भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) विधेयक: घूसखोरी रोकेगा या घूसखोरों का कवच बनेगा?

बड़ी ख़बर , , शुक्रवार , 10-08-2018


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लोकमित्र गौतम

अंततः भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन का बिल गुरुवार 9 अगस्त 2018 को राज्यसभा से पारित हो गया । अब इसे लोकसभा में भेजा जाएगा। वहां से मुहर लगने के बाद यह कानून बनेगा । सरकार नए बिल की अहमियत यह कहकर बहुत बता रही है कि अब रिश्वत देने वाले को भी सात साल तक की सजा हो सकेगी। पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह कहते हैं कि अभी तक जो कानून बने थे उनमें रिश्वत देने वाले पर कार्रवाई की बात नहीं थी। यह कहकर सरकार बिना किसी दूसरे का इंतज़ार किये खुद ही अपनी पीठ थपथपाये जा रही है । निःसंदेह इस विधेयक में ऐसा प्रावधान है कि ऐसे व्यक्ति को कम से कम तीन साल की सजा हो सकती है जो घूस देने की कोशिश करता है । लेकिन सरकार इस बात से चुप्पी साध गयी है कि यह भ्रष्टाचार निवारण [संशोधन ] विधेयक सिर्फ बड़े नौकरशाहों को ही नहीं दूसरे आम सरकारी नौकर को भी इसके चोर दरवाजे से निकाल बाहर किया है।

दरअसल नए बिल में सरकारी कर्मचारियों को बचाने के लिए विशेष प्रावधान हैं । क्योंकि सीबीआई या अन्य कोई जांच एजेंसी किसी अफसर के खिलाफ तभी जांच शुरू कर सकती है जब वह संबंधित अथॉरिटी से अनुमति ले ले । हद तो यह है कि रिटायर्ड अफसरों के मामले में भी यही नियम लागू होगा। अब अगर सरकारी अफसर के खिलाफ पुलिस जांच नहीं कर सकेगी तो सवाल है कि फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध रोक कैसे लगेगी । क्योंकि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक़ घूसखोरी के मामले में पहले नंबर पर तमाम सरकारी महकमे ही हैं ।

यह बात अगर कोई विदेशी संस्था या संगठन न भी कहे तो भी आप लोगों से बात करके देख लीजिये आम भारतीय यही मानता है कि वह कोई भी बुनियादी सेवा, जो किसी सरकारी महकमे से मिलनी है तब तक नहीं मिलती जब तक कि सम्बन्धित कर्मचारियों की मुट्ठी गर्म न की जाए । ये  तो उन सेवाओं की बात है जिन्हें पाना आम आदमी का कानूनन हक हैं  । 

उन सेवाओं के बारे में तो आप बिना रिश्वत दिए पाने की सोच ही नहीं सकते जो सेवाएं आपको सरकारी कर्मचारी के विवेक पर मिलनी तय हैं । मसलन पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस या जन्म/मरण सर्टिफिकेट हासिल करने को डिजिटल कर देने से कुछ सुधार तो अवश्य हुआ है  लेकिन जो पुलिसकर्मी आपकी पासपोर्ट अर्ज़ी के पते की पुष्टि करने आता है उसे आपका पता उस समय तक सही दिखायी नहीं देता जब तक कि उसकी मुट्ठी गर्म न हो जाये ।

पिछले दिनों पासपोर्ट ऑफिस में एक ऐसा व्यक्ति मिला पुलिस ने जिसके वेरीफिकेशन के बारे में 8 बार लिखा कि घर बंद पाया गया या कि सम्बन्धित व्यक्ति की पहचान कोई पड़ोसी नहीं कर सका । इस पृष्ठभूमि में जरा सोचिये ऐसे पुलिस वाले के विरुद्ध शिकायत की अनुमति उसका कौन सा अफसर देगा ?  या तो सरकार जानती नहीं या जान-बूझकर नहीं जानना चाहती कि किसी दफ्तर में कोई व्यक्तिगत रूप से भर घूसखोर नहीं होता बल्कि घूस का प्रसाद आमतौर पर पूरे ऑफिस में तमाम लोगों को उसकी हैसियत के हिसाब से बंटता है ।

