रैफेल सौदे में बड़े घोटाले की आशंका, 526 करोड़ के विमान की 1570 करोड़ रुपये में हुई खरीद

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली , बुधवार , 15-11-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। यूपीए के समय के रैफेल खरीद सौदे को रद्द कर उसी विमान को तकरीबन तीन गुना कीमत पर खरीदने के मोदी सरकार के फैसले पर सवालिया निशान खड़ा हो गया है। यूपीए के समय उस लड़ाकू विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये थी जबकि मोदी सरकार उसी विमान को अब 1570 करोड़ रुपये में खरीद रही है। बोफोर्स तोप सौदे में 94 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोपों में सरकार बदल गयी थी। जबकि इस सौदे में प्रति विमान के हिसाब से 10 बोफोर्स के बराबर देश को घाटा उठाना पड़ रहा है। लेकिन न तो इसकी राजनीतिक हल्के में कहीं कोई चर्चा है न ही मीडिया जगत में इस पर कोई बात हो रही है। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार राष्ट्रहित और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है।  साथ ही उसने इस खरीद में बड़े घोटाले का आरोप लगाया है।

दरअसल यूपीए के कार्यकाल के दौरान 2007 में एयरफोर्स की ओर से 126 लड़ाकू विमान खरीदने का टेंडर डाला गया था। जिसमें रैफेल और यूरोफाइटर टाइफून दो विमानों के लिए बातचीत शुरू हुई। 2012 में रैफेल के साथ सौदे का फैसला हुआ जिसमें 126 विमानों के लिए 54,000 करोड़ रुपये में सौदा तय हुआ। इसके तहत 126 में 18 विमानों को पूरा तैयार होकर भारत आना था। बाकी 108 विमानों का निर्माण टेक्नालाजी के स्थानांतरण के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल में होना था। इसके साथ ही एक और शर्त के मुताबिक मालिकाना कंपनी डसाल्ट एविएशन को वसूली गयी कीमत का 50 फीसदी भारत में निवेश करना था।

इस सौदे में ही एचएएल और डासाल्ट एविएशन के बीच काम के बंटवारे का समझौता हुआ। जिसके तहत निर्मित होने वाले 108 विमानों में 70 फीसदी काम एचएएल को करना था जबकि 30 फीसदी जिम्मेदारी डासाल्ट की थी।

उसके बाद 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अप्रैल, 2015 को फ्रांस का दौरा किया और वहां से 36 रैफेल लड़ाकू विमानों के खरीद की डील की घोषणा की। सबसे खास बात ये है कि ऐसा रक्षा विभाग की जरूरी मान्य प्रक्रियाओं का पालन किए बगैर किया गया। न ही सरकारों को इसमें शामिल किया गया और न ही डील के वक्त देश के रक्षामंत्री मौजूद थे। 

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रिलायंस डिफेंस लिमिटेड के मालिक अनिल अंबानी जरूर मौजूद थे। 30 जुलाई 2015 को मोदी सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने के पुराने सौदे को रद्द कर दिया। उसके बाद 23 सितंबर 2016 को डासाल्ट कंपनी से 36 रैफेल लड़ाकू विमान खरीद के समझौते पर उसने हस्ताक्षर किया। इस सौदे की कुल कीमत 60,000 करोड़ रुपये थी। इसके साथ ही अनिल अंबानी के रिलायंस डिफेंस लिमिटेड ने भारत में रक्षा क्षेत्र में उत्पादन के लिए डासाल्ट एविएशन के साथ संयुक्त वेंचर पर समझौता किया। 

अब इसमें सबसे बड़ा सवाल बनता है कि मोदी सरकार ने इतनी ऊंची कीमत पर 36 रैफेल विमान खरीदने का समझौता क्यों किया? जबकि इसमें न तो टेक्नालाजी के स्थानांतरण की कोई सुविधा थी। न ही घरेलू कंपनी में निर्माण की कोई गुंजाइश। इसके हिसाब से यूपीए के दौर में हुए समझौते में एक लड़ाकू विमान की कीमत 526.10 करोड़ थी। जबकि मोदी सरकार में हुए उसी विमान के लिए देश को एक विमान के एवज में 1570.80 करोड़ रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। यानी प्रति विमान के हिसाब से 944.70 करोड़ रुपये का घाटा।

सरकार के फैसले पर सवाल

इसमें सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षा खरीद की प्रक्रियाओं को पूरा किए बगैर एकतरफा तरीके से फैसला ले लिया। प्रधानमंत्री एचएएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम की कीमत पर रिलायंस जैसी एक निजी कंपनी को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ ही रिलायंस और डासाल्ट के बीच हुए रक्षा समझौते में केंद्रीय कैबिनेट, रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी और फारेन इन्वेस्टमेंट प्रोमोशन बोर्ड की मुहर क्यों नहीं लगवाई गयी।  

कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में भारी अनियमिताताएं सामने आयी हैं। इसमें गैरपारदर्शिता, रक्षा सौदों की प्रक्रिया में जरूरी प्रावधानों को ताक पर रखा गया है साथ ही टेक्नालाजी के स्थानांतरण में सरकारी उपक्रमों के हितों को दरकिनार कर पूंजीपति मित्रों को फायदा पहुंचाने का काम किया गया है।






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