मसूद अजहर वीटो मसला: आखिर बिना तैयारी के भारत क्यों गया था यूएनएससी!

देश-दुनिया , , बृहस्पतिवार , 14-03-2019


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चीन ने एक बार फिर से जैश सरगना मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के भारत के मंसूबे को करारा झटका दे दिया है। चीन ने इससे पहले भी तीन बार इस मसले पर वीटो कर चुका है। चौथी बार फिर से अपने "वीटो" की शक्ति का इस्तेमाल कर मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित नहीं होने दिया। जैसा कि मालूम ही होगा कि पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सैनिकों के जत्थे पर आतंकियों के हमले के कारण देश के 40 जवान शहीद हो गए। इस जघन्य अमानवीय आतंकी कृत्य की जवाबदेही जैश ने ही ली थी जिसका सरगना मसूद अजहर है जो फिलहाल पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के बहावलपुर में कौसर कालोनी में रहता है।

इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 अल कायदा सैंक्शन्स कमेटी के तहत अजहर को आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव 27 फरवरी को फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका ने लाया था। अल कायदा सैंक्शन्स कमेटी के सदस्यों के पास प्रस्ताव पर आपत्ति जताने के लिए 10 दिनों का वक्त था। अनापत्ति की अवधि बुधवार को (न्यूयॉर्क के) स्थानीय समय दोपहर तीन बजे (भारतीय समयनुसार बृहस्पतिवार रात साढ़े 12 बजे) खत्म होनी थी। और इस अवधि में चीन ने इस पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इस हमले की निंदा की थी। अगर चीन इस बार मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ जारी प्रस्ताव को ख़ारिज करने के लिए वीटो पावर का प्रयोग नहीं करता है तो यूएनएससी मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर देता। ऐसे में दुनिया का कोई ऐसा देश जो कि सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य हो तो वह मसूद अजहर को अपने देश में न ही शरण दे सकता और न ही आर्थिक मदद कर सकता।

भारत सरकार की विदेश नीति की इस असफलता पर आरोप-प्रत्यारोप के दौर भी शुरू हो चुके हैं लेकिन सबसे अहम बात यह है कि आख़िर क्यों बार-बार भारत सरकार की विदेश नीति इतनी दोयम दर्जे की साबित हो रही है? क्यों सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश को फजीहत का सामना करना पड़ रहा है? आइये आपको आतंकी मसूद अजहर और उसके संगठन जैश से जुड़े कुछ पहलुओं की ओर लिए चलते हैं जिसने भारत को हर तरीके से नकुसान पहुंचाया है।

■ जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कंधार विमान हाइजैक के बाद यात्रियों की रिहाई के एवज में एक मोटी रकम की सौगात के साथ रिहा किया था।

■ 13 दिसंबर 2001 को दिल्ली स्थित संसद भवन पर आतंकी हमला हुआ था तो हमला करने वाला लश्कर-ए-तायबा और जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकवादी संगठन थे। इस हमले में कुल 14 लोगों की जानें गई थीं। 

■ 2 जनवरी 2016 को तड़के सुबह 3:30 बजे पंजाब के पठानकोट में पठानकोट एयर बेस भारी मात्रा में असलहा बारूद से लैस जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने आक्रमण कर दिया। इस आतंकी हमले में 7 जवान शहीद हो गए। दिलचस्प बात ये है कि मोदी जी ने इस आतंकी हमले की जाँच और पाकिस्तानी आतंकवादियों के शामिल होने के सबूत देने के लिए पहली बार देश मे पाकिस्तानी जाँच एजेंसी को आने का निमंत्रण दिया। पाकिस्तानी जाँच एजेंसी यहाँ आयी भी, सरकार ने उसकी आवभगत भी की, सबूत भी उपलब्ध करवाए औऱ लेकिन जाकर इस हमले में पाकिस्तानी आतंकियों के शामिल होने की बात से साफ इंकार कर दिया। ये भारतीय विदेश नीति की बड़ी विफलता थी। जनवरी 2016 में पंजाब के पठानकोट में भारतीय वायु सेना के बेस पर जैश के हमले के बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र की ओर से अजहर पर प्रतिबंध लगाने को लेकर अपनी कोशिशें तेज कर दी थीं। इसमें भारत को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का भी समर्थन मिला था, लेकिन चीन ने उस समय भी इसका विरोध किया था।

अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू की ओर, आखिर जैश सरगना मसूद अजहर के चीन के इस अनूठे प्रेम का क्या कारण है ?

■ बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी सिल्क मार्ग

मई 2017 में बीजिंग में दुनिया के 28 बड़े नेताओं और 120 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक नए सिल्क रूट का एलान किया और उसे रोड ऑफ पीस यानी शांति का मार्ग बताया था। पूरी दुनिया में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के 65 देशों को जोड़ने की चीन की इस परियोजना को 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का नाम दिया गया, जिसे 'न्यू सिल्क रूट' के नाम से भी जाना जाता है। इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य चीन को अफ़्रीका, मध्य एशिया और रूस होते हुए यूरोप से जोड़ना है। चीन के रास्ट्रपति की यह घोषणा न केवल भारत के लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व को चौंकाने के लिये काफ़ी था। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और विश्व व्यापार को बढ़ावा देने के नाम पर लायी गई इस योजना के पीछे छिपे चीन के मंसूबे बेहद ख़तरनाक ही नहीं वरन विनाशकारी भी हैं। और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होगा ये तय है। 

