कर सकता है। इसी याचिका में उसकी सफाई भी पेश की गयी है। दरअसल जब किसी फैसले में कोई पेपर रह जाता है या फिर कोई ऐसी बात जिस पर सुनवाई नहीं हुई हो पाती है तब उस मसले में किसी दूसरी कोर्ट को अपने-आप सुनवाई का अधिकार प्राप्त हो जाता है। और वैसे भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट समानांतर कोर्ट मानी जाती हैं। इसके साथ ही अगर कोई दस्तावेज या पेपर के होने के बावजूद कोर्ट उस पर अपनी राय नहीं व्यक्त करता या फिर वो किन्हीं कारणों वश छूट जाता है तब उसकी फिर से सुनवाई जरूरी हो जाती है।

पहले को विधि की भाषा में per incuriam और दूसरे को  sub silentio कहा जाता है। याचिका में साफ-साफ कहा गया है कि जज लोया से जुड़े ऐसे मामले जो किसी भी रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं थे और जो फैसला आने के बाद सार्वजनिक डोमेन में आए उन पर हाईकोर्ट को सुनवाई करने का पूरा अधिकार है। इनमें ज्यादातर मामले याचिकाओं या फिर मीडिया के जरिये सामने आए।

46 पेज की इस याचिका में जज लोया की मौत, उससे पहले की परिस्थितियों और मौत के बाद के पूरे घटनाक्रम को विस्तार से बताया गया है। इसमें सोहराबुद्दीन मामले की सुनवाई के दौरान केस और कोर्ट में आयी तमाम तरह की तब्दीलियों का भी जिक्र है।    

याचिका में कुछ उन याचिकाओं के बारे में भी बताया गया है जो आरोपियों के साथ मिलकर मामले को रफा-दफा कराने के मकसद से डाली गयी थीं। और बाद में वही हुआ। जब उनका मकसद पूरा हो गया तो उन्होंने उसे वापस ले लिया।

याचिका में लोया के मौत की स्टोरी ब्रेक होने से लेकर उसके पूरे बाद के घटनाक्रम पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसके साथ ही याचिका में न्यायालय को तब के सीबीआई निदेशक अनिल सिन्हा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने साथ ही सीबीआई जज एमबी गोसावी को अपनी ड्यूटी ठीक से पूरी करने में नाकाम रहने पर सस्पेंड करने का निर्देश देने की अपील की गयी है।

याचिका में एक और बेहद महत्वपूर्ण मांग की गयी है जिसके तहत बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत दूसरे आईपीएस अधिकारियों के बरी होने के आदेश पर स्टे लगाने के लिए कहा गया है। साथ ही इस मामले से जुड़े सभी न्यायिक अधिकारियों को मामले की सुनवाई तक कोई जिम्मेदारी न सौंपने की अपील की गयी है। 

 








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:: - 12-05-2018