जयपुर की सभा में छाया रहा विरोध का खौफ, मन की बात में बदला पीएम का लाभार्थी संवाद

ज़रूरी ख़बर , , सोमवार , 09-07-2018


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मदन कोथुनियां

जयपुर। भव्य मंच, विशाल शामियाना, मंझे हुए कलाकार, अभिभूत करने वाली कहानियां और ढाई लाख दर्शक। मजमून किसी बड़े नाटक के मंचन की तरह था, लेकिन यह कथानक है जयपुर में हुए ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी जनसंवाद’ का। इस कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकार की 12 फ्लैगशिप योजनाओं के लाभार्थियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से रूबरू होना था, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। कार्यक्रम में मोदी ने तो लच्छेदार भाषण दिया लेकिन राजस्थान के 33 ज़िलों से आए लगभग 2.5 लाख लाभार्थियों में से एक को भी अपने मन की बात कहने का मौका नहीं मिला।

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने संवाद के नाम पर 12 लाभार्थियों की वीडियो रिकॉर्डिंग ज़रूर सुनवाई, जिसमें उन्होंने अलग-अलग योजनाओं से मिले लाभ का बखान किया। इन 12 लोगों को प्रधानमंत्री के साथ मंच पर फोटो खिंचवाने का मौका ज़रूर मिला। ‘संवाद’ के नाम पर हुए इस ‘स्वांग’ में प्रधानमंत्री की भी बराबर भागीदारी रही। उन्होंने मंच पर आए 12 लाभार्थियों तक से बातचीत करना मुनासिब नहीं समझा। ये लोग कतार से मंच पर चढ़े और फोटो खिंचवाकर नीचे उतर गए। यह सब बमुश्किल एक-डेढ़ मिनट में हो गया। 

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस कार्यक्रम की तारीफों के जमकर पुल बांधे। उन्होंने कहा, ‘‘जिस तरह का कार्यक्रम जयपुर में आयोजित किया गया है वह सराहनीय है। लाभार्थियों को सुनना अद्भुत है। कुछ लोग ऐसे हैं जो कभी भी अच्छे काम की सराहना नहीं करते, लेकिन सभी को लाभार्थियों की खुशी यहां देखनी चाहिए।’’ ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि सरकार को लाभार्थियों को प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए ही जयपुर बुलाना था तो इस कार्यक्रम का नाम ‘जनसंवाद’ क्यों रखा?

असल में इस आयोजन में पहले संवाद ही होना था, लेकिन मुखालफत के खौफ की वजह से इसमें बदलाव करना पड़ा। 23 जून को जब राजस्थान के मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने कार्यक्रम में लाभार्थियों को बुलाने की योजना बनाने के लिए ज़िला कलेक्टरों के साथ बैठक की तो कई अधिकारियों ने यह आशंका जताई कि यदि लाभार्थियों के साथ प्रधानमंत्री ने सवाल-जवाब किए तो सरकार के लिए असहज स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इस बैठक में यह बात भी सामने आई कि भीड़ सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी भी कर सकती है। इससे बचने के लिए कार्यक्रम में सिर्फ़ भाजपा की विचारधारा में आस्था रखने वाले लोगों को बुलाने की तरकीब निकाली गई। शनिवार को जो अभ्यर्थी जयपुर पहुंचे उनके नाम भाजपा के विधायक, सांसद और पदाधिकारियों ने ही छांटे थे। 

किसी प्रकार की असहज स्थिति से बचने के लिए सरकार ने प्रत्येक ज़िले से हर योजना के दो लाभार्थियों को बोलने की ट्रेनिंग दी। बाकायदा स्क्रिप्ट तैयार कर उन्हें डॉयलॉग रटाए। जिन 12 लाभार्थियों को प्रधानमंत्री के साथ संवाद के लिए चुना उन्हें जयपुर में विशेष रूप से दो दिन की ट्रेनिंग दी गयी। यही नहीं, लाभार्थी कोई हंगामा या नारेबाज़ी न कर दें, इस डर से भाजपा के विधायकों को अपने क्षेत्र से लोगों के साथ बैठने के लिए पाबंद किया। इतने इंतज़ामों के बाद भी सरकार के मन से हंगामा होने का डर नहीं निकला। कार्यक्रम में लाभार्थियों और प्रधानमंत्री के बीच में कोई संवाद नहीं हो पाया। कार्यक्रम में मुखालफत का खौफ सरकार पर किस हद तक हावी रहा इसका अंदाज़ा सभा स्थल पर काले रंग की सभी चीज़ों के निषेध से लगाया जा सकता है। 

‘‘काले कपड़े पहने किसी भी व्यक्ति को कार्यक्रम में प्रवेश नहीं मिला। सुरक्षाकर्मियों ने लोगों से काली बनियान और मोजे तक उतरवा लिए। काली पगड़ी पहने एक सिख लाभार्थी को तो अंदर जाने के लिए ऊपर भाजपा का दुपट्टा लपेटना पड़ा।’’

