एनपीए अगर घोटाला है; तो ये सबसे ज्यादा आपके शासन में हुआ है मोदी जी !

राजनीति , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 14-12-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। झूठ बोलना जैसे प्रधानमंत्री मोदी का शगल हो गया है। कल फिक्की की एक बैठक में भी इसी तरह का एक बड़ा झूठ बोला जब उन्होंने एनपीए के संकट के लिए पिछली यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही उसे बड़ा घोटाला भी करार दे डाला। जबकि हकीकत ये है कि खुद उनकी सरकार द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों में तस्वीर बिल्कुल उलटी है। जिसमें बैंकों के एनपीए में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा उनकी सरकार के दौर में सामने आया है। कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि अगर पीएम इसको घोटाला मानते हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि उनकी नांक के नीचे ये घोटाला कैसे चल रहा है।

आपको बता दें कि वित्त मंत्रालय द्वारा 24 अक्तूबर 2017 को “सतत विकास के लिए मजबूत एवं बड़ा आर्थिक आधार और सुधार” शीर्षक से जारी एक रिपोर्ट में इसका विस्तार से जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए में 2015 से बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को फिक्की की बैठक में बैंकों के एनपीए संकट के लिए यूपीए सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। साथ ही उन्होंने उसे सबसे बड़ा घोटाला करार दिया था। मोदी ने कहा कि “ये एनपीए यूपीए सरकार का सबसे बड़ा घोटाला था। कामनवेल्थ, टूजी, कोयला सभी से ज्यादा बड़ा घोटाला। ये एक तरह से सरकार में बैठे लोगों द्वारा उद्योगपतियों के माध्यम से जनता की कमाई की लूट थी।” इसके आगे उन्होंने कहा कि “ये आजकल एनपीए का जो हल्ला मच रहा है वो पहले की सरकार में बैठे अर्थशास्त्रियों की, इस सरकार को दी गयी सबसे बड़ी लायबिलिटी है।” प्रधानमंत्री ने इस मौके पर यूपीए पर कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों को ही ऋण देने का आरोप लगाया।

अब आइये उन आंकड़ों पर नजर दौड़ाते हैं जिन्हें खुद मोदी सरकार और उनके वित्त मंत्रालय ने मुहैया कराए हैं। 24 अक्तूबर 2017 को जारी इस रिपोर्ट में 2015 के बाद सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में एनपीए संकट के बारे में विस्तार से बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक एनपीए जो मार्च 2015 में 5.43 फीसदी के हिसाब से बढ़ोतरी के साथ 278466 करोड़ था वो जून 2017 में 13.69 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 733137 करोड़ हो गया।

इसके साथ ही इसमें एक बात और बतायी गयी है जो ध्यान देने की है। बजाय इन कर्जों को पूंजीपतियों से वसूलने के मोदी सरकार ने उनकी माफी का रास्ता अपनाया। इस कड़ी में 2014-2015 से 2017-2018 की पहली तिमाही तक 3079080 करोड़ रुपये बैंकों को दिए गए। जबकि इसी में बताया गया है कि यूपीए के शासन में दस सालों के भीतर केवल 196937 करोड़ रुपये दिए गए। इसके साथ ही अपने तरीके को यूपीए से बेहतर बताया गया है।

इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक दूसरे आंकड़े में भी जून 2013 में सरकारी बैंकों का एनपीए 176000 करोड़ बताया गया है। जबकि जून 2017 में ये बढ़कर 829338 करोड़ हो गया। यानी इन चार सालों में 371 फीसदी की बढ़ोतरी।

इसी तरह से निजी बैंकों के एनपीए में भी देखा गया है। यहां भी सितंबर के अंत में 100481 करोड़ रुपये एनपीए के तौर पर दिखाया गया है। जबकि सितंबर 2013 में ये महज 22020 करोड़ था। इसमें भी 356 फीसदी के हिसाब से बढ़ोतरी हुई है।

किसके दौर में एनपीए बढ़ा है और अगर ये घोटाला है तो किसने किया है ये तस्वीर अब बिल्कुल साफ हो गयी है। इसमें चुनिंदा उद्योगपतियों को ऋण मुहैया कराने का आरोप कितना यूपीए पर बैठता है और कितना इसकी दोषी मोदी सरकार है। ये एक जांच का विषय हो सकता है। लेकिन अगर यूपीए के दौर में ऋण ही उतनी मात्रा में नहीं दिए गए हैं तब इन आरोपों के घेरे में सीधे मौजूदा सरकार आ जाती है। वैसे भी ये बात किसी से छुपी नहीं है कि इस देश में उद्योगपतियों के नाम पर अब कुछ घराने ही बचे हैं जिन्हें सीधे तौर पर सरकार की हर नीति का लाभ मिल रहा है।

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के कल के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है। उसने कहा है कि प्रधानमंत्री अगर इसे घोटाला करार दे रहे हैं तो उन्हें बताना चाहिए कि उनकी नांक के नीचे इतना बड़ा घोटाला कैसे हो रहा है। साथ ही उसने कहा है कि मोदी को ये भी बताना चाहिए कि पिछले तीन सालों में उन्होंने ऐसे डिफाल्टरों के 188287 करोड़ रुपये क्यों माफ किए?










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