सत्ता की कवायद के बीच गठबंधनों की तस्वीर

ख़बरों के बीच , , बुधवार , 22-05-2019


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महेंद्र मिश्र

पीएम मोदी ने कल ही अपने कैबिनेट के मंत्रियों का आभार भी व्यक्त कर दिया और उसी दिन एनडीए की बैठक भी हो गई। 39 दलों के इस गठबंधन ने प्रस्ताव पारित कर एक बार फिर मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास जाहिर कर दिया। दूर से देखने पर किसी को लग सकता है कि यह केवल औपचारिक बैठक थी। लेकिन सचाई यह है कि यह बिल्कुल राजनीतिक कार्यक्रम था जिसमें भूत से ज्यादा भविष्य पर निगाह थी। क्या विडंबना है जिस मोदी को पूरे चुनाव के दौरान बिल्कुल अकेले पेश किया जा रहा था वह 39 दलों के गठबंधन के साथ निकले। और जिस विपक्ष को कौरवी गठबंधन करार दिया जा रहा था वह महज 22 पर सीमित था। और उसमें भी चुनाव के दौरान कई दल एक दूसरे के खिलाफ थे। यह घटना बताती है कि तथ्यों और वास्तविकताओं से दूर अपने हितों चीजों को मोड़ने के लिए परिस्थितियों की किस तरह से तोड़ा और मरोड़ा जा सकता है।

बहरहाल पीएम मोदी ने एक बार फिर से सत्ता में आने की तैयारी कर ली है। उन स्थितियों के लिए भी तैयारी कर ली गयी है जब बीजेपी अकेले जरूरी बहुमत के आंकड़े से दूर रहे और उसे दूसरे सहयोगी दलों की सहायता की जरूरत पड़ जाए। इस तरह की स्थिति में डिनर के मौके पर तैयार एनडीए का यह प्रस्ताव काम कर सकता है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि अगर बहुमत नहीं भी मिलता है तो सबसे बड़ी पार्टी और सबसे बड़ा चुनावी पूर्व गठबंधन होने का तर्क पेश कर मोदी खुद को शपथ दिलवा लेंगे और उसके बाद बहुमत साबित करने के लिए राष्ट्रपति से एक लंबा समय ले लेंगे।

लेकिन चीजें इतनी आसान नहीं हैं। एनडीए तो छोड़िए खुद बीजेपी के भीतर भी नेतृत्व को लेकर एक दूसरा विचार काम कर रहा है। परसों आरएसएस के नंबर दो पदाधिकारी भैइया जी जोशी का नितिन गडकरी के घर पर जाकर उनसे मुलाकात करना बहुत कुछ कह रहा है। पूरे चुनाव के दौरान आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी अपने तरीके से कुछ संकेत दे रही थी। अब जबकि चुनाव संपन्न हो गए हैं और चीजें लागू होनी हैं तब उसने अपनी सोची रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। जिसमें एक संभावना ये भी जताई जा रही है कि बहुमत न मिलने की स्थिति में वह गडकरी या फिर राजनाथ सरीखे किसी दूसरे चेहरे को आगे कर सकता है।

और इस बात को सपोर्ट खुद एनडीए के भीतर से भी मिल सकता है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि शिवसेना और नीतीश कुमार तक मोदी के नाम पर एतराज जता सकते हैं। यह बात कितनी खुले रूप में आएगी कह पाना मुश्किल है लेकिन मोदी को लेकर उनका रिजर्वेशन पहले से ही जगजाहिर है। पिछले पांच सालों के दौरान सरकार के प्रति शिवसेना का विपक्ष सरीखा व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। और यह भी तय है कि सांप्रदायिकता को लेकर अलग-अलग तरीके से अपना एतराज जताने वाले नीतीश उसके सबसे बड़े चेहरे के साये से निजात पाने के किसी भी मौके को नहीं चूकेंगे। शिवसेना ने तो इस नजरिये से अपना बयान भी देना शुरू कर दिया है। यह बात उस समय खुलकर सामने आयी जब उसके प्रवक्ता ने एनडीए की बैठक में हिस्सा लेने के सवाल के जवाब में हमेशा बीजेपी को आगे किया और एक बार भी मोदी का नाम लेना जरूरी नहीं समझा।

संख्या बल कम पड़ने की स्थिति में मोदी ने जाते-जाते अपने लिए एक आखिरी संभावना भी विकसित कर दी जब उन्होंने सीबीआई के जरिये आय से अधिक संपत्ति के मामले में मुलायम सिंह और अखिलेश सिंह को बरी करवा दिया। माना जा रहा है कि शपथ लेने के बाद कमी पड़ने पर पहले सहमति के आधार पर इनसे समर्थन की कोशिश की जाएगी और नहीं मिलने पर फिर से सीबीआई का कोड़ा चलाया जा सकता है। मोदी टीम मायावती से लेकर टीआरएस के के चंद्रशेखर और वाईएसआरसी के जगन रेड्डी तक से संपर्क में है।

ऐसा नहीं है कि विपक्ष शांत बैठा है। अपने यूपीए और मोदी विरोधी दलों को एकजुट करने के साथ ही वह एनडीए की कमजोर कड़ियों से संपर्क साधने में लगा है। इसके अलावा उसका पूरा जोर गैर यूपीए और गैर एनडीए दलों को अपने करीब लाने पर है। इस मामले में एक तरफ खुद सोनिया गांधी पहल कर रही हैं। तो दूसरे बड़े और प्रभावशाली नेता शरद पवार को इस काम में लगाया गया है। इसके साथ ही कमल नाथ सरीखे दूसरे कांग्रेस नेता जहां-जहां काम आ सकते हैं उन मोर्चों पर उन्हें सक्रिय कर दिया गया है। टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू पहले से ही गठबंधन के सूत्रधार बने हुए हैं।








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