अस्मा जहांगीर : नहीं, तुम कहीं गई नहीं हो, इसलिए तुम्हे अलविदा नहीं कहा जा सकता!

विशेष , स्मृति शेष, रविवार , 11-02-2018


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नूर ज़हीर

हमारे भारतीय उपमहाद्वीप की एक आज़ाद और बुलंद आवाज़ पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्षा और जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता अस्मा जहांगीर का आज लाहौर में अचानक निधन हो गया। वे 66 साल की थीं। उनके निधन से पाकिस्तान ही नहीं हिन्दुस्तान के भी उदार, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और मानवाधिकार के लिए लड़ने वाले खेमे में शोक की लहर फैल गई है। प्रसिद्ध लेखक और एक्टिविस्ट नूर ज़हीर ने उन्हें सलाम करते हुए यह आलेख साझा किया है: संपादक  

अस्मा जहांगीर

तुम्हारा कद बहुत ऊंचा नहीं, बल्कि देखा जाए तो दरमियाने से कम ही था; भीड़ में होती तो तुम अक्सर नज़र न आती। जब तक जुलूस उस जगह तक नहीं पहुंच जाता जहां पुलिस या रेंजेर्स (पाकिस्तान की पैरा-मिलिट्री फ़ोर्स) उसे रोकते। तब तुम सबसे आगे होती, पुलिस अफसर से हाथ भर छोटी, मगर उसकी लाठी को दोनों हाथ से पकड़े, साथियों पर बरसने से रोके, हमकदम कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाती, शासकों की ताकत को ललकारती, मार खाने को उपस्थित, मार खाने वालों की तरफ से लड़ने के लिए तत्पर, छोटे कद और बुलंद ख्यालों की अस्मा जहांगीर;  नामी वकील,  ह्यूमन राइट्स के लिए लड़ने वाली इंसान, औरतों की बराबरी की लड़ाई की मज़बूत सिपाही।

तुमसे एक बार की ही मुलाक़ात है। वैसे दो बार और भी मिलना तय हुआ था, लेकिन आखिरी लम्हे में तुमने फोन करके बताया कि तुम्हे कहीं और जाना है। कहां जाना है, जब यह सुना तब विश्वास हो गया की तुम्हारा वहां रहना ज्यादा ज़रूरी है; किसी निरपराध की बेल की कोशिश या ‘ब्लासफेमी’  में फंस गए मासूम के लिए उपस्थित रहकर, जनगन की आवाज़ बनना ज्यादा ज़रूरी काम तो है ही। न मिल पाने का दुःख तुम्हारी हिम्मत पर गर्व में दब गया। 

तीसरी बार मिली भी तो बस बीस एक मिनट के लिए, मुस्कुराती हुई, थोड़ी थकी क्योंकि दिनभर कोर्ट में लग गया था, ज़रा अस्त व्यस्त खिचड़ी बाल ठीक करने की कोशिश करती, क्षणों में सामने वाले का जायजा ले लेने वाली, मोटे चश्मे के पीछे से तेज़, बहुत ज़हीन आंखे. धीमी आवाज़ में बात करती, जो कचेहरी में शेरनी की दहाड़ की तरह गूंजती।


कब तय किया था तुमने की जीवन जाएगा तुम्हारा संघर्ष में? छात्र जीवन में तुमने जिया-उल-हक का समय झेला और महिलाओं को सिर ढंक कर रहना होगा इसके खिलाफ खड़ी हुईं; बेहया कहलाईं क्योंकि तुमने लाहौर शहर के मुख्य चौराहे पर दुपट्टों के अम्बार लगाकर आग लगाईं थी। क्या तब तुम्हे मालूम था कि तुम जद्दोजहद का वह सिपाही बनोगी जो कभी मोर्चा छोड़ नहीं पायेगा? 


कहते हैं की तुम्हारा उस कबीले से ताल्लुक है जो कुकेज़ी कहलाते हैं और जिनका काम चट्टानों को काट कर, पत्थर की सिले ढोने से लेकर, मूर्तियाँ तराशने तक होता है। देखने वाले तो शायद यही कहें की तुमने अपने खानदानी काम से कोई ताल्लुक़ नहीं रखा। लेकिन समझने वाले जानते हैं की तुमने बिल्कुल वही किया; जिंदगी भर तुम समाज और कानून नाम के कठोर पत्थर को तराश कर जिंदगी की खूबसूरती को उकेरती रहीं। नहीं, न छैनी न हथोड़ा कोई औजार कोई साधन नहीं था तुम्हारे हाथ, बस एक जिद थी की जो बेजान है, नीरस है उसमे जान फूंकनी है; जो अन्याय तले कुचला है, शासकों का दमन सह रहा है, उसके साथ खड़ा होना है।

लोग यह भी कहेंगे की तुम्हे भला यह सब करने की ज़रूरत ही क्या थी? अच्छे, खाते पीते घर में जन्म लिया, वकील बनी, ज़मीन जायदाद के झगडे निपटाती, खुद कमाती, आराम की जिंदिगी जीती, क्यों बेकार उन लोगों के लिए लड़ने की ठानी जो तुम्हारी फीस तो दूर, तुम्हारी टैक्सी का भाड़ा भी नहीं दे सकते थे। कुछ लोग यह भी कहेंगे की अपने देश के मजलूमों की लड़ाई लड़ती वहां तक भी ठीक था, सरहद पार से अमन हो, शान्ति रहे इसकी कोशिश करने की तो बिल्कुल तुम्हे ज़रूरत नहीं थी। भला इस सब में औरत का क्या काम, जो करेगा सो शासक वर्ग करेगा।

 

लेकिन तुम्हारा यकीन कि महिलायें ही सबसे ज्यादा अमनपसंद होती हैं, क्योंकि ‘युद्ध में लड़े चाहे कोई भी हारती केवल औरत है।’ यह वाक्य तुम्हारा उस छोटी सी मुलाक़ात का दिल में आजतक गूंजता है।


इतने पर भी तुमने बस कहां किया; उठी लड़ने के लिए उनके लिए जिन्हें उनका देश ही भेजकर कहां याद रखता है? भला भेजे हुए जासूस भी कोई देश अपनाता या स्वीकारता है? तुम्हारा हठ की जासूस हो या मुखबिर, सबसे पहले तो इंसान है।

 

कितने मोर्चे पर मौजूद रहती थीं तुम, कितने लाम पर लड़ रही थीं? सवाल यह भी करते लोग, की क्या जीत रही हो? मज़ाक उड़ाते ‘कभी तो जीता भी करो कोई मुक़दमा!’ शायद सौ में से 2-3 फीसद जीत नसीब होती हो, या शायद उतनी भी नहीं।लेकिन अपने संघर्ष इंसान इसलिए भी चुनता है की वह अपने ज़मीर का कैदी होता है, वह अन्याय देख नहीं सकता, दमन सह नहीं सकता। जीत मिले या न मिले, दुनिया को यह दिखाना और जताना ज़रूरी होता है की हम अभी मोर्चे पर मौजूद हैं, हम अभी हारे नहीं हैं, हम बाकी हैं; और जब तक हमारा यह जज्बा बाकी है तुम अन्यायी इस ग़लतफ़हमी में न रहना की तुम जीत गए हो!

 

नहीं, तुम कहीं गई नहीं हो, इसलिए तुम्हे अलविदा नहीं कहा जा सकता! 

अस्मा जहांगीर, तुम्हे सलाम!

लड़ाई जारी है साथी!

 










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