आखिरी चरण में खुल गयी मोदी और शाह की कलई

ख़बरों के बीच , , शुक्रवार , 17-05-2019


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महेंद्र मिश्र

चुनाव का आखिरी चरण आते-आते बीजेपी की कलई खुल गयी है। अपने फायदे के लिए ज्यादा से ज्यादा चरणों वाला चुनाव कार्यक्रम बनवाने का मोदी का फैसला अब खुद उन्हीं पर भारी पड़ता दिख रहा है। असली मुद्दों पर बात न कर नकली मुद्दों को सामने लाने की कोशिश में उनकी स्थिति हास्यास्पद से ज्यादा लाल बुझक्कड़ों वाली हो गयी है। इसका नतीजा यह है कि देश का एक प्रधानमंत्री अपने आखिरी दौर में लोगों को जोकर सरीखा दिखने लगा है। और उसकी बातें बीरबल के चुटकुलों को भी मात देने लगीं हैं। कई जगहों पर तो वह मुल्ला नसीरुद्दीन की याद ताजा कर देते हैं। इस पूरे दौरान उनकी हरकतों में मनोरंजन के साथ-साथ हर किस्म का हास्य मौजूद था। हालत यह हो गयी कि एक स्थिति के बाद उनकी इन कपोल-कल्पित कहानियों पर खुद उनकी पार्टी के लोग भी प्रतिक्रिया देने से बचने लगे। 

लेकिन जब समाज में एक तरह का युद्ध चल रहा हो और दांव पर लोगों की जिंदगियां लगी हों तो इन हाथी मारा, पेड़ उखाड़ा सरीखी कहानियों से उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता है। लिहाजा बहुत जल्द ही लोग न केवल उनकी रडार और डिजिटल सरीखी बेसिर पैर की कहानियों से ऊब गए बल्कि एक ऐसे प्रधानमंत्री को चुनने के लिए खुद पर शर्मिंदगी भी महसूस करने लगे जिसने देश और उसकी राजनीति को इन हालात में लाकर खड़ा कर दिया है। 

मोदी को लगा था कि सातवें चरण तक विपक्षी दल और उसके नेता थक हार कर बैठ जाएंगे। और सरकारी संसाधनों और कारपोरेट की दौलत के बल पर वह आखिरी समय तक बढ़-चढ़ कर पूरे चुनाव अभियान की अगुआई करेंगे। इसी गुणा गणित के हिसाब से उन्होंने आखिरी दौर में उन कठिन सीटों को रखवाया था जहां अतिरिक्त जोर की आवश्यकता थी। और वह भी इस उम्मीद के साथ कि विरोध के बाद भी संगठित ताकत के बल पर उन्हें अपने कब्जे में कर लिया जाएगा। लेकिन यह रणनीति उन पर ही भारी पड़ गयी। उनके सारे संसाधन धरे के धरे रह गए। बाहरी और संगठित ताकत के बल पर बंगाल को जीत लेने की उनकी कोशिश ने अब सूबे में उनकी बची संभावनाओं पर भी पानी फेर दिया है।

बंगाल हिंसा को अंजाम किसने दिया यह सब कुछ अब आईने की तरह साफ है। कार्यक्रम से एक दिन पहले का बीजेपी के एक कार्यकर्ता का सामने आया वीडियो पूरी तस्वीर को साफ कर देता है। जिसमें वह कार्यकर्ताओं का आह्वान करता हुआ देखा जा सकता है। वीडियो में वह आटा-फाटा ग्रुप को विशेष रूप से निर्देश देता है। जिसमें हिंसा की हर आशंका से निपटने के लिए तैयार रहने की बात कही गयी है। और सबसे अहम बात यह थी कि रोड शो को प्रशासन की अनुमति तक हासिल नहीं थी। एक ऐसे कार्यक्रम में जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को शामिल होना था। उसकी बुनियादी शर्तें ही पूरी नहीं की गयी थीं। बताया जाता है कि स्थानीय बीजेपी नेताओं ने स्थानीय पुलिस को उसकी सूचना भी देना जरूरी नहीं समझा। और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बाकायदा चुनौती देते हुए बंगाल में उस दिन रोड शो का ऐलान करते हैं। ये सारी घटनाएं बताती हैं कि पार्टी ने पहले से ही पूरी हिंसा की तैयारी कर रखी थी। 