जालौर की रहने वाली सावित्री का कहना है कि उन्हें बताया गया कि-

‘‘अगर हम इस रैली में शामिल नहीं होंगे, तो मनरेगा के तहत दी जाने वाली हमारी मजदूरी हमेशा के लिए बंद कर दी जाएगी। तो, हमारे पास यहां आने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।’’

उदयपुर के रहने वाले तेजवीर का कहना है कि समारोह के लिए जिला कलेक्टर से जब व्यक्तिगत तौर पर निमंत्रण पत्र मिला तो उनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। तेजवीर ने कहा-

‘‘हम बहुत ही सरल लोग हैं और हमारे लिए किसी से भी इस तरह का निमंत्रण पत्र मिलना बहुत बड़ी बात है।’’ 

तेजवीर की तरह कई लोगों को कलेक्टर, विधायक, सरपंच या उनके क्षेत्र के किसी अन्य प्रभावशाली लोगों से ऐसे ही निमंत्रण मिले। प्रधानमंत्री के सामने शिकायत करने के लिए कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद भी कोई लाभ नहीं मिला था। झालावाड़ के संतोष का कहना था कि -

‘‘मेरी बेटी अब लगभग दो साल की हो गई है लेकिन सभी आवश्यक कागजात जमा करवाने के बाद भी मुख्यमंत्री राजश्री योजना के तहत मेरे खाते में पैसा नहीं आया है। मैं मोदी से बात करने की उम्मीद कर रहा था क्योंकि ऐसा कहकर ही हमें यहां बुलाया गया था।’’

उदयपुर के नाथू और गोपाल की भी कुछ इस तरह की ही कहानी है। इस आयोजन में श्रम कार्ड और जल स्वावलंबन अभियान योजनाओं के तहत पंजीकृत होकर आए दोनों ने कहा-

“हमें किसी भी सरकारी योजना से कोई लाभ नहीं मिला है, लेकिन हम फिर भी मोदीजी से मिलने के लिए यहां आए हैं।”

राज्य सरकार ने पिछले दो सालों में कई योजनाएं शुरू की हैं जिनमें किश्तों में पैसों का भुगतान शामिल है। यहां तक कि जिन लोगों को पैसों की केवल एक ही किश्त मिली है उन्हें भी लाभार्थियों के रूप में शामिल करके यहां बुलाया गया था। भरतपुर की सीमा का कहना है कि-

“पीएम आवास योजना के तहत, हमें केवल 30,000 रुपये की पहली किश्त मिली है और हालत ये है कि रेत का एक ट्रैक्टर भी 50,000 रुपये से अधिक का आता है।’’

दौसा के कालूराम और सुशील भी उस समारोह में आए 2.5 लाख लाभार्थियों में से एक हैं जिन्हें पीएम कौशल विकास योजना के तहत अभी तक रोजगार नहीं मिला है। प्रधानमंत्री के साथ बात करने के लिए कई उपस्थित लोगों की उम्मीदें तब बिखर गईं जब मोदी ने 12 अलग-अलग सरकारी योजनाओं के केवल 12 लाभार्थियों के पहले रिकॉर्ड किए गए एकतरफा अनुभव का सिर्फ वीडियो सुना। यहां तक कि जब पीएम के मंच पर रहते हुए लाभार्थियों को उनसे बातचीत करने का मौका मिला, तब भी उनको अपने अनुभवों के बारे में कुछ भी बोलने से मना किया गया था। लाभार्थियों को कहा गया कि फूल देकर सिर्फ धन्यवाद बोलें।

राज्य सरकार ने इस कार्यक्रम पर 7.23 करोड़ रुपये खर्च किए। राज्य भर से 2.5 लाख लाभार्थियों को बुलाने के लिए करीब 5,579 बसों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, जिस प्रक्रिया से इन लोगों को चुना गया है उसका खुलासा अभी तक नहीं किया गया है। रैली स्थल पर लाभार्थियों की एकमात्र पहचान उनको दिए हुए रंगीन दुपट्टे ही थे जो विभिन्न सरकारी योजनाओं के हिसाब से तय किए गए थे। असल में, जो लोग उपस्थित थे, उनके पास पंचायत समितियों द्वारा बनाए गए कार्डों के अलावा लाभ मिलने का और कोई भी सबूत नहीं था।

मुख्यमंत्री राजश्री योजना के तहत लाभार्थियों के रिकॉर्ड रखने वाले आंगनवाड़ी केंद्र अपने वार्डों से जाने वाले लाभार्थियों के बारे में अनजान थे। जयपुर की एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ज्योति ने बताया कि-

“हमें हमारे क्षेत्र से लाभार्थियों के नाम देने के लिए कोई जानकारी नहीं मिली। शायद सभी को व्यक्तिगत रूप से बुलाया गया था। “

सवाई माधोपुर में, जिला शिक्षा अधिकारी ने जयपुर में रैली के लिए लाभार्थियों को बस तक पहुंचाने के लिए सरकारी स्कूलों के सभी प्रधानाचार्यों को नोटिस जारी कर आदेश दिया था। सीकर के एक सरकारी शिक्षक ने कहा कि-

