2019 के खेल की पहली बाजी

ख़बरों के बीच , , बृहस्पतिवार , 21-06-2018


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महेंद्र मिश्र

अगर किसी को लगता है कि बीजेपी कश्मीर समस्या को हल करना चाहती है तो उसे इस गलतफहमी को दूर कर लेना चाहिए। क्योंकि जिस दिन कश्मीर की समस्या हल हो जाएगी देश में बीजेपी और संघ के वजूद को खतरा पैदा हो जाएगा। पुष्पित, पल्लवित और फिर बड़ा करने के लिए कश्मीर भी बीजेपी के लिए खाद-पानी का एक बड़ा स्रोत रहा है। अनायास नहीं धारा 370 खत्म करना उसका आजादी के बाद से ही एक केंद्रीय नारा बना हुआ है। और जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है का नारा आज भी उसकी कतारों में गूंजता हुआ मिल जाएगा। लिहाजा वो 370 को कतई दूसरी बाबरी मस्जिद नहीं बनने देना चाहेगी। क्योंकि उसके हिंदू राष्ट्र के निर्माण में धारा 370 किसी पुल से कम नहीं है। और वो उसे कभी भी नहीं तोड़ना चाहेगी। जिस कश्मीर के सहारे पूरे देश में जनमत की गोलबंदी का उसे मौका मिलता है क्या वो उसे इतनी आसानी से हाथ से जाने देगी?

ऐसा नहीं है कि वो कश्मीर समस्या का समाधान नहीं देखती है। या उसके पास उसके हल का कोई मॉडल नहीं है। लेकिन वो पूरे देश में अल्पसंख्यकों के साथ उसके रिश्तों के मॉडल से अलग नहीं है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाना इस मॉडल की पहली कड़ी है। जिसमें अल्पसंख्यकों का स्थान दोयम दर्जे का होगा। कश्मीर के मामले में भी उसका कुछ ऐसा ही सपना है। और घाटी के बहुसंख्यक मुसलमानों को उसी स्थिति में पहुंचा देने के लक्ष्य से प्रेरित है। जिसमें पूरे सूबे पर जम्मू-लद्दाख के साथ-साथ घाटी के पंडितों का वर्चस्व होगा। और मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक होने के साथ ही हिंदुओं के रहमोकरम पर जिंदा रहेंगे। 

बीजेपी की समस्या के समाधान में कहीं भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते की बात शामिल नहीं है। वरना इस रास्ते पर कभी भी आगे बढ़ा जा सकता है। इस कड़ी में पूरा न सही विस्थापित पंडितों को घाटी में भेजने का काम तो शुरू ही किया जा सकता था। जो उसका खुद का चुनावी वादा था। लेकिन उसकी जेहन में एक ऐसा मॉडल है जिसमें घाटी के मुसलमानों को दूसरे पायदान पर रखना है। 

और इस दिशा में उसके लिए सबसे जरूरी कदम था घाटी के मुसलमानों का मनोबल तोड़ना। पीडीपी के साथ बने बेतुके गठबंधन के जरिये उसने तीन सालों में यही काम किया है। अमूमन तो उसके पास कश्मीर के लिए अलग से कोई व्यापक नीति न थी और न अभी भी है। हां जिस मस्कुलर पालिसी को अपनाने की बात कही जा रही है सत्ता में आने के बाद से ही वो जारी थी। और केंद्र सरकार घाटी में तैनात अपनी सेना के जरिये लगातार उसी पर आगे बढ़ रही है। अनायास नहीं पैलेट गनों ने घाटी के एक बड़े हिस्से को लहूलुहान कर दिया है। हजारों लोग अंधे हो गए हैं। आतंकियों को पकड़ने के नाम पर घर-घर की तलाशी ली जा रही है। और इस तरह से एक बार फिर पूरी घाटी को देश के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। घाटी को एक ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया गया जब घर की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी सेना की मशीनगनों और मोर्टारों से डरना छोड़ दिए हैं। और मौके- बेमौके बेखौफ होकर उनके सामने सीना तानकर खड़े हो जा रहे हैं। यानी तीन सालों के शासन में आतंकवाद की नई जमीन पैदा कर दी गयी।

