प्रियंका का करिश्मा और जन कैडर मिलकर बदल सकते हैं यूपी में कांग्रेस की तस्वीर

माहेश्वरी का मत , , सोमवार , 11-02-2019


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अरुण माहेश्वरी

संचार तकनीक के युग में कैडर और पार्टी और प्रियंका गांधी कांग्रेस फिर से उत्तर प्रदेश में अपने को पूर्ववत खड़ा करना चाहती हैं । अपने पक्ष में जन-आलोड़न पैदा करने के लिये वह प्रियंका गांधी का प्रयोग तुरुप के पत्ते के तौर पर कर रही है। मोदी के ख़िलाफ़ लड़ाई में राहुल की नेतृत्वकारी जुझारू भूमिका से कांग्रेस के पक्ष में एक विचारधारात्मक माहौल भी इसी बीच तैयार हो चुका है । लेकिन किसी भी डूबे हुए दल के पुनरोदय के लिये अनुकूल राजनीतिक माहौल या नेता का करिश्मा ही यथेष्ट नहीं माना जाता है । 

पार्टी के कार्यकर्ता और उसका सांगठनिक ताना-बाना सबसे ज़रूरी माने जाते हैं । कांग्रेस के सांगठनिक ताने-बाने में हर जगह एक प्रकार के बिखराव को देख कर ही मोदी-शाह ने कांग्रेस-मुक्त भारत का सपना देखना शुरू कर दिया था । इसके अलावा भाजपा के संगठन-बल पर अतिरिक्त भरोसे ने उनमें अगले पचासों साल तक के लिये बाक़ी सभी दलों का सफ़ाया कर के मोदी के एकछत्र हिटलरी शासन का उन्माद पैदा कर दिया था ।

लेकिन देखते-देखते, भाजपा की एक के बाद एक पराजय ने राजनीतिक वर्चस्व के औज़ारों के बारे में सारी धारणाओं और आकलनों पर गहरे सवाल पैदा कर दिये हैं । संगठन की शक्ति गौण प्रतीत होती है, अनुकूल राजनीतिक परिवेश अर्थात पक्ष में किंचित हवा ही बूथ पर भारी साबित हो रही है । यह एक बिल्कुल नई परिघटना दिखाई देती है । 

जब पार्टी का कैडर सामान्य तौर पर एक संदेशवाही पुतले से ज़्यादा अहमियत नहीं रखता है, तब अधुनातन तकनीक से लैस भाड़े के लोग कैडरों की भीड़ को क्यों नहीं स्थानांतरित कर सकते हैं ? अब यही हो रहा है । पाँच राज्यों के पिछले चुनावों में अमित शाह बूथ स्तर के अपने संगठन की ख़ुमारी में डूबे रहे और कांग्रेस ने रातों-रात हर बूथ तक अपने संगठन के ताने-बाने को फैला लिया ।

राजनीति की इस नई परिघटना की पृष्ठभूमि में जब हम उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की महत्वाकांक्षाओं पर विचार करते हैं, तो सचमुच हमें उनके इस मिशन में असंभव कुछ भी नहीं लगता है । मायावती, सपा, भाजपा के कैडरों के विरुद्ध कांग्रेस का यह नये प्रकार का जन-कैडर अगर करिश्माई साबित हो जाए तो इसमें अचरज की बात नहीं होगी । लखनऊ में प्रियंका गांधी की पहली रैली से भी इसके कुछ संकेत ज़रूर मिलते हैं।

(अरुण माहेश्वरी कई किताबों के लेखक हैं और तमाम ज्वलंत मुद्दों पर नियमित तौर पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टलों पर लिखते रहते हैं।) 








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Pradeep Bhattacharya :: - 02-12-2019
महेश्वरीजी, आप अपने नवोदित कांग्रेस-प्रेम से बाहर निकल कर UP को वस्तुगत रूप से (और आपकी शब्दावली प्रयोग करूँ तो द्वंदात्मक रूप से) देखने की कोशिश करिये... कांग्रेस के सीमित पुनरुत्थान से UP का जो तबका और 'समाज' (गैर-ठाकुर सवर्ण, गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलित) उसकी ओर आकृष्ट हो रहा है, वो मुख्यतः BJP के साथ रहा है और इससे भगवा पार्टी को भारी नुक्सान होगा और उसकी पूरी तरह से सफाया हो जाने की सम्भावना है... निःसंदेह कांग्रेस की स्थिति में सुधार होगी, पर इस त्रिकोणीय संघर्ष का मुख्य फायदा 'गठबन्धन' को ही मिलेगा... जहाँ तक अल्पसंख्यकों का सवाल है, राजनैतिक तौर पर उनका आम झुकाव कांग्रेस की तरफ ज़रूर है, पर मोदी-योगी के राज में वो इतना सताया गया है कि वो किसी भी तरह की जोखिम लेने या प्रयोग करने की ऐयाशी नहीं कर सकता है... हर कोंस्टिटूएंसी में वो strategic वोटिंग करेगा...