ईश्वरचंद्र विद्यासागर कालेज पर हमला और उनकी मूर्ति को ध्वस्त किया जाना इस हिंसा का चरमोत्कर्ष था। बताया जा रहा है कि इस हमले को अंजाम किसी बाहरी समूह ने दिया है। क्योंकि लोगों का कहना है कि बंगाली समुदाय का कोई शख्स ईश्वर चंद्र विद्यासागर के साथ इस तरह के व्यवहार के बारे में सोच भी नहीं सकता है। लिहाजा शक बिहार और यूपी से जुटाई गई बीजेपी कार्यकर्ताओं की भीड़ पर जाता है। और उसने देखते-देखते इतिहास की उस विरासत को छिन्न-भिन्न कर दिया। जिस पर बंगाल ही नहीं बल्कि पूरा देश गर्व करता है। इसके जरिये बीजेपी ने अपने असली चरित्र को भी जाहिर कर दिया है। वैसे भी बीजेपी की विचारधारा और विद्यासागर की सोच में 36 का रिश्ता है। 

विद्यासागर नवजागरण के अगुआ थे। एक ऐसे दौर में वह जातीय व्यवस्था के खिलाफ खड़े थे जब इसकी जड़ें बेहद गहरी थीं। वह दलितों को भी संस्कृत पढ़ाए जाने के पक्ष में थे। और इसका खामियाजा उन्हें कई बार अपनी नौकरी गवांकर भुगतना पड़ा था। तमाम परेशानियों के बाद भी उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। 21 वीं सदी में भी अपने मॉडल राज्य में दलित दूल्हों को घोड़ी पर न चढ़ने देने वाली  बीजेपी दलितों को संस्कृति पढ़ाने के पक्षधर विद्यासागर के साथ भला कैसे खड़ी हो सकती है?

इसी एक हरकत से बीजेपी का असली चेहरा सामने आ गया है। सभ्य और सुसंस्कृत बंगाली समुदाय के लिए अब यह समझना मुश्किल नहीं है कि वह किस तरह की बर्बर ताकत को अपने सूबे में घुसने का रास्ता साफ कर रहा था। अमित शाह का जो रोड शो पहले पार्टी के लिए वोटों की बरसात करने वाला था वही बंगाल में आखिरी चरण की सभी सीटों पर पलीता लगाता दिख रहा है। इस मामले में ममता बनर्जी के साहस, हौसले और धैर्य की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। उन्होंने अमित शाह और मोदी के हिंसक मंसूबों का उन्हीं की भाषा में जवाब देने का जो रास्ता चुना उससे बीजेपी के दोनों शीर्ष नेताओं के हौसले पस्त हो गए हैं।

लेकिन इस मामले में चुनाव आयोग बिल्कुल नंगा होकर सामने आ गया है। इस घटना ने उसके पतन की आखिरी कहानी लिख दी। बंगाल में न केवल उसने आपाकालीन प्रावधानों का इस्तेमाल किया बल्कि उसका पूरा फायदा सत्तारूढ़ बीजेपी और खासकर मोदी को पहुंचाने का काम किया। जिसमें उसने एक दिन पहले चुनाव प्रचार की समाप्ति की घोषणा तो जरूर की लेकिन मोदी की आखिरी दिन की पहले से तय चार सभाओं को समायोजित करने के बाद। कोई एक संस्था कैसे मरती है और फिर वह सड़कर बदबू करने लगती है मौजूदा चुनाव आयोग उसका जिंदा सबूत है।










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