केंद्र ने शुरू की ओएनजीसी के निजीकरण की कवायद

ख़ास रपट , नई दिल्ली, मंगलवार , 06-11-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। जिस बात की आशंका थी आखिर वही हुआ। सरकार ने नवरत्न कंपनी ओएनजीसी के निजीकरण की शुरुआत कर दी है। इस काम को अभी छोटी ईकाइयों से किया जाना है। इससे जुड़े पेट्रोलियम मंत्रालय के प्रस्ताव पर कई उच्चस्तरीय बैठकें हो चुकी हैं।

मंत्रालय के प्रस्ताव के मुताबिक इसके तहत ओएनजीसी ने 149 छोटे और सीमांत क्षेत्रों के निजीकरण की योजना है। ये ऐसी गैस फील्डें हैं जिनमें अभी ज्यादा तेल और गैस का उत्पादन नहीं होता है। सरकार ने इन्हें बड़ी निजी कंपनियों के हवाले करने का फैसला कर लिया है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 12 अक्तूबर को पीएम मोदी के साथ हुई एक बैठक में मंत्रालय ने एक प्रेजेंटेशन दिया जिसमें बताया गया था कि ओएनजीसी का 95 फीसदी उत्पादन 60 बड़ी फील्ड से होता है जबकि 149 छोटी फील्ड बाकी 5 फीसदी उत्पादन में सहयोग देती हैं।

इस बैठक में इन छोटी फील्ड को प्राइवेट फर्मों को दिए जाने का प्रस्ताव दिया गया है और कहा गया है कि ओएनजीसी को बड़ी फील्डों में केंद्रित करने देना चाहिए। साथ ही ओएनजीसी को उत्पादन को बढ़ाने के लिए टेक्नॉलाजी पार्टनरों को भी शामिल करने के बारे में सोचने की सलाह दी गयी।

बैठक के बाद नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के नेतृत्व में छह सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया गया जिसे 10 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। जिसमें वो पूरी योजना के साथ सामने आएगी।

बैठक में भाग लेने वाले दूसरे लोगों में वित्त मंत्री अरुण जेटली, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, ओएनजीसी चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर शशि शंकर, ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) सीएमडी उत्पल बोरा और पेट्रोलियम सेक्रेटरी एमएम कुट्टी शामिल थे।

एक्सप्रेस सूत्रों के मुताबिक कैबिनेट सेक्रेटरी पीके सिन्हा, आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार, कुट्टी, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स के डायरेक्टर जनरल वीपी जॉय और शंकर कमेटी के दूसरे सदस्य हैं।

उसी के साथ मंत्रालय ने इन सदस्यों के सामने एक वर्किंग पेपर पेश किया है जिसमें उसने ओएनजीसी द्वारा खोजी गयी छोटी फील्डों के एकमुश्त बिक्री की सलाह दी है। इसके साथ ही इसमें ये भी बताया गया है कि ओएनजीसी बड़ी फील्डों में प्रवेश करने के लिए समझौते कर रहा है। और वो अपनी टेक्निकल सर्विस विंग के लिए एक दूसरी सहयोगी विंग तैयार करना चाहता है।

पिछले अक्तूबर में तब के डीजीएच अतानू चक्रवर्ती ने इस तरह की 15 उत्पादन फील्डों की पहचान की। जिनमें कुल मिलाकर 791.2 मिलियन टन कच्चा तेल और 333.46 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस थी। इन सभी फील्डों को प्राइवेट हाथों में बेचा जाना था।

लेकिन ये प्रक्रिया बीच में ही रोक दी गयी जब ओएनजीसी ने डीजीएच की प्राइवेट हाथों में नीलामी के प्रस्ताव का विरोध कर दिया। उसने कहा कि उसे भी नीलामी में शामिल किया जाना चाहिए। और निजी कंपनियों के समान ही उसे भी छूट मिलनी चाहिए।

इसके साथ ही डीजीएच ने ओएनजीसी की 44 आयल फील्ड की भी पहचान की थी जिसमें उत्पादन के काम को बढ़ाने के लिए प्राइवेट साझीदारों को शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ने की सलाह थी। मौजूदा समय में ओएनजीसी में पैसे का संकट खड़ा हो गया है। क्योंकि इस बीच उसे हिंदुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन को खरीदना पड़ा है साथ ही गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन को 2017-18 में वित्तीय कर्जे से उबारना भी पड़ा है।

अगस्त 2017 में इसने जीएसपीसी के केजी बेसिन गैस ब्लाक के 80 फीसदी हिस्से को 7738 करोड़ रुपये में हासिल कर लिया है। इसके साथ ही एचपीसीएल में सरकार की कुल 51 फीसदी हिस्सेदारी को उसने 36915 करोड़ रुपये में ले लिया है। इसके चलते कंपनी में नया वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। 

सरकार शायद इसी मौके की तलाश में थी। जिसके तहत सबसे पहले उसे घाटे में ले आना था फिर उसके निजीकरण की शुरुआत करनी थी। 149 क्षेत्रों के निजीकरण का प्रस्ताव इसी का हिस्सा है।         








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