क्या मृगमरीचिका बन कर रह जाएगी विपक्षी एकता?

ख़बरों के बीच , , बुधवार , 20-03-2019


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महेंद्र मिश्र

देश में विपक्षी एकता एक बार फिर खटाई में पड़ती नजर आ रही है। एक ऐसे मौके पर जबकि चुनाव के पहले चरण के नामांकन की शुरुआत हो चुकी है। सीटों की गणित के लिहाज से महत्वपूर्ण राज्यों में यह अभी भी दूर की कौड़ी बनी हुई है। यहां तक कि दलों ने सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशियों तक की घोषणा तक कर दी है। और उनके बीच किसी औपचारिक गठबंधन की कौन कहे अनौपचारिक तालमेल की उम्मीद भी बनती नहीं दिख रही है। सबसे बड़े सूबे यूपी में सपा-बसपा अपने रौ में हैं। तो कांग्रेस ने स्वतंत्र रूप से अपना चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। बिहार में आरजेडी इस बात से खफा है कि कांग्रेस वहां ज्यादा सीटें मांग रही है। और लेफ्ट के साथ भी तालमेल को लेकर कई अड़चने हैं। पश्चिमी बंगाल में ममता अकेले हैं तो कांग्रेस और सीपीएम के बीच तालमेल की संभावना भी प्रत्याशियों की घोषणाओं के साथ जाती रही।

लाख कोशिशों के बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर तो विपक्षी दलों में कोई गठबंधन नहीं ही हो पाया। बाद में इस समझ के साथ लोगों ने संतोष कर लिया कि क्षेत्रीय स्तर पर जो भी अगुआ दल हैं उनके नेतृत्व में इस काम को पूरा कर लिया जाएगा। और विपक्षी पार्टियां बीजेपी प्रत्याशी के खिलाफ विपक्ष के एक प्रत्याशी के होने की गारंटी करेंगी। लेकिन दलों के मौजूदा रुख को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि उनके नेता इस फार्मुले को ही भूल गए हैं। या फिर अपने निहित स्वार्थ में इतने अंधे हो गए हैं कि उसे याद करना भी जरूरी नहीं समझते। 

अमूमन तो देश में मोदी के निरकुंश राज के खिलाफ खड़े होने की पहली और आखिरी जिम्मेदारी विपक्षी दलों की बनती थी। लेकिन एक हद तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और बिहार में तेजस्वी यादव को छोड़ दिया जाए तो बाकी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। हालांकि इसके अलग-अलग कारण थे। कहीं सीबीआई और ईडी की चाबुक से कंट्रोल किया गया तो कहीं अपनी अकर्मण्यता थी। बीजेपी के खिलाफ सुसंगत तरीके से लड़ने का अगर किसी ने काम किया है वो उदार, सेकुलर और लोकतांत्रिक जमातें थीं। जिन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक विरोध के अपने तेवर को बरकरार रखा। उसके इस परिश्रम का नही नतीजा है कि बीजेपी रक्षात्मक भूमिका में है। उसने बीजेपी को कदम बा कदम चुनौती दी।इस तबके ने न केवल उसके झूठ का पर्दाफाश किया बल्कि हर महत्वपूर्ण मौके पर उसके सामने आईना लेकर खड़ा हो गया। लेकिन जब बारी चुनाव की आयी और भूमिका विपक्षी दलों की शुरू हुई तो इस मोर्चे पर भी वे फिसड्डी साबित होती दिख रही हैं।

इस बात में कोई शक नहीं है कि गठबंधन के मामले में सबसे बड़ी भूमिका कांग्रेस की बनती थी। उसकी जिम्मेदारी थी कि वह अपने प्रभाव वाले राज्यों में विपक्षी दलों के साथ तालमेल करती और जरूरत पड़ने पर अगर कहीं कुछ गड़बड़ हो रही थी तो उसे भी आगे बढ़कर संभालती। लेकिन कौन कहे इस भूमिका में उतरने के कांग्रेस नेतृत्व खुद अपनी ही समस्या को हल नहीं कर सका। कहते हैं न प्रथम ग्रासे मच्छिका पात:। कुछ यही हुआ उसके साथ जब दिल्ली में आप के साथ गठबंधन का मामला सामने आया।कांग्रेस ने एकतरफा तरीके से गठबंधन की किसी संभावना को ही खारिज कर दिया। दिल्ली देश की राजधानी है और यहां की कोई भी बात पूरे देश को प्रभावित करती है।

यहां गठबंधऩ का न हो पाना पूरे देश में विपक्षी एकता के लिए एक नकारात्मक संदेश था। उसके बाद यूपी का भी यही हाल हुआ। एसपी-बीएसपी और आरएलडी के गठबंधन ने कांग्रेस से पूछना भी जरूरी नहीं समझा। हालांकि अमेठी और रायबरेली की सीट को छोड़कर उन्होंने जरूर एक सद्भावना संदेश दिया। लेकिन पूरे सूबे के स्तर पर बीजेपी के सफाए के लिए विपक्षी एकता को कैसे परवान पर ले जाया जाए उस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया। अब जबकि प्रियंका गांधी चुनाव प्रचार में उतर चुकी हैं। और उससे पहले उन्होंने भीम आर्मी मुखिया चंद्रशेखर से मुलाकात कर ली है तो तस्वीर और उल्टी हो गयी है। जानकारों का एक हिस्सा मान रहा था कि इससे सपा-बसपा दबाव में आ जाएंगे और गठबंधन करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। लेकिन मामला बिल्कुल उल्टा पड़ता दिख रहा है। कांग्रेस द्वारा एलायंस के लिए 7 सीटें छोड़ने के ऐलान के बाद आयी बीएसपी सुप्रीमो की प्रतिक्रिया यही बताती है।

अब मायावती किसी जेन्यून सोच के चलते ऐसी प्रतिक्रिया दी हैं या फिर उनके द्वारा इसे एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। कह पाना मुश्किल है। लेकिन जिस तरह से विपक्षी दल और उनके नेता अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने के लिए उद्धत हैं उससे लग रहा है कि उनके ऊपर कोई बड़ा दबाव काम कर रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मायावती को मोदी-शाह ने एक बार फिर सीबीआई का कोड़ा दिखा दिया है। और उन्होंने कहा है कि अगली सरकार बनने पर फिर कोई मुरौव्वत नहीं बरती जाएगी। शायद भविष्य का यही डर अब मायावती को ये सब हरकतें करने के लिए मजबूर कर रहा है।

जब पूरा अस्तित्व दावं पर लगा हो तब कुछ सीटों के कम ज्यादा होने पर पूरी एकता को कुर्बान कर देना किसी भी रूप में समझदारी नहीं कही जा सकती है। उन्हें यह बात जरूर समझनी चाहिए कि अगली बार वे गठबंधन करने लायक भी नहीं बचेंगे। राजनीति का भी क्या रूप होगा और नेताओं की जगह जेल में होगी या उनका घर कुछ भी कह पाना मुश्किल है। बावजूद इसके अगर विपक्षी नेता समझने के लिए तैयार नहीं हैं तो इससे बड़ी त्रासदी कोई दूसरी नहीं हो सकती है।








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