मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस में असीमानंद समेत 5 आरोपी बरी, एनआईए नहीं जुटा पायी सबूत

बड़ी ख़बर , नईदिल्ली/हैदराबाद, सोमवार , 16-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली/हैदराबाद। नामापल्ली (हैदराबाद) की स्पेशल नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) कोर्ट ने सोमवार को 11 साल पुराने मक्का मस्जिद बम ब्लास्ट केस में फैसला सुनाया। सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एनआईए किसी का भी दोष साबित करने में नाकाम रही है। 18 मई 2007 को पुराने शहर की ऐतिहासिक चार मीनार के पास स्थित मक्का मस्जिद में शक्तिशाली पाइप बम के जरिये किए गए इस बम ब्लास्ट में 9 लोगों की मौत हुई थी और 58 लोग घायल हुए थे। यह शुक्रवार (जुमा) था जिस दिन मस्जिदों में जुमे की विशेष नमाज पढ़ी जाती है। 

गुस्साई भीड़ को नियंत्रित कर रही पुलिस की फायरिंग में भी 5 लोगों की मौत हुई थी। इस केस की जांच पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने जिन 10 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, उनमें मुख्य अभियुक्त आरएसएस का एक बड़ा प्रचारक सुनील जोशी था। 29 दिसंबर, 2007 को तीन अज्ञात लोगों ने गोली मारकर उसकी हत्या कर दी थी। बाकी नौ आरोपियों में दक्षिणपंथी संगठन `अभिनव भारत`के नाबा कुमार उर्फ स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा (अजय तिवारी), लक्ष्मण दास महाराज, मोहनलाल रातेश्वर, राजेंदर चौधरी, भारत मोहनलाल रातेश्वर, रामचंद्र कलसांगरा और संदीप डांगे के नाम चार्जशीट में थे। आरएसएस के ही प्रचारक रहे रामचंद्र कलसांगरा और संघ के ही स्वयंसेवक रहे संदीप डांगे अभी तक फरार चल रहे हैं। असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, लोकेश शर्मा, भारत मोहन लाल रातेश्वर और राजेंद्र चौधरी को बरी कर दिया गया। इस केस में कुल 226 चश्मदीदों के बयान दर्ज किए गए और कोर्ट के सामने 411 दस्तावेज पेश किए गए। लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित समेत 64 गवाह कोर्ट के सामने अपने बयान से मुकर गए थे।

इस केस में बरी किए गए असीमानंद का नाम अजमेर शरीफ ब्लास्ट, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, और मालेगांव ब्लास्ट में भी आ चुका है। अजमेर शरीफ ब्लास्ट में वह जयपुर हाईकोर्ट से बरी हो चुका है। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में जन्मा असीमानंद 1977 में ही आरएसएस का पूर्णकालिक प्रचारक बन गया था।

2007 में अजमेर शरीफ ब्लास्ट केस में एटीएस ने एक आरोपी देंवेंद्र गुप्ता को गिरफ्तार किया तो उसके बयान के आधार पर अजमेर शरीफ ब्लास्ट के साथ ही हैदराबाद के मक्का मस्जिद ब्लास्ट के पीछे असीमानंद और सुनील जोशी का नाम मास्टर माइंड के रूप में सामने आया था। सीबीआई ने 19 नवंबर, 2010 को असीमानंद को गिरफ्तार किया था। दिसंबर, 2010 में उसने कोर्ट के सामने ब्लास्ट में शामिल होने की बात क़ुबूल की जिससे वह बाद में पलट गया।

मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस को 2011 में सीबीआई से लेकर एनआईए को सौंप दिया गया था। हैदराबाद कोर्ट ने असीमानंद को 23 मार्च 2017 को जमानत दे दी थी पर हैदराबाद और सिकंदराबाद नहीं छोड़ने की हिदायत दी थी। सात साल तक जेल में रहने के बाद वह 31 मार्च, 2017 को जेल से बाहर आया था। 13 मार्च 2018 को उसकी डिस्क्लोजर रिपोर्ट गायब होने की बात सामने आई पर बाद में कहा गया कि यह रिपोर्ट मिल गई। 

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद इस तरह के आरोप भी लगे थे कि असमीनांद आदि संघ से जुड़े रहे लोगों पर चल रहे गंभीर मामलों की जांच को सरकार प्रभावित करने में लगी हुई है। पूर्व स्पेशल प्रॉसीक्यूटर रोहिणी सेलियन ने एनआईए के अधिकारी सुहास वार्के का नाम लेते हुए आरोप लगाया था कि एनडीए के सत्ता में आने के बाद मालेगांव ब्लास्ट केस के आरोपियों के प्रति नरम रवैया बरतने के लिए कहा गया था। समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट की जांच करने वाली एसआईटी के प्रमुख रहे हरियाणा कैडर के सेवानिवृत्त डीजी विकास नारायण राय भी एनआईए की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। 

गौरतलब है कि मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस में भी पहले मुस्लिम लड़के ही पकड़ लिए गए थे। विकास नारायण राय ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में यह उल्लेख करते हुए कहा था कि समझौता बम विस्फोट में भी पहले अलकायदा और सिमी को लेकर शक किया गया था लेकिन वे जांच के दौरान सबूतों को खंगालने लगे तो दो महीने के भीतर ही इसके कनेक्शन इंदौर से जुड़ने लगे थे। उन्होंने कहा था कि इस विस्फोट में कर्नल पुरोहित, असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर आदि जो नाम सामने आए थे, उनकी भूमिका अजमेर, मक्का मस्जिद आदि ब्लास्ट में भी थी। विकास नारायण राय ने कहा था कि एनआईए की भूमिका के चलते ही प्रज्ञा ठाकुर बरी हुईं और कर्नल पुरोहित को भी इसका ही लाभ मिला।

 








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