पुलिस थानों की हकीकत तो यह है कि थानेदार को बकायदा महीने के हिसाब से ठेका दे दिया जाता है कि वह कम से कम इतनी उगाही करे जो नीचे से लेकर ऊपर तक बंटती है । क्या ऐसे किसी थानेदार के विरुद्ध कार्रवाई की अनुमति कोई एसपी या डीआईजी देगा ? क्यों देगा ? क्या कोई जानबूझकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारता है ? ऐसे में यह बिल भ्रष्टाचार के विरुद्ध कैसे प्रभावी हो सकता है जो कहता है कि किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो जांच आरंभ करने के लिए केंद्र या राज्य सरकार की पहले मंज़ूरी लेनी होगी ।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तथाकथित ‘एकल निर्देश’ (सिंगल डायरेक्टिव) को रद्द किये जाने से पहले यह सुविधा संयुक्त सचिव व उससे ऊपर के कर्मचारियों के लिए ही उपलब्ध थी, लेकिन नये संशोधन से बाद यह सुविधा सभी (सेवा में या अवकाशप्राप्त) कर्मचारियों को मिलेगी, यानी भ्रष्टाचार रोधी एजेंसियां किसी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत मिलते ही जांच शुरू नहीं कर सकतीं । उन्हें जांच करने (और फिर नियमित मुक़दमा दर्ज करने) के लिए पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी ।

देश में जिस भी किसी व्यक्ति को सरकारी महकमों के काम काज के ढंग का जरा भी भान है उसे मालूम है कि किसी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध किसी सरकारी तंत्र से कार्रवाई की अनुमति हासिल कर लेना उल्टी गंगा बहाने जैसा दुष्कर होगा । बहुत आम सा सवाल है कि अगर जांच की अनुमति प्रदान करने वाला अधिकारी ही भ्रष्ट हो या सरकार किसी अधिकारी को बचाना चाहे तो भ्रष्टाचार पर विराम कैसे लगेगा?

पता नहीं यह बात कांग्रेस को क्यों समझ में नहीं आ रही जो उसने चर्चा में इन बातों को लाना जरूरी नहीं समझा । इस आशंका को लगभग छोड़ते हुए बिल पर चर्चा के दौरान सदन में कांग्रेस के उप नेता आनंद शर्मा ने मोदी सरकार से पूछा कि वह लोकपाल के मामले में क्या कर रही है ? कांग्रेस इस बहस के दौरान पूरे समय इस बात से परेशान रही कि उसके नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकपाल चयन समिति का सदस्य क्यों नहीं बनाया जा रहा ? क्योंकि खड़गे मोदी की अगुआई में बनी समिति में विशेष आमंत्रित सदस्य हैं ।

कांग्रेस लोकायुक्त एक्ट 2013 के तथ्यों को जानते हुए यह उम्मीद कर रही है । इसके मुताबिक़ विपक्ष का नेता चयन समिति का सदस्य होता है, लेकिन उसकी पार्टी का लोकसभा में संख्या बल 55 या फिर कुल सदस्य संख्या का 10 फीसद होना चाहिए। जबकि कांग्रेस के सांसद इससे कम हैं । हो सकता है कांग्रेस इस बारे में इसलिए भी चुप्पी साध गयी हो क्योंकि पुराने बिल में संशोधन की कवायद 2013 में यूपीए कार्यकाल के दौरान ही शुरू हो गई थी ।

बिल पहले संसदीय समिति फिर लॉ पैनल और उसके बाद 2015 में सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया था । कमेटी की रिपोर्ट 2016 में आयी । 2017 में बिल को संसद में लाया गया, लेकिन इस पर कोई फैसला तब नहीं हो सका था। बिल की इस यात्रा से अंदाजा लगाया जा सकता कि अगर 2013 में बिल पास हुआ होता तो भी ऐसा ही कुछ होता । इसीलिए कांग्रेस ने इसका विरोध नहीं किया ।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सात दशक की आज़ादी के बावजूद भारत अति भ्रष्ट देश होने की अपनी छवि से मुक्ति नहीं पा सका है । नये संशोधन में एक अन्य समस्या यह भी है कि धारा 13 के सब-सेक्शन (1)(डी) को निकाल दिया गया है, जो ‘अपराधिक व्यवहार’ को इस तरह परिभाषित करता है कि बेईमानी से कोई ‘कीमती चीज़’ या ‘आर्थिक लाभ’ अर्जित करना । गौरतलब है कि निकाला गया अंश भ्रष्ट वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध एक मात्र प्रभावी हथियार था । बिना कोई विकल्प लाये इस अंश का निकाला जाना निराशाजनक है क्योंकि उच्च स्थानों में भ्रष्टाचार संस्कारित होता है और बहुत ही चुपचाप अंदाज़ में अंजाम दिया जाता है । इसलिए यह भ्रष्टाचार अधिकतर आय से अधिक संपत्ति के संदर्भों में ही पकड़ में आता है । ज़ाहिर है इन संशोधनों का स्वागत किया जायेगा, खासकर उन पूर्व बैंकरों द्वारा जो इस समय परेशान हैं कम्पनियों को ऐसे ऋण देने के लिए जो अदा नहीं किये गये हैं। 

