तिरंगे झंडे को लेकर भागवत ने बोला झूठ

ख़ास रपट , , बुधवार , 19-09-2018


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जनचौक ब्यूरो

राष्ट्रीय ध्वज के साथ रिश्ते के मामले में आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने तथ्यों को भीषण रूप से तोड़ा-मरोड़ा है और इस कड़ी में उन्होंने आरएसएस संस्थापक डॉ. केबी हेडगेवार की ओर से 21 जनवरी 1930 को जारी सर्कुलर को गलत तरीके से पेश किया है। वास्तव में सर्कुलर, भागवत का तिरंगे के प्रति आरएसएस के प्रेम के दावे का समर्थन करने की जगह ये दिखाता है कि आरएसएस ने खुद को तिरंगे से दूर रखने के लिए अनुचित रास्ता अपनाया और अपने भगवा ध्वज या केसरिया झंडे को गले लगा लिया।

17 सितंबर को विज्ञान भवन में भारत के भविष्य पर आरएसएस के दृष्टिकोण पर तीन चरणों में अपनी बात रखने के पहले हिस्से में भागवत ने कहा कि “जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज के लिए प्रस्ताव पारित किया (पूर्ण स्वतंत्रता), तो डाक्टर साहेब (हेडगेवार) ने एक सर्कुलर जारी कर सभी शाखा के लोगों को तिरंगे के साथ मार्च करने का निर्देश दिया था।”

भागवत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 19 दिसंबर 1929 के प्रस्ताव का जिक्र कर रहे थे जिसने भारतीय राष्ट्रवादियों से ब्रिटिश साम्राज्य से बिल्कुल स्वतंत्र पूर्ण स्वराज की मांग की थी। उसके बाद लाहौर में 31 दिसंबर 1929 को जवाहर लाल नेहरू ने तिरंगे को फहराया था। कांग्रेस ने भारतीयों से 26 जनवरी 1930 को “स्वतंत्रता दिवस” के रूप में मनाने का आह्वान किया था। 

इस प्रगति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हेडगेवार ने 21 जनवरी 1930 को एक सर्कुलर जारी किया था जिसमें उन्होंने पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव का स्वागत करते हुए अपने स्वयंसेवकों को उस साल की 26 जनवरी को बैठकें आयोजित करने और तिरंगे की जगह भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज मानकर अपना सम्मान प्रकट करने के लिए कहा था।

“इस साल कांग्रेस ने स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बनाने का संकल्प लिया है और उसकी कार्यसमिति ने घोषणा की है कि पूरे हिंदुस्तान (...) में रविवार 21-1-30 स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभी शाखाएं रविवार दिनांक 21-1-30 को सायंकाल ठीक 6 बजे अपने संघ स्थान पर अपनी-अपनी शाखाओं के सभी स्वयंसेवकों की सभा लेकर राष्ट्रीय ध्वज का अर्थात भगवे ध्वज का वंदन करें।” 

मूल रूप से मराठी में लिखे गए इस सर्कुलर को एनएच पाल्कर द्वारा हिंदी में प्रकाशित हेडगेवार के चुनिंदा पत्रों के संकलन में छापा गया था। संकलन का शीर्षक-पत्ररूप व्यक्तिदर्शन- को 1989 में समर्पित आरएसएस कैडर पाल्कर की भूमिका के साथ प्रकाशित किया गया था। जिन्हें हेडगेवार के बारे में पहली पूरी जानकारी देने के लिए जाना जाता है। ये पुस्तिका हेडगेवार के निधन के तुंरत बाद 1964 में प्रकाशित हुई थी। इसकी भूमिका हेडगेवार के उत्तराधिकारी और आरएसएस के मुख्य विचारक एमएस गोलवलकर ने लिखी थी। उन्होंने पाल्कर को बचपन से समर्पित आरएसएस कार्यकर्ता के खिताब से नवाजा था।

भागवत द्वारा 1930 के आरएसएस के सर्कुलर को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाना विज्ञान भवन के आयोजन को मुख्य विचारधारात्मक मसलों पर संघ के रुख को व्याख्यायित करने के एक ऐसे प्रयास के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है जिन पर वो वैचारिक विरोधियों के निशाने पर होता है।

राष्ट्रीय ध्वज पर आरएसएस का रुख हमेशा से विवाद का मसला रहा है। जनवरी 2017 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने स्वतंत्रता के बाद पांच दशकों तक अपने मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराने के लिए संघ पर हमला किया था। उन्होंने दावा किया था कि “स्वतंत्रता के बाद 52 वर्षों तक आरएसएस नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया। वो भगवा झंडे को नमन करते रहे न कि राष्ट्रीय ध्वज को।”

हेडगेवार का पत्र।

उनके आरोप आधारहीन नहीं थे। पहले भी बहुत सारे मौकों पर आरएसएस तिरंगे के प्रति अपनी नापसदंगी जाहिर कर चुका है। साथ ही इस बात को भी स्पष्ट कर चुका है कि राष्ट्रीय झंडे का रंग भगवा होना चाहिए। क्योंकि ये रंग हिंदुत्व से जुड़ा हुआ है।

आरएसएस के मुखपत्र आर्गेनाइजर में 14 अगस्त 1947 में प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया था कि “ऐसे लोग जो भाग्य के लात से सत्ता में आए हैं वो हमारे हाथों में तिरंगा पकड़ा सकते हैं लेकिन इसे कभी भी हिंदुओं से न सम्मान मिलेगा न ही वो इसे अपनाएंगे। तीन शब्द अपने आप में अशुभ है और एक झंडा जिसमें तीन रंग हैं निश्चित तौर पर बेहद बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और एक देश के लिए बेहद खतरनाक होगा।”

उसी तरह से अपनी किताब “बंच ऑफ थाट” में गोलवलकर लिखते हैं कि “हमारे नेताओं ने देश के लिए एक नया ध्वज तय किया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? ये केवल बह जाने और नकल करने का मामला है.....हम श्रेष्ठ इतिहास के साथ एक प्राचीन और महान राष्ट्र हैं। तब क्या हमारे पास अपना कोई ध्वज नहीं था? इन हजारों सालों में क्या अपना कोई राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह नहीं बना? निश्चित तौर पर हमारे पास था। तब फिर हमारे दिमाग में ये बिल्कुल शून्यता, बिल्कुल निर्वात क्यों है?”

अपने भाषण में भागवत ने तिरंगे और भगवा ध्वज के बीच अंतर को भी बताने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भगवा ध्वज को स्वयंसेवक अपना गुरू मानते हैं जिसे हर साल गुरु दक्षिणा देते हैं। उसी समय उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आरएसएस हमेशा से राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करता रहा है। उन्होंने एक झटके में एक झूठ को प्रत्यारोपित कर हेडगेवार के 1930 के सर्कुलर को तोड़-मरोड़ दिया।       

(धीरेंद्र कुमार झा का ये मूल लेख अंग्रेजी में “दि कारवां’ में प्रकाशित हुआ था। इसे साभार लेकर यहां हिंदी में दिया जा रहा है।)

 










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