मोदी जी! सवालों के घेरे में आपकी चौकीदारी है, चौकीदार नहीं

राजनीति , , बृहस्पतिवार , 21-03-2019


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जनचौक ब्यूरो

मोदी की पुरानी फितरत रही है। किसी मुद्दे का जवाब देने की जगह उसे उलझा देना। या फिर उसे एक ऐसे मुद्दे के तौर पर पेश कर देना जिससे वह अपना पूरा वजूद ही खो दे और इस प्रक्रिया में एक  ऐसे मुद्दे में तब्दील हो जाए जिसका फायदा खुद उनको मिलने लगे। यही गुजरात में उन्होंने किया और अब यही केंद्र में करने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात किसी ने भूली नहीं होगी कि गुजरात में मोदी किस तरह से अपने किसी निजी मसले को पूरे गुजरातियों की अस्मिता और उसके सम्मान से जोड़ दिया करते थे। अपने ऊपर लगे आरोप को 5 करोड़ गुजरातियों का अपमान बता देते थे। ठीक वही फार्मूला उन्होंने चौकीदार वाले नारे के मामले में भी अपनाया है।

अमूमन तो यह बात सही है कि विपक्ष और खासकर राहुल गांधी के “चौकीदार चोर है” के नारे का मोदी द्वारा नोटिस लिया जाना ही इस मुद्दे की सफलता है। यह बात साबित करती है कि मुद्दे का जनता के बीच व्यापक असर हुआ है। और सत्ता प्रतिष्ठान ने उसकी काट भी तलाशनी शुरू कर दी है। लेकिन मोदी की कोर टीम ने “मैं भी चौकीदार” का जो विकल्प पेश किया है वह किसी भी रूप में कारगर साबित होता नहीं दिख रहा है।

इसके जरिये अपने ऊपर लगे आरोप का जवाब देने की जगह मोदी चौकीदारों को ढाल बनाकर पेश कर रहे हैं। मोदी के अगर इस तर्क को मानें तो फिर कोई चौकीदार चोर हो ही नहीं सकता। लेकिन क्या यह बात सच है? क्या कई बार खुद चौकीदार ही चोरी की साजिश में पकड़े नहीं जाते। या कभी ऐसा हुआ है कि किसी चौकीदार के चोरी में पकड़े जाने पर सारे चौकीदार नाराज हो गए हों या फिर उस घटना को सभी चौकीदारों को चोर बताने के रूप में देखना शुरू कर दिया हो। तब फिर भला पीएम मोदी अपने से जुड़ी किसी घटना को सभी चौकीदारों से क्यों जोड़ रहे हैं। आपकी किसी चोरी की जवाबदेही किसी दूसरे चौकीदार को क्यों लेनी चाहिए। चूंकि उन्होंने खुद को चौकीदार कहा था लिहाजा सवालों के घेरे में उनकी चौकीदारी है न कि सारे चौकीदार। 

हां, इस तरीके से मोदी “मैं भी चौकीदार” के बहाने न केवल राफेल के मसले को पृष्ठभूमि में धकेल कर चौकीदार के सम्मान-अपमान का एक नया मुद्दा खड़ा कर दे रहे हैं बल्कि इस प्रक्रिया में अपने ऊपर लगे आरोपों को दूसरों में भी बांटने की साजिश कर रहे हैं।

अब अगर व्यापम घोटालेबाज शिवराज सिंह चौहान चौकीदार हैं, पीडीएस घोटाले के आरोपी रमन सिंह और पनामा कालाधन मामले में फंसा उनका बेटा अभिषेक सिंह भी चौकीदार हैं। बलात्कार और यौन शोषण के आरोपी एमजे अकबर भी चौकीदार हैं तो समझा जा सकता है कि ये किस तरह की चौकीदारी है। और यह पूरा नारा किसको फायदा पहुंचा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में सत्ता और उसके प्रतिष्ठान के साथ खड़े सारे चोर चौकीदार बन जाएंगे और पूरी जनता आरोपी। और अंतत: चौकीदारों की पूरी जमात के ही बदनाम हो जाने का खतरा है। 

लेकिन इस मामले में विपक्ष को उसका काउंटर चौकीदार और उसकी विशेषता पर बहस करने की जगह राफेल मुद्दे को फिर से उठाकर उसके तथ्यों और तर्कों के साथ सामने लाना चाहिए।

साथ ही केवल इस मुद्दे पर सीमित होने की जगह जनता से जुड़े तमाम बुनियादी सवालों को भी उठाते रहने की जरूरत है। जहां यह सरकार पूरी तरह से नाकाम हुई है। इन मुद्दों पर पर्दा डालने के लिए सरहद को गरम करना एक तरह से उसकी स्वीकारोक्ति थी। 

वरना चौकीदार के तौर पर मोदी को देशवासियों को अभी कई जवाब देने बाकी हैं:

मसलन

1-राफेल सौदे में 500 करोड़ रुपये की कीमत का विमान 1620 करोड़ रुपये का कैसे हो गया?

2- सरकारी कंपनी एचएएल के साथ 30 हजार करोड़ के आफसेट के करार को छीनकर अनिल अंबानी को क्यों दे दिया गया?

3-देश के छह एयरपोर्टों के रखरखाव की जिम्मदारी बगैर किसी नीलामी के एकतरफा तरीके से अडानी को कैसे दे दी गयी ?

4- पूंजीपतियों का तीन लाख करोड़ का कर्जा चौकीदार ने किस तर्क के साथ माफ करने का फैसला लिया। जबकि देश के किसान कर्जे के बोझ के चलते आत्महत्याएं कर रहे हैं। 

5- घाटे में चल रही और पहले से ही भ्रष्टाचार में डूबी गुजरात की कंपनी जीएसपीसी को अलग से 6.5 हजार करोड़ रुपये एलआईसी से क्यों दिलवाया गया।

7- मुनाफे में चल रही तमाम नवरत्न कंपनियां कैसे इतने घाटे में आ गयीं कि अब उन्हें अपने कर्मचारियों के लिए तनख्वाह तक के लाले पड़ गए हैं।

इसी तरह के ढेर सारे सवाल हैं जिन्हें चौकीदार को देने हैं। जो उनके कार्यकाल में हुए हैं। लेकिन अब बारी जनता की है। वही फैसला करेगी।  








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