क्योंकि जनता कॉर्बन कॉपी मे विश्वास नहीं करती है!

पते की बात , , बृहस्पतिवार , 23-05-2019


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हिमांशु कुमार

लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं
 
भाजपा और उसके सहयोगी दल साढ़े तीन सौ सीटों के साथ सत्ता पर चुने गये हैं
 
भाजपा ने अपने पांच साल के कामों के आधार पर वोट नहीं मांगे
 
क्योंकि पांच साल भाजपा ने नोटबंदी जैसे काम करके आम आदमी की कमर तोड़ दी थी
 
भाजपा ने ऐसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा जिनसे जनता को कोई फायदा नहीं पहुंचने वाला
 
जैसे पुलवामा, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान वगैराह
 
इसे जनविरोधी राजनीति कहा जाता है
 

भाजपा जनविरोधी राजनीति करके भी चुनाव जीत पाई
 
इसका कारण क्या है ?
 
इसका कारण है कि विपक्ष जनपक्षधर मुद्दे और सच्चा विकल्प जनता के बीच रख ही नहीं पाया
 
इस बार भाजपा नहीं जीती
 
इस बार विपक्ष हारा है
 
विपक्ष ने भाजपा के बरक्स कोई विकल्प जनता के बीच रखा ही नहीं
 
भाजपा ने अपने लोगों से सड़कों पर मुसलमानों की लिंचिंग करवाई
 
मोदी ने इन मामलों में चुप रहकर और मोदी के लोगों ने गोहत्या के नाम पर होने वाली इन हत्याओं का समर्थन किया
मोदी के मंत्रियों ने हत्यारे गोरक्षकों का मंच से सम्मान किया

 
लेकिन क्या विपक्षी पार्टियों ने अपने मंच से मुसलमानों की लिंचिंग को एक मुद्दा बनाया ?
 
मायावाती अखिलेश राहुल गांधी या तेजस्वी यादव का कोई चुनावी भाषण या पोस्टर मैंने मुसलमानों की लिंचिंग के खिलाफ नहीं देखा
 
क्या ये पार्टियां हिन्दुओं के नाराज़ हो जाने से डर गईं
 
भाजपा आक्रामक साम्प्रदायिक है
 
विपक्ष को भी आक्रामक सेक्युलर होना पड़ेगा
 
सेक्युलरिज्म को जनता के मन में इस तरह से बिठा दीजिये कि भाजपा नफरत की बात करने में डरे
 
इसके अलावा किस विपक्षी पार्टी के पास नौजवानों को काम देने वाला और गाँव और किसानों की खुशहाली वाला आर्थिक माडल है ?

 
जो आर्थिक माडल भाजपा का है वही कांग्रेस अखिलेश मायावती ममता और लालू के लड़के का है
 
इस आर्थिक माडल में किसानों की तबाही, गाँव में बेरोज़गारी, ज़मीनें हड़पने के लिए आदिवासियों पर गोलियां चलेंगी ही
 
लेकिन विपक्ष ने आज तक कोई वैकल्पिक आर्थिक माडल पर बहस भी शुरू नहीं करी
 
वाम पार्टियां संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार करें यह समझ में आता है
 
लेकिन भारत की वामपंथी पार्टियों ने पूंजीवादी विकास आर्थिक मॉडल को भी अपना लिया है
 
तो अगर विपक्षी दल भी भाजपा वाला ही आर्थिक माडल और हिन्दुओं को खुश करने वाली बातें ही करने वाले हैं
 
तो जनता भाजपा की कार्बन कापी विपक्ष को क्यों चुने
 
जनता ओरिजनल साम्प्रदायिक और पूंजीवादियों को क्यों ना चुने ?
 
इसके अलावा भारत की राजनीति में मुलायम का बेटा, लालू का बेटा, सोनिया का बेटा, टीएन रामाराव का दामाद, मायावाती का भतीजा, पायलट का बेटा, सिंधिया का बेटा, गहलोत का बेटा ही विकल्प के रूप में क्यों होने चाहिए ?
 
नए नौजवानों को मौका विपक्ष क्यों नहीं देना चाहता ?

 
लालू के बेटे ने कन्हैय्या को हराने में जितनी ताकत लगाई उतनी अपनी पार्टी की जीत में नहीं लगाईं क्योंकि वह अपनी विरासत के लिए खतरा देख रहा था
इस कड़ी में आगे और भी लिखूंगा आज बस इतना ही

(हिमांशु कुमार गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। और आजकल हिमाचल प्रदेश में रहते हैं।)








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Umesh Chandola :: - 05-23-2019
*KRANTIKARI LOK ADHIKAR SANGATHAN* #चुनावी_राजनीति_औऱ_फासीवादी_आंदोलन_व_जीत ****************** एकाधिकारी पूंजी के मालिकों ने अपनी इच्छा व आकांछा को अंततः जनादेश में बदलवा ही दिया है ! उनकी इच्छा थी मोदी की अगुवाई में फासीवादी गिरोह सत्ता पर बैठे ! इसके लिए तमाम प्रपंच रचे गए ! अरबों खरबो रुपया पानी की तरह बहाया गया ! अपनी पुरानी पसन्द यानी कॉंग्रेस पार्टी को एकाधिकारी पूंजी द्वारा बहुत कम फण्ड दिया गया था। विपक्षी व वामपंथी तथा ढेर सारे संगठन व लोग चुनाव के जरिये फासीवादी ताकतों को सत्ता से बाहर करना चाहते थे ! चुनावी राजनीति के जरिये फासीवादी ताकतों को परास्त करने का ख्वाब देखने वाले अब नतीजों से हैरान - परेशान हैं ! या फिर जनता को ही कोसने में लगे हैं ! यह फासीवादी आंदोलन को नज़रअंदाज़ करना ही है ! एक बात जो बिल्कुल क्रिस्टल क्लियर थी वह यह कि धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की टॉप प्राथमिकता मोदी व इनका फासीवादी गिरोह था व है फण्ड का 90 फीसदी हिस्सा इन्ही को समर्पित था ! तब यह कैसे मुमकिन होता कि जब यह पूंजी 2014 रच चुकी हो तब 2019 न रच पाती ! दूसरी यह कि समाज में फासीवादी गिरोह की अगुवाई में एक फासीवादी आंदोलन मौजूद है यह ताकतवर स्थिति में मौजूद है ! तीसरी यह कि जब एकाधिकारी पूंजी का भरपूर समर्थन प्राप्त हो तब फासीवादी ताकतें जो कि षडयंत्र रचने में माहिर होती है के लिए यह क्यों असम्भव हो जाता कि कोई षडयंत्र न रचे ! वे अपनी गिरफ्त से सत्ता को कैसे निकलने देते ? चौथी कि जब विपक्ष खुद सर से पैर तक भ्रष्ट है ! हां ! फासीवादी ताकतें परमभ्रष्ट होती हैं ये भी मानना होगा ! इन सभी का सारा जोर चुनाव की जोड़ तोड़ के जरिये फासीवादियों को सत्ता से बाहर करने मात्र का था ! ये खुद भी एक हद तक प्रतिक्रियावादी हैं तानाशाह प्रकृति के हैं जन विरोधी है ! पांचवी जनता के अलग अलग हिस्सों के बीच कोई जुझारू जनवादी व क्रांतिकारी आंदोलन न तो मौजूद था ! ना ही इस पर किसी का कोई जोर था ! सरकारी वामपंथियों का अंतिम लक्ष्य तो पूंजीवाद की ही सेवा है ये तो जनवादी आंदोलन से भी किनारा कर चुके है ! विशेष बात यही है कि नई आर्थिक नीतियों के मसले पर ये सब एक है ! फिर इनके लिए कैसे ये संभव होता कि इन नीतियों की मुखालफत करते हुए ये कोई आंदोलन खड़ा करते ! जनवादी अधिकारों के संबन्ध में जो हमला मेहनतकश दलितों व मुस्लिमों पर किया गया , मज़दूर आंदोलन किसान आंदोलन का जो दमन किया गया तब ये नदारद थे !! इनकी हैसियत नहीं कि ये फासीवादी ताकतों को हरा दें ! यदि फासीवादी ताकतें सत्ता से बाहर होती या कमजोर हो जाती ! यह केवल उसी सूरत होता में जब एकाधिकारी पूंजी के मालिक ऐसा चाहते , अपनी पुरानी वफादार पार्टी कांग्रेस को लाना चाहते! दूसरी सूरत में फासीवादी ताकतें तभी सत्ता से बाहर होती जब कि फासीवादी आंदोलन के विरोध में कोई देशव्यापी क्रांतिकारी आंदोलन होता ! लेकिन तब यह जमीन पर मौजूद फासीवादी आंदोलन से टकराते हुए आगे बढ़ता ! फासीवादी आंदोलन को ध्वस्त करना इसका लक्ष्य होता और ऐसा करने में इसे पूंजीवाद से भी टकराना होता ! क्योंकि फासीवाद की वजह पूंजीवाद है !इस आंदोलन का उद्देश्य समाजवाद कायम करना होता ! ऐसा हुआ नहीं ! न ही इस दिशा पर जोर है ! इसलिए ही यह नतीजा सम्भव हुआ जो दिख रहा है !! फासीवादी आंदोलन का जवाब क्रांतिकारी आंदोलन है !! यह फिर साबित हुआ !! https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1291103927722836&id=100004697223216

Umesh Chandola :: - 05-23-2019
सन 1925 से स्वामी भक्ति पूर्वक अंग्रेजों की सेवा करने वाली आर एस एस की राजनीतिक शाखा भाजपा की आज ऐतिहासिक विजय हुई है । आज आर एस एस की राजनीतिक शाखा भाजपा के अध्यक्ष और जज लोया के केस में चर्चित अमित शाह जी ने इसे टुकड़े-टुकड़े गैंग (यानि जेएनयू छात्रों एवं उनके समर्थक सैकड़ों प्रोफेसरो )के ऊपर शुद्ध राष्ट्रवाद की विजय बताया है। ध्यान रहे आर एस एस ने तिरंगे को अशुभ बताया था और संविधान को भी कभी स्वीकार नहीं किया है । यही नहीं प्रथम सरसंघचालक हेडगेवार ने भगत सिंह के बलिदान को बेकार बताया था । शहीद भगत सिंह की छोटी बहन बीबी अमर कौर के बेटे प्रोफेसर जगमोहन सिंह ने 50 वर्षों से अपने मामा शहीद भगत सिंह एवं उनके साथियों के ऊपर गहन शोध किया है और वह फरवरी 2016 में जेएनयू में कन्हैया ,उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य आदि को खुला समर्थन देने पहुंचे थे ।उन्हें आज के भगत सिंह कहा था ।यही नहीं इसी वर्ष उन्होंने भारत-पाक मित्रता कैलेंडर का भी लुधियाना में अपने आवास पर उद्घाटन किया था । प्रोफेसर जगमोहन द्वारा चलाई जा रही वेबसाइट का लिंक नीचे दिया है जिसमें भगत सिंह के कई लेख पढ़े जा सकते हैं जैसे-- मैं नास्तिक क्यों हूं ? /भारत का स्वतंत्रता संग्राम और धर्म/ सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज / और अपनी मौत से ठीक 1 महीने पहले लिखा क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा जिसमें वह लेनिन की ही तर्ज पर बोल्शेविक क्रांति का जिक्र करते हैं । https://youtu.be/0t7XIhaPM8Y http://www.shaheedbhagatsingh.in/hindi.html वैसे अगर भाजपाई पढ़ने लिखने के कामों में भी दिलचस्पी लेते हो तो उन दिनों दर्जनों लेक्चर जेएनयू के एवं बाहरी विश्व प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा राष्ट्रवाद पर किए गए । उन लेक्चर्स को यूट्यूब पर लेक्चर ऑन नेशनलिज्म इन जेएनयू --/इस नाम से खोजा जा सकता है

Umesh Chandola :: - 05-23-2019
भारत में 70 सालों से जारी टाटा बिरला ( आधुनिक नाम अडानियो अम्बानियों का देश ) की सरकार फिर एक बार । मुबारक हो । मजदूर किसानों के बेटों के खून से सुरक्षा पाता देश। जहाँ सीमा पर कत्ल होने के लिए अमित शाह, राजनाथ , मुलायम , और चुनावबाज कम्युनिस्टो के बेटे नहीं भेज जाते ।भारत में आजादी के बाद जिसे हमने लोकतंत्र समझा वह दरअसल 1% पूंजीपति वर्ग की 99% मेहनतकश जनता पर नंगी तानाशाही थी जो आज भी जारी है। 1956 में शहीद भगत सिंह की बहन बीवी अमर कौर ने 50 दिनों तक मजदूरों किसानों के लिए अनशन किया और फिर 80 के दशक में संसद भवन में पर्चे फेंके । उसमें कहा कि ये वह आजादी नहीं थी इसके लिए मेरे भाइयों ने बलिदान दिया । यहां तक कि 1959 में केरल की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को 1935 तक प्रगतिशील रह नेहरू ने गिरा दिया यही काम इंदिरा गांधी ने 1975 मे किया और यही काम बहुत लगन से मोदी जी 2014 से कर रहे हैं । हमने लोकतंत्र को केवल चुनावी लोकतंत्र तक सीमित कर दिया है । वह भी 1/ 6 लोकतंत्र । आपको पता होगा कि लोकतंत्र के तीन अंग होते ह--- न्यायपालिका, कार्यपालिका , विधा byयिका । इसमें से कार्यपालिका से ही आम जनता का रोज ब रोज का पाला पड़ता है--जैसे तमाम सरकारी विभागों के अधिकारी ,पुलिस के छोटे से लेकर बड़े से बड़े अधिकारी तहसीलदार ,डीएम ,एसडीएम, सचिव से लेकर मुख्य सचिव तक के आएएस , आइपीएस, आइएफएस । लेकिन इन बेहद महत्वपूर्ण लोगों का तो जनता चुनाव करती है ना इनको वापस बुला सकती है । और तो और वह इनका ट्रांसफर तक नहीं कर सकती । जबकि चाहिए यह कि 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद बने और 1956 तक कायम रहे सोवियत संघ की तरह, न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका तीनों अंगों का चुनाव और इन अंगों के अधिकारियों के वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिले । यही नही, तमाम योजनाएं बनाना जैसे कितने , किस प्रकार के स्कूल कहां बनेंगे या कौन सा अस्पताल कहां बनेगा या नहीं बनेगा यानि हर छोटी से छोटी बड़ी से बड़ी बात जनता ही तय करें । बिल्कुल स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप । तमाम चीजों को चूंकि जनता ही पैदा करती है तो उसका वितरण भी जनता के ही हाथों में होना चाहिए । यही है रोजाना का लोक तंत्र । असली वाला लोकतंत्र । इस सवाल को कन्हैया कभी नहीं उठाने की हिम्मत कर सकता है। कारपोरेट चैनलों में तब कन्हैया को जगह नहीं मिल सकती थी । न सीपीआई से टिकट ही मिल सकता था ।तो क्या आश्चर्य कि यह सवाल हमारी तथाकथित चुनावबाज ,संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टिया उठा सकती थी। देखें.... pachhas1998.blogspot.com / साहित्य / प्रगतिशील लोक मंच का घोषणा पत्र, पूंजीवादी लोकतंत्र बनाम समाजवादी लोकतंत्र ,आम चुनाव राजनीतिक दल, आम चुनाव और सांप्रदायिकता