मोदी की बौखलाहट और उसके निहितार्थ

ख़बरों के बीच , , रविवार , 10-02-2019


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जनचौक ब्यूरो

राफेल मामले में “दि हिंदू” के संपादक एन राम के खुलासे से ये बात आधिकारिक तौर पर साबित हो गयी कि पीएमओ ने समांतर डील की थी। और इस कड़ी में उन तमाम सरकारी प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं की उसने धज्जियां उड़ाई जो अब तक रक्षा सौदों में होती रही हैं। मसलन उसने सीधे-सीधे इसकी कमान एनएसए अजित डोवाल को सौंप दी जिनको कोई सरकारी अधिकार ही नहीं प्राप्त था। किसी दलाल के शामिल न होने की जो बात पीएम मोदी कहते थे। वो अब जाकर स्पष्ट हो रही है। जिसमें वो खुद फ्रांस सरकार के साथ सीधे बाचतीच कर रहे थे। 

अब जब पीएम सीधे फंसते दिख रहे हैं और उसके सरकारी दस्तावेजी सबूत सामने आ गए हैं। तब बजाय उसका जवाब देने के उल्टे उन्होंने कांग्रेस और उसके आलाकमान की घेरेबंदी शुरू कर दी है। और इस मामले में वो सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार को केंद्रित किए हुए हैं। ये कुछ उसी तरह का मामला है जैसे किसी के कपड़े पर कीचड़ लग जाने से उस कमी को पूरा करने के लिए वो सामने वाले को भी कीचड़ में धकेल दे या फिर ये साबित करने की कोशिश करे कि उसका भी दामन दागदार है। और इस मामले में सबसे कमजोर कड़ी गांधी परिवार के दामाद राबर्ट वाडेरा को चुना गया है। इसको चुनने के पीछे दो कारण हैं।

पहला किसी भी व्यवसाय करने वाले शख्स के हमेशा कहीं न कहीं फंसने की गुंजाइश बनी रहती है। दूसरा प्रियंका गांधी के राजनीति में आने के प्रभाव को कम करने के लिहाज से भी उन्हें टारगेट बनाया गया है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पूरे गांधी परिवार को पीएम मोदी लपेटने की कोशिश कर रहे हैं। और अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए गांधी परिवार से जुड़े पुराने मामलों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। और रायगढ़ में तो वो बाकायदा धमकी और लेन-देन के अंदाज में बोलते दिखे जिसमें ये बात शामिल थी कि राफेल मामले पर रुक जाओ वरना गांधी परिवार के खिलाफ उनके पास बहुत कुछ है।

मोदी को अपनी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल के बाद भी अपनी उपलब्धियों की जगह अगर विपक्षी दल की पुरानी कमियों और कमजोरियों पर वोट मांगना पड़ रहा है तो ये अपने आप में सरकार की बड़ी नाकामी है। और इसमें बहुत कुछ ज्यादा नहीं मिलने जा रहा है। जिस तरह की मैराथन सभाएं मोदी कर रहे हैं और संसद में जिस स्तर पर जाकर उन्होंने बोला वो मोदी की बौखलाहट को दर्शाता है। दरअसल हर मोर्चे पर नाकाम सरकार की चौतरफा घेरेबंदी शुरू हो गयी है। और मोदी के पास उसकी कोई काट नजर नहीं आ रही है। 

इस मामले में पार्टी के भीतर से भी दूसरे नेता उनके न तो बचाव में खड़े हो रहे हैं और न ही कोई दूसरा साथ देता दिख रहा है। उल्टे चुनाव के बाद भविष्य में बनने वाली परिस्थितियों को लेकर जोड़-घटाव शुरू हो गया है। और इसी कड़ी में बीजेपी के संघ प्रिय नेता नितिन गडकरी ने अपने लिए बड़ी संभावना देखना शुरू कर दिया है। और उसको वो छुपा भी नहीं रहे हैं। गाहे-ब-गाहे जब भी मौका मिल रहा है कोई न कोई तीर छोड़ दे रहे हैं जो सीधे पीएम मोदी को आहत करती हुई दिखती है। इससे न केवल मोदी की बनी विराट छवि दरक रही है बल्कि उनके मनोबल पर भी बुरा असर पड़ रहा है। लिहाजा हर तरफ से मोदी कमजोर दिखाई दे रहे हैं।

ऊपर से विपक्षी दलों की एकजुटता उनके मंसूबों पर पानी फेर दे रहा है। इस मामले में सपा और बसपा के बीच का गठजोड़ उनके लिए किसी प्राणांतक प्रहार से कम नहीं था। इस कमी की भरपाई मोदी-शाह जोड़ी ने पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्व से करने की बात सोची थी। लेकिन नागरिकता बिल के बाद उत्तर-पूर्व में लगी आग में उनके सपनों के भी जल कर खाक हो जाने की आशंकाएं पैदा हो गयी हैं। बंगाल में सीबीआई के हस्तक्षेप के खिलाफ ममता के प्रतिरोध और उसमें हुई उनकी नैतिक जीत ने एक बार फिर उन्हें बड़ी ताकत दे दी है। ऐसे में जब हमलों से बचाव का मोदी को कोई रास्ता नहीं दिख रहा है और विपक्ष की घेरेबंदी है कि बढ़ती जा रही है और जो मोदी की बौखलाहट और उनके अनाप शनाप बोलने के तौर पर सामने आ रही है। चुनाव के नजदीक आने तक देश को राजनीति के पतन के नये पातालों में उतरने के लिए तैयार रहना चाहिए।








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