राफेल सौदे को छुपाने की सरकार की कोशिशों पर फिरा पानी, फ्रेंच कंपनी ने किया कीमतों का खुलासा

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, रविवार , 11-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। रक्षा सौदों में गोपनीयता का हवाला देकर केंद्र की मोदी सरकार जिन राफेल विमानों की कीमत बताने से इंकार कर रही थी उसका खुलासा खुद उसकी कंपनी ने ही कर दिया है। डसाल्ट एविएशन ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में एक विमान की कीमत 1670.70 करोड़ रुपये बतायी है। जबकि यूपीए के दौर में हुए सौदे के दौरान इसकी कीमत महज 526.1 करोड़ रुपये थी। इस बीच भारत के दौरे पर आए फ्रांस के राष्ट्रपति के साथ मौजूद उनकी रक्षामंत्री ने भारत के सामने अगली राफेल विमान की खेप की खरीद का प्रस्ताव रख दिया है।

रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन ने 17 नवंबर, 2017 को रक्षा भवन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में 36 राफेल लड़ाकू विमानों का मूल्य बताने की बात कही थी। लेकिन बाद में संसद में 5 फरवरी, 2018 को उन्होंने जहाजों की कीमत बताने से इंकार कर दिया। इसके पीछे सरकार ने भारत और फ्रांस के बीच हुए गोपनीयता के समझौते का हवाला दिया। साथ ही उसका कहना था कि रक्षा जैसे संवेदनशील मामले में किसी भी तरह का खुलासा राष्ट्र के हितों के लिए खतरा साबित हो सकता है।

डसाल्ट कंपनी का ब्योरा।

राफेल लड़ाकू जहाजों की निर्माता कंपनी डसॉल्ट एविएशन की तरफ से ‘वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट 2017’ में विस्तार से सब कुछ बताया गया है। साल, 2015 में राफेल ने 24 लड़ाकू जहाज दो देशों- मिस्र और कतर को बेचे। भारत ने राफेल जहाज खरीदने के समझौते पर हस्ताक्षर 23 सितंबर, 2016 को किया। पृष्ठ 6 और 7 में मिस्र, कतर और भारत को बेचे गए राफेल जहाजों की कीमत का खुलासा किया गया है। 48 लड़ाकू जहाजों (24 मिस्र को और 24 कतर को) का मूल्य 7.9 बिलियन यूरो बताया गया है। इसमें भारत को बेचे गए 36 लड़ाकू जहाजों का मूल्य 7.5 बिलियन यूरो दिखाया गया है। मिस्र/कतर को बेचे गए प्रति लड़ाकू जहाज की कीमत 1319.80 करोड़ रुपये है। जबकि भारत को बेचे गए प्रति लड़ाकू जहाज की कीमत 1670.70 करोड़ रुपये है। 

इस तरह से यूपीए के साथ हुए समझौते के मुताबिक प्रति जहाज के हिसाब से देश को तकरीबन 1150 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। लेकिन कीमतों को लेकर सरकार ने बिल्कुल चुप्पी साध रखी है।  

मोदी सरकार ने 23 सितंबर, 2016 को फ्रांस के साथ इंटर-गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (आईजीए) किया था। आईजीए करने का घोषित उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भारत को अन्य खरीददारों के मुकाबले में कम कीमत में लड़ाकू जहाज प्राप्त हों। अब जब डसॉल्ट एविएशन की 2017 की वार्षिक रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि कतर/मिस्र को कम कीमत में जहाज मिले, तो आईजीए की सार्थकता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए हैं।

विपक्ष सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा है। कांग्रेस ने सरकार से कई सवाल पूछे हैं। उसने पूछा है कि आखिर प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री राफेल लड़ाकू जहाजों की कीमत बताने से क्यों कतरा रहे हैं? क्या यह सही है कि कांग्रेस की यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान राफेल की बोली के अनुसार 12 दिसंबर 2012 को एक लड़ाकू जहाज की कीमत 526.1 करोड़ रुपये आती, जो मोदी सरकार के कार्यकाल में 1670.70 करोड़ रुपये में खरीदा गया है?

डसॉल्ट एविएशन की वार्षिक रिपोर्ट में साल 2015 में मिस्र और कतर को बेचे गए 48 लड़ाकू जहाजों (प्रत्येक को 24) का मूल्य 7.9 बिलियन यूरो यानि 1319.80 करोड़ रुपये प्रति राफेल जहाज बताया गया है तथा 2016 में भारत को बेचे गए 36 लड़ाकू जहाजों का मूल्य 7.5 बिलियन यूरो यानि 1670.70 करोड़ रुपये प्रति राफेल जहाज है। इस हिसाब से भी भारत को मिस्र से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी। भारत ने प्रति लड़ाकू जहाज 350.90 करोड़ रुपये यानि 36 जहाजों के लिए 12,632 करोड़ रुपये ज्यादा क्यों दिए? इस तरह के कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी आना बाकी है।

इसके साथ ही इसमें एचएएल से कांट्रैक्ट खत्म कर उसे रिलायंस को देने के पीछे सरकार का क्या मकसद हो सकता है। ये सब कुछ अभी सवालों के घेरे में है।

इस बीच बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट के जरिये नई सनसनी पैदा कर दी है। उन्होंने सौदे में नौकरशाहों की भूमिका पर सवाल उठाया है। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भी फ्रांस के साथ हुए नये सौदे के पीछे कुछ इसी तरह का इशारा किया है।










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