“कोई भी नहीं जानता कि इन लोगों को लाभ मिला है या नहीं, हमें तो बसों को भरने में मदद करने के लिए कहा गया था।”

लाभार्थियों में एक अजीब चीज और थी कि कुछ ने दुपट्टा उस योजना का पहन रखा था जो उनके लिए नहीं थी जैसे विशेष रूप से महिलाओं के लिए राजश्री और उज्ज्वला योजनाओं के दुपट्टे कई पुरुषों ने पहन रखे थे। जयपुर के विभागीय आयुक्त टी. रविकांत ने कहा कि- 

“मुझे पता नहीं है कि लाभार्थियों को निमंत्रण पत्र देने के लिए कलेक्टरों को कोई आदेश मिला था। कलेक्टर इस बारे में जवाब दे सकते हैं। जो भी विभाग इन योजनाओं को चला रहा था उन्हें ही लाभार्थियों को उनके निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के माध्यम से सूचित करना था।”

यह तथाकथित ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी जनसंवाद’ कार्यक्रम सरकारी था। लोगों के आने-जाने, खाने व रुकने का पूरा खर्च सरकार ने उठाया।

एक अनुमान के मुताबिक इस कार्यक्रम में सरकार के लगभग 50 करोड़ रुपये ख़र्च हुए। भीड़ जुटाने का काम भी सरकारी तंत्र ने किया। मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने बाकायदा ज़िला कलेक्टरों को लाभार्थियों का टारगेट दिया। इसे पूरा करने के लिए कलेक्टरों ने अधिकारियों और कर्मचारियों की टीमें गठित कीं। इन्होंने घर-घर जाकर लोगों को कार्यक्रम में जाने के लिए तैयार किया। यानी कार्यक्रम था तो सरकारी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसके मंच को इस साल के आखि़री में होने वाले विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान का आगाज करने के लिए किया। दोनों ने अपने भाषण में कांग्रेस पर जमकर प्रहार किए। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा,‘कुछ लोग अब कांग्रेस को बेल-गाड़ी कहने लगे हैं, क्योंकि पार्टी के कई नेता ज़मानत पर हैं। चार साल पहले कांग्रेस के नेताओं के नाम पर पत्थर जड़ने की होड़ मची हुई थी जबकि वसुंधरा जी काम कर रही हैं। उन्हें पिछली सरकार से खज़ाना ख़ाली मिला फिर भी उन्होंने विकास के एजेंडे पर काम किया। आपको तय करना है कि यह काम आगे भी कैसे जारी रहे। वहीं, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कहा-

"कांग्रेस ने 70 साल तक कुछ नहीं किया। सिर्फ देश और प्रदेश को लूटा। हमने न सिर्फ अच्छी योजनाएं बनायीं, बल्कि उन्हें सफलतापूर्वक लागू भी किया। सभी लाभार्थियों के खाते तक पूरा पैसा बिना किसी लीकेज के पहुंच रहा है। आगे भी टीम राजस्थान मिलकर काम करेगी।हम नए राजस्थान का निर्माण करेंगे।"

कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने चुनावों को ध्यान में रखते हुए 2100 करोड़ रुपये की योजनाओं का शिलान्यास भी किया। हालांकि इनमें से ज्यादातर पहले से चल रही योजनाओं का ही विस्तार है। पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के महासचिव अशोक गहलोत कार्यक्रम को पूरी तरह फ्लॉप बताया। उन्होंने कहा-

‘‘कार्यक्रम प्रधानमंत्री से सीधे संवाद के लिए आयोजित किया गया था, लेकिन संवाद तो हुआ ही नहीं। सभा में पहले से प्रायोजित क्लीपिंग्स का प्रेज़ेंटेशन दिया गया। क्या इसे संवाद कहा जाएगा? ये क्लीपिंग्स तो बिना करोड़ों रुपये बहाए प्रधानमंत्री को पेन ड्राइव के ज़रिये वैसे ही दिल्ली भेजी जा सकती थी।’’

गहलोत ने राज्य सरकार पर कार्यक्रम के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा-

‘‘15 दिन तक पूरे प्रदेश में प्रशासन ठप रहा। गरीब जनता अपने कामों के लिए सरकारी विभागों में मारी-मारी फिरती रही। कलेक्टर से लेकर पटवारी तक सभी भीड़ जुटाने के कार्य में जुटे रहे। सरकारी खज़ाने को पानी की तरह बहाया गया। लोगों को लोभ-लालच देकर जयपुर बुलाया।’’

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने भी गहलोत के सुर में सुर मिलाया। उन्होंने कहा,‘‘लाभार्थियों से संवाद के नाम पर आयोजित सरकारी कार्यक्रम में भाजपा संगठन हर मोर्चे पर सक्रिय रहा। सत्तारूढ़ दल ने जमकर सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया और जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहा दिया। पूरा कार्यक्रम भाजपा के खोए आधार को संबल प्रदान करने के लिए आयोजित किया गया।’’

                                           (मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं।)








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