11 हजार लोगों के खिलाफ मुकदमों का होना इसका सबसे बड़ा सबूत है। संक्षेप में कहें तो इस दौरान आतंक की आग को फिर से उद्गारना था। और बीजेपी एक हद तक उसमें सफल रही है। देश के संदर्भ में भले ही ये बीजेपी की नाकामी दिखे और सचमुच में है भी। लेकिन खुद उसकी राजनीति के लिए ये बहुत बड़ी कामयाबी है। जिसमें उसने एक बार फिर से कश्मीर की समस्या को जिंदा कर दिया है। अब इस समस्या को और हवा देकर उसे अपने मुताबिक आगे बढ़ाने का उसके पास अधिकार नहीं था। इससे आगे और उसे बड़े पैमाने पर भड़काने और फिर मुद्दा बनाने के लिए उसे पूरी सत्ता चाहिए थी।

वैसे भी पीडीपी और बीजेपी दोनों के लिए अपनी ही सरकार भारी पड़ने लगी थी। बीजेपी से न तो जम्मू के लोग खुश थे और न ही पीडीपी से घाटी के लोग। अनायास नहीं है कि महबूबा मुफ्ती अपने गृह लोकसभा क्षेत्र में डेढ़ साल से चुनाव नहीं करा पा रही हैं। क्योंकि उन्हें पता था कि उसका हस्र क्या होगा। समर्थन वापसी के मामले में बीजेपी के लिए कठुआ रेप की घटना ने निर्णायक भूमिका अदा की। जिसमें बीजेपी के प्रति जम्मू में बड़े स्तर पर विक्षोभ था। समर्थन वापसी का फैसला बीजेपी के लिए दोहरा लाभ साबित होगा। एक तरफ इसके जरिये उसे सूबे में अपने खिलाफ पैदा हुए गुस्से को कम करने का मौका मिलेगा दूसरी तरफ अब उसके पास 2019 के चुनावों के लिए माहौल बनाने का खुला मैदान है।

बीजेपी ने देश और कश्मीर हित के नाम पर पीडीपी के साथ सरकार बनायी थी और अब उसी के नाम पर उसने समर्थन भी वापस ले लिया है। देश हित के नाम पर सब कुछ करने का दावा करने वाली बीजेपी के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा हित उसकी सत्ता का है। 

राजनीतिक विशेषज्ञ शाह-मोदी जोड़ी के लिए जिस ब्रह्मास्त्र की तलाश के बारे में सोच रहे थे। वो भले ही उस रूप में ब्रह्मास्त्र न हो। लेकिन उसके बनने की दिशा में एक बड़ा कदम जरूर है। कश्मीर से इसकी शुरुआत हो गयी है। घाटी को जहां छोड़ा गया था उसे और बदतर बनाने की तैयारी शुरू हो गयी है। आतंकियों को मारने और पाकिस्तान को सबक सिखाने के नाम पर अब एक ऐसे युद्धोन्माद की स्थिति बनायी जा सकती है जिसकी गूंज 2019 के आम चुनावों में दिखे। केंद्र सरकार के समर्थक और उसके पिट्ठू चैनलों ने इसकी तोता रटंत भी शुरू कर दी है। जिसे मस्कुलर पोलिसी का नाम दिया गया है। कश्मीर अब इनके लिए महज एक पतवार है। जिसका इस्तेमाल 2019 के चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए किया जाना है। इन्हें न तो कश्मीर से कुछ लेना देना है और न ही उसकी जनता से।

इन्हें सिर्फ और सिर्फ अब अपनी सत्ता दिख रही है। और किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर ये कश्मीर को भी कुर्बान करने से परहेज करेंगे। इस घटना के साथ ही ये बात भी तय हो गयी है कि बीजेपी अब किसी विकास के एजेंडे पर चुनाव में नहीं जा रही है। सांप्रदायिक एजेंडा सर्वोपरि होगा। इसलिए आने वाले दिनों में मॉब लिंचिंग से लेकर दंगों की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही इस बात की पूरी आशंका है कि अयोध्या मसले को एक बार फिर आगे किया जा सकता है। और देश में नफरत और घृणा फैलाने वाले हर मुद्दे को अहमियत मिलेगी।


 




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