दक्षिण एशिया में अपनी दादागिरी दिखाने और समुद्र (खासकर हिन्द महासागर) में अपना वर्चस्व स्थापित करना चीन का सबसे बड़ा मकसद है। इसका लगभग 90 फ़ीसदी हिस्सा समुद्री रास्तों से होकर जाता है और इस तरह मालवाहक पोत एक देश से दूसरे देश को जाते हैं। चीन ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को शुरू किया है, जो अगर सफल हुआ तो यह दुनिया में होने वाले वैश्विक व्यापार की तस्वीर ही बदल देगा। भारत के लिये ये मसला बेहद पेचीदा हो चला है क्योंकि यूरोपीय देशों के साथ भारत के कई पड़ोसी देश-श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और यहां तक कि नेपाल जैसा देश भी भारत के खिलाफ इस परियोजना में चीन के साथ खड़ा है। 

यानी भारत इस मसले पर चारों तरफ से घिर चुका है। और ऐसे में चीन को लग रहा है कि अगर मसूद अज़हर के खिलाफ़ कार्रवाई करता है तो जैश चीन-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर (CPEC) को निशाना बना सकता है जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से गुज़रता है।

■ कश्मीर मसले पर चीन द्वारा मध्यस्थता करने की कूटनीतिक चाल

चीन कश्मीर मसले पर गहरी कूटनीतिक चाल चलता रहा है आज भले ही मसूद अजहर के मुद्दे पर अमेरिका चीन के रुख से स्वयं को अलग दिखा रहा हो पर हकीकत यही है की मध्यस्थता के मसले पर अमेरिका जैसे बड़े राष्ट्र का अंदरूनी सपोर्ट चीन को मिलता रहा है। सऊदी अरब की तरह चीन भी संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई अन्य अवसरों पर पाकिस्तान और भारत के बीच तनाव को कम करने के लिए कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने के मंसूबों को खुले तौर पर ज़ाहिर कर चुका है। चीन की माने तो जिस तरह से एलओसी पर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है उससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान भी अब इस तरफ जा रहा है। कश्मीर मुद्दे पर अन्य देश की मध्यस्थता का सीधा मतलब है भारत की कूटनीतिक हार क्योंकि यही तो पाकिस्तान भी चाहता रहा है। 

■इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) में पाक द्वारा चीन का सहयोगात्मक रवैया

भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  को संबोधित करते हुए पाकिस्तान पर जमकर निशाना साधा था, उन्होंने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान पर हमला किया था। सुषमा स्वराज ने कहा था कि जो देश आतंकवादियों का वित्तपोषण करता है और उसे पनाह देता है, उसे निश्चित ही उसकी धरती से आतंकी शिविरों को समाप्त करने के लिए कहा जाना चाहिए। लेकिन सुषमा स्वराज जी के संबोधन के एक दिन बाद ही इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत पर निशाना साधा। OIC में एक प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान का समर्थन किया गया है और भारत पर कश्मीर में मिलिट्री फोर्स की तैनाती को लेकर निशाना साधा गया इस प्रस्ताव में आईओसी के सदस्य राष्ट्रों ने दोहराया है कि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान और भारत के बीच विवाद का अहम मामला है और दक्षिण एशिया में अमन के ख्वाब को साकार करने के लिए इसका हल होना जरूरी है। 

इस प्रस्ताव में कश्मीर में कथित मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर गहरी चिंता जताई गई। यानि कुल मिलाकर यहां न केवल भारतीय विदेश नीति को फजीहत का सामना करना पड़ा बल्कि पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करवाने के बदले खुद को आतंकी देश साबित कर बैठा। इस्लामिक सहयोग संगठन हमेशा से पाक चीन को सहयोग करता रहा है।

अहम मसला ये है कि जब इससे पहले भी मसूद अजहर के मुद्दे पर चीन तीन बार वीटो का प्रयोग कर चुका था तो संयुक्त राष्ट्र में जाने से पहले मसूद अजहर के मद्दे पर चीन पर दबाव बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने किया क्या था ? अपनी विश्वसनीयता खो चुकी भारतीय मीडिया में हंगामा मचाने के अलावा क्या कोई अन्य तैयारी भी भारतीय विदेश मंत्रालय और माननीय नरेंद्र मोदी जी ने किया भी था या नहीं ?

जैसा कि मालूम ही होगा कि बहुराष्ट्रीय प्रधानमंत्री जी अपने पाँच वर्ष के कार्यकाल में देश का डंका बजाने के लिए पांच बार चीन की यात्रा कर चुके हैं। भारत के प्रधानमंत्री विदेश भ्रमण की महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपनी पाँचवी चीन यात्रा पर तो प्रोटोकॉल तोड़कर पहुँच गए थे। विदेश नीति के विशेषज्ञों की मानें तो प्रधानमंत्री के इन चीनी यात्राओं से काफी उम्मीदें थी पर ........उम्मीदें हैं कि बढ़ती ही जा रही हैं पर हक़ीक़त के दोलायमान धरातल पर भारत की स्थिति बेहतर दिखना तो दूर दिन प्रतिदिन और डांवाडोल होती जा रही है। उम्मीद करता हूँ कि देश के विदेश नीति निर्धारक शूरमा अनर्गल बयानबाजी करने के बदले चिंतन कर ये महसूस करने की कोशिश करेंगे कि "झूला झूलना" और विदेश नीति का निर्धारण करना दो अलग बातें हैं।

       (दया नन्द शिक्षाशास्त्री हैं और आजकल बिहार के मधुबनी में रहते हैं।)








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