लेख लिखकर अब जोशी ने पढ़ाया मोदी को राजधर्म का पाठ, संघ-बीजेपी के अंदरूनी खेमे में हलचल

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, बुधवार , 11-07-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। पीएम मोदी को एक बार फिर राजधर्म की याद दिलायी गयी है। इस बार बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य, सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने इस काम को किया है। उन्होंने “पावर पालिटिक्स” नाम की ई मैगजीन में 8 पेज का एक लेख लिखा है। जिसका शीर्षक है- “राजधर्म: शासकों को कैसा व्यवहार करना चाहिए, प्राचीन भारत से सबक।” 

इसमें उन्होंने न केवल राजधर्म बल्कि विचार-विमर्श और असहमति, लोगों की भूख और भय से रक्षा और महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर भी राजाओं के कर्तव्यों को लेकर अपने विचार दिए हैं। इसके पहले 2002 में प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को तब राजधर्म की याद दिलायी थी जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उस दौरान वहां भीषण दंगे हुए थे।

इस लेख के सामने आने के बाद बीजेपी और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच हलचल शुरू हो गयी है। ये बताता है कि वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता जोशी नरेंद्र मोदी सरकार की मौजूदा दिशा से सहमत नहीं हैं। इस लेख को जो वाल्मिकी के रामायण, व्यास के महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से सीख की बात करता है, बीजेपी के संस्थापक सदस्य का मोदी सरकार के प्रति विचार के तौर पर देखा जा रहा है।

उन्होंने लेख में साफ तौर पर कहा है कि राज्य से जुड़े हुए महत्वपूर्ण मसलों पर लोगों की बोलने की आजादी और बहस-मुबाहिशे में खुली भागीदारी राजा के सुशासन के लिए एक बुनियादी शर्त थी।  

लेख में विचार-विमर्श, असहमति, भूख और भय से लोगों की रक्षा और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को उठाया जाना सरकार को एक टेलर दिखाने की कोशिश का हिस्सा बताया जा रहा है। क्योंकि माना जा रहा है कि इन सारे मोर्चों पर मोदी सरकार नाकाम हुई है।

उन्होंने एक जगह वाल्मीकि के हवाले से कहा है कि “वाल्मीकि के मुताबिक राजा तानाशाह नहीं हो सकता है। हम रामायण में पाते हैं कि राज्य की नीति को आकार देने के क्रम में राजा मंत्रियों, मनीषियों और सेना के प्रमुख अफसरों से सलाह-मशविरा करता है। ”

लेख में इस वाक्य को मोटे हरफों में लिखा गया है। और बताया जा रहा है कि इसे संघ और बीजेपी के मुख्यालयों में बड़े स्तर पर प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है। इसके जरिये ये बताने की कोशिश है कि एक अनुशासित और कैडर आधारित पार्टी जो कभी अपने आंतरिक लोकतंत्र के लिए जानी जाती थी को नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने कैसे दो आदमियों तक सीमित कर दिया है।

ऐसे समय में जबकि देश में लिंचिंग की बहार आयी हुई है जोशी ने मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दिए गए राजधर्म के सबक को एक बार फिर याद दिलाने की कोशिश की है। वो लिखते हैं कि “राजा को अपनी प्रजा की उसके खुद के भय से, एक दूसरे के भय से और उन चीजों के भय से जो इंसानी नहीं हैं रक्षा करनी चाहिए।” 

जोशी का कहना है कि यही राजधर्म का मूल है: “जैसा कि पहले कहा गया है शासन का उद्देश्य इस बात को सुनिश्चित करना है कि लोगों की ‘भय से रक्षा हो, क्योंकि भय में जीवन गुजारने से बुरा इंसान के लिए कुछ नहीं हो सकता है।’ जब ये उत्पीड़न और हिंसा की परिस्थिति पैदा कर देता है तो उसके बाद महाभारत सत्ता के इस्तेमाल और उसके विरोध की वैधता की सीमा की जांच करता है।”

इस भविष्यदर्शी पैराग्राफ को गौरक्षकों और दूसरे लिंच मॉब को ध्यान में रखते हुए पढ़ा जा सकता है। बताया जा रहा है कि बीजेपी के अंदरूनी सर्किल के ह्वाट्सएप ग्रुपों में ये वायरल हो चुका है।

जोशी यहीं नहीं रुकते। वो कहते हैं कि “महाभारत के मुताबिक शासन का मुख्य उद्देश्य भय से आजादी की परिस्थिति का निर्माण है जिसमें हिंसा का भय भी शामिल है। दूसरे शब्दों में इसका मुख्य उद्देश्य छोटी मछलियों का बड़ी मछलियों से रक्षा करना है। और इस प्रक्रिया में इस बात को ध्यान में रखना है कि राज्य खुद ही बड़ी मछली में न तब्दील हो जाए। ऐसा होने पर उत्पीड़न और आतंक के रास्ते राज्य अधर्म में पतित हो जाएगा।”

बार-बार अधर्म पर जोर देना और उसमें किसानों को लंबी पीस के एक धागे के रूप में उदाहरण के तौर पर पेश करना इस बात को दिखाता है जैसे मोदी सरकार का रीयलटी चेक हो रहा हो।

जोशी ने लिखा है कि “जब राजा गरीबों के आंसू पोछता है, पुराने को खारिज कर खुशी का वातावरण पैदा करता है तब उसके स्तर पर इस तरह के व्यवहार को राजा का धर्म कहा जाता है।” 

एक जगह जोशी कहते हैं कि “राजा को पहले खुद अनुशासन में बने रहने की कोशिश करनी चाहिए और उसके बाद ही अपने मातहतों और प्रजा को अनुशासित करने का प्रयास करना चाहिए। अगर वो अपनी कमियों को महसूस किए बगैर ऐसा करता है तो वो उपहास का विषय बन जाता है और उसे हमेशा इस बात को याद रखना चाहिए।”

भारत को मैक्यावली नहीं बल्कि कौटिल्य की है जरूरत

जोशी इस बात पर जोर देते हैं कि राजधर्म का उनका मतलब धार्मिक कतई नहीं है वो सुशासन के वास्तविक सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। वो कौटिल्य के हवाले से लिखते हैं कि “पूरे भारतीय इतिहास के दौर में सामाजिक कल्याण और राजा के व्यक्तिगत चरित्र पर सबसे ज्यादा जोर रहा है।”

इस मौके पर वो चाणक्य नीति की अवधारणा का खंडन करने से भी नहीं चूकते- अमित शाह के समर्थक जिस कौशल के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं- जोशी लिखते हैं कि “हमें कौटिल्य को भारत का मैक्यावेली कहना बंद करना चाहिए। सच्चाई बिल्कुल दूसरी है।”

कौटिल्य चेतावनी देते हैं कि “राज्य द्वारा अपनी शक्तियों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल....असंतोष, अशांति और विद्रोह को जन्म देता है।” जोशी कहते हैं कि “ जोर एहतियात के उपायों पर होना चाहिए और यहां तक कि तमाम उपायों के बाद भी अगर विद्रोह खड़ा हो जाता है तो लोगों को सामूहिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इसकी बजाय उनके साथ नरमी बरती जानी चाहिए।”

महिलाओं के सम्मान की रक्षा

जोशी अपने लेख का एक हिस्सा महाकाव्यों में शासन और महिलाओं के कल्याण के बारे में कही गयी बातों पर केंद्रित किया है।

“महिलाओं के जीवन और उनके सम्मान की सुरक्षा शासन का प्राथमिक लक्ष्य है और महाभारत में बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ‘एक राजा जिसका राज्य रो रहा है और चिल्लाती हुई औरतें अपने बेटों और पतियों जो केवल चिल्ला और रो सकते हैं, के सामने से जबरन ले जाई जा रही हों। इसका मतलब वहां कोई शासन नहीं है।’ और भीष्म इसमें जोड़ते हैं, लोगों की रक्षा का अगर वादा किया गया है और राज्य उसमें नाकाम होता है तब ऐसा राज्य न हो तभी अच्छा है।”

हालांकि ये लेख कठुआ और उन्नाव रेप मामलों के राष्ट्रीय मुद्दा बनने से पहले आया था। लेकिन इस पैरा को मोदी सरकार के लिए रिमाइंडर के तौर पर देखा जा रहा है कि वो कहां नाकाम हो रही है।

मजबूत नेता

जोशी लिखते हैं कि “जैसे केवल एक चक्के से रथ आगे नहीं बढ़ सकता है उसी तरह से राजा अकेले राज्य को नहीं संचालित कर सकता है।”

इस पर बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता जो मोदी से नाराज होने के बावजूद कैबिनेट के हिस्से बने हुए हैं का कहना था कि “ ये उस आदमी के लिए बहुत कड़ी फटकार है जिसमें खुद के एक ‘मजबूत नेता’ होने का भ्रम पैदा हो गया है।”

जोशी का ये लेख फरवरी में प्रकाशित हुआ था लेकिन इस पर अभी हाल में लोगों का ध्यान गया है। ऐसा तब हुआ जब इसे एक आरएसएस के ह्वाट्सएप ग्रुप द्वारा आगे बढ़ाया गया और फिर वहां से ये संघ के दायरे में वायरल हो गया।

सूत्रों का कहना है कि जोशी जिन्हें संघ का बेहद करीबी माना जाता है अभी तक मोदी सरकार की कार्यप्रणाली के बारे में चुप्पी साध रखे थे अब वो अपना एक स्टैंड ले रहे हैं। हालांकि उनकी सलाह बेहद परेशानी पैदा करने वाली है। लेकिन “राष्ट्रवादी” सरकार महान महाकाव्यों के ज्ञान को दरकिनार नहीं कर सकती है।

(वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार स्वाति चतुर्वेदी का ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में बिजनेस स्टैंडर्ड में छपा था।)




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