राहुल के इफ्तार का संदेश

ख़बरों के बीच , , बृहस्पतिवार , 14-06-2018


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महेंद्र मिश्र

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी कई लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण थी। दिल्ली के ताज पैलेस में आयोजित इस पार्टी में सपा और नेशनल कांफ्रेंस को छोड़कर तकरीबन सभी विपक्षी दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए। राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद ये पहली इफ्तार पार्टी थी जिसे कांग्रेस ने दो साल बाद आयोजित किया था। इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष रहते सोनिया गांधी ने 2015 में इसका आयोजन किया था। लेकिन 2014 के चुनावी हार के विश्लेषण में एंथनी कमेटी के मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से पार्टी को नुकसान पहुंचने की रिपोर्ट के बाद सोनिया ने उसे बंद कर दिया था। मंदिर-मंदिर घूमने वाले राहुल ने आगामी चुनाव से ठीक पहले इस इफ्तार का आयोजन कर उदार हिंदुओं के साथ ही सेकुलर जमात को भी साधने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते हैं।

इफ्तार में संघ के आंगन से होकर लौटे पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी बेहद खास थी। इसके जरिये संघ ने जहां एक तरफ ये संकेत देने की कोशिश की थी कि 2019 में मोदी के अलावा दूसरे विकल्पों पर भी वो विचार कर सकता है। या फिर किसी दूसरी सरकार के गठन के लिए भी वो तैयार है। वहीं भिवंडी में अपने खिलाफ आरएसएस द्वारा दायर मुकदमे की सुनवाई के बाद राहुल का संघ के खिलाफ किसी कड़ी टिप्पणी से बचने को उसके पूरक के तौर पर देखना गैरमुनासिब नहीं होगा। 

भिवंडी में उन्होंने रोजगार, महंगाई समेत दूसरे सवालों को उठाते हुए सरकार और उसकी नीतियों पर हमला किया। आमतौर पर संघ के खिलाफ बोलने वाले राहुल गांधी इस मौके पर किसी हमले से बचते दिखे। अब ये कांग्रेस से जुड़े पूर्व राष्ट्रपति का संघ के चौखट पर जाने का दबाव है या फिर पुराने तरीके से संघ पर बगैर किसी हमले के सत्ता हासिल करने की रणनीति इसके बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि कांग्रेस और खासकर उसका नेतृत्व बेहद कन्फ्यूजन की स्थिति में है। देश में कांग्रेस द्वारा पैदा किए गए आरएसएस के इस भस्मासुर को अगर पार्टी फिर से छोड़ देती है तो ये सचमुच में मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत के रास्ते में आखिरी पड़ाव ही साबित होगा। 

राहुल की इफ्तार पार्टी में विपक्षी दलों के नेता और अन्य।

सच्चाई तो यही है कि कांग्रेस ने उसके खिलाफ लड़ने और उसे खत्म करने पर कभी विचार ही नहीं किया। बल्कि गाहे-ब-गाहे उसका इस्तेमाल जरूर किया। अनायास ये नहीं कहा जाता था कि आरएसएस के न होने पर इंदिरा गांधी रातों-रात नया आरएसएस खड़ा कर लेंगी। लिहाजा कहा जा सकता है कि नेहरू के बाद के कांग्रेस नेतृत्व ने आरएसएस के साथ एक स्तर की एकता बना कर चलने का काम किया। इंदिरा से लेकर बाद में राजीव गांधी के अयोध्या मंदिर का ताला खुलवाने समेत शिला