इसके अतरिक्त ‘आय के ज्ञात स्रोत’ की परिभाषा को भी कमज़ोर कर दिया गया है क्योंकि इसमें संशोधन के ज़रिये ‘वैध स्रोत से आय’ को शामिल कर दिया गया है, बिना इसे परिभाषित किये । यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह गलतफहमी उत्पन्न होती है कि अघोषित व अवैध स्रोत से हुई आय पर अगर कर अदा कर दिया गया है तो वह आय वैध हो जाती है । फिर अगर कोई सरकारी कमर्चारी अपनी ड्यूटी अनुचित अंदाज़ में करता है जिसमें निर्धारित नियमों व प्रक्रियाओं का उल्लंघन हो और रिश्वत के लेनदेन का कोई सबूत न हो, तो वह कानून के दायरे में नहीं फंसेगा । क्या अगर यह अनुचित कार्य भविष्य में दी जाने वाली रिश्वत या रिटायरमेंट के बाद जॉब के वायदे के बदले में किया गया हो? इसलिए सेक्शन 13(1) में किया गया संशोधन भ्रष्टाचार के विरोध में संयुक्त राष्ट्र के अनुच्छेद 19 की भावना से टकराता है । 

नये संशोधन में है कि भ्रष्टाचार संबंधी मुक़दमा दायर किये जाने के बाद अदालत में दैनिक आधार पर ट्रायल होगा और पूरी अदालती प्रक्रिया दो वर्ष के भीतर पूरी की जायेगी ।  जहां यह संभव न हो तो संबंधित न्यायाधीश को ट्रायल लम्बा होने के कारण देने होंगे और वह अपने को अतरिक्त छह माह दे सकेंगे । यह सुनने में अच्छा व आदर्शवादी लगता है, लेकिन जब अदालतों पर ज़बरदस्त बोझ हो और निचली अदालतों में 2.84 करोड़ से अधिक मुक़दमे लम्बित हों तो फ़ास्ट ट्रैक अदालतों के लिए भी इस डेडलाइन का पालन करना कठिन हो जायेगा ।

शायद इसी वजह से केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इस विधेयक के बारे में कहा था कि यह बहुत कमज़ोर ड्राफ्ट किया गया है ।  लेकिन राज्यसभा में फिर भी इसे इसी रूप में  पारित कर दिया गया । सवाल है क्यों? दो संभावित कारण हैं – एक, इस कानून में संशोधन की मांग बहुत लम्बे समय से की जा रही थी ।  दूसरा यह कि संशोधन के अभाव में सार्वजनिक क्षेत्रों विशेषकर सरकारी बैंकों में निर्णय लेना कठिन हो रहा था । 

बहरहाल, संशोधन में एक अच्छी बात यह है कि रिश्वत देने वालों को भी सज़ा देने का प्रावधान है और उनके लिए सुरक्षा है जिन्हें रिश्वत देने के लिए मजबूर किया जाता है । लेकिन फिर एक पेंच है कि यह तभी संभव है जब घटना के एक सप्ताह के भीतर इसकी शिकायत कर दें । कुल मिलाकर फ़िलहाल तो यह संशोधन (सेवा में या रिटायर्ड) सिविल सर्वेन्ट्स की चिंताओं को ही दूर कर रहा है । 

(लोकमित्र गौतम वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मुंबई-दिल्ली में रहते हैं।)




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