मोदी का जादू या विपक्ष की असफलता

विश्लेषण , , बृहस्पतिवार , 23-05-2019


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बसंत रावत

चौकीदारमय देश एक बार फिर नमोमय हो गया। चुनाव के नतीज़े बहुत लोगों को हज़म नहीं हो पा रहे हैं। होते भी कैसे कुछ लोग इसे सुनामी भी तो कह रहे हैं- सुनामी यानी तबाही। खासकर कांग्रेस और महागठबंधन के लिये 17वीं लोक सभा के नतीज़े सचमुच किसी सुनामी से कम नही हैं। अपमानजनक हार कहना तो कम होगा। राजनीति में हार-जीत के साथ अपमान का घूंट भी पीना ही पड़ता है। कहते हैं मोदी जी ने कई बार अपमान के घूंट पिये हैं जिससे वे भारत की राजनीति में अपराजेय बन गए हैं। ये इस देश में, आज तक की राजनीति के इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। इन्होंने 2002 से पराजय का स्वाद नहीं चखा। अपमान को अमृत मानकर पीने वाले इस दस लाख का सूट पहने वाले राजनैतिक फ़क़ीर ने अभी तक,आज तक किसी भी चुनाव में कोई हार नहीं देखी। है न बड़ी बात? ऐसे त्यागी, महात्मा, राजऋषि को चाहने वालों का अपना एक बड़ा वर्ग है सिर्फ अपने देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में। यहां तक कि पाकिस्तान में भी। यकीन न हो तो जाकर इमरान खान से पूछ लो।
उनके मुरीद सब जगह हैं। लॉजिम है वे सब जगह दिखते हैं। और अब तो वे विश्व के लीडर भी हैं। कहीं से भी चुनाव जीत सकते हैं। ये सिद्धि उन्होंने कैसे हासिल की? इसके लिये तपस्या करनी पड़ती है भई। कभी-कभी कैमरे के सामने भी। बरना यह कैसे पता चलेगा कि सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिये गुजरात के वड़नगर में एक पुण्य आत्मा ने अवतार लिया था।
लेकिन सवाल ये है कि अकेले मोदी ने ये कमाल कैसे कर दिखाया? बड़ा सवाल ये है कि क्या हम इस "चॉय बेचने वाले चौकीदार" को जानते हैं। क्या सचमुच इस विलक्षण मोदी फेनोमेना को समझते हैं? किस बला का नाम है मोदी? बुद्धिजीवी उसे कैसे देखते, समझते आये हैं? राजनैतिक दल मोदी का कैसे आकलन करते आये हैं? इन सवालों के जवाब मेरे पास नहीं हैं क्योंकि मेरे पास सिर्फ कुछ अनुत्तरित सवाल हैं।

इतना तय है कि मोदी कुछ अलग चीज है। इंसान से अलग, इंसानों से ऊपर। ये उनकी तारीफ नहीं हो रही है सिर्फ विवेचना की जा रही है।
असल में मोदी कोई राजनैतिक व्यक्ति भर नहीं हैं। प्रधानमंत्री होकर भी वो महज़ एक प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक हैं। वो एक ऐसा शख्स है जो अपनी धार्मिकता को ओढ़ने, दिखाने, भुनाने में कोई कंजूसी नहीं करता। ये मोदी का कालिंग कार्ड है आखिर वो ही तो अकेला युगपुरुष भारत को जगतगुरु के ऊंचे पॉयदान पर स्थापित करने वाला है। इस लिए केदारनाथ में भी "हर हर मोदी "का नाद सुनने को मिलता है। अच्छा तो नहीं है पर क्या करें। भक्तजनों को कौन रोक सकता है। इन भक्तों के कंधों पर चढ़ कर ही वे केदारनाथ की गुफा में तपस्या कर नई ऊर्जा लेकर लौटे हैं।  भोले को किसने देखा, मोदी तो सब जगह है।  और मोदी के अपने भक्त हैं,कट्टर भक्त, शायद भोले भंडारी से कहीं ज्यादा। यही बात उनको अन्य राजनेताओं से अलग करती है।
अगर हम सिर्फ राजनेता के तौर पर उनकी खूबियों को देखना चाहते हैं तो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की खासियत यह है कि वे सिर्फ वाजपेयी के प्रधानमंत्री नहीं हैं, यानी हिंदुओं के हृदय सम्राट तो पहले से ही हैं, विकास पुरुष भी हैं जिन्होंने 13 सालों तक गुजरात को वाइब्रेंट मोड़ में रख कर दिल्ली के लिये राजनैतिक रनवे तैयार किया। और बाद में, जब-जब जैसी जैसी समय की मांग हुई, वे ओबीसी के नेता के रूप में अपनी मार्केट कर महागठबंधन की हवा निकाल दी।
एक सफल बहुरुपिये के रूप में वे नए नय किरदारों में बड़ी कुशलता के साथ अपने को ढाल सके। प्रधान सेवक, चौकीदार, फ़क़ीर- सब कुछ- हर रोल में जनता से संवाद करते रहे- मन की बात का तो क्या कहना। बहुत बतियाते रहे हैं साल भर रेडियो पर।

मोदी महज एक व्यक्ति नहीं है। एक मोदी में कई मोदी समाए हुए हैं। जो सब पर भारी पड़ रहे हैं। कोई अचरज की बात नहीं, देश में नमो मोदी का नाद गूंजने लगा है। इसी लिये ये मुमकिन हुआ है कि दिग्विजय हासिल कर वे लौट आये हैं फिर से त्यागपूर्ण भाव से अगले पांच साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी की शोभा बढ़ाने के लिये। नमो-नमो फ़िल्म का पार्ट 2 शुरू होता है। ये फ़िल्म पूरे पांच साल तक चलेगी। आनंद लीजिये। क्योंकि आपने इसी फिल्म को देखना पसंद किया।
(बसंत रावत अहमदाबाद में दि टेलिग्राफ के ब्यूरो चीफ रहे हैं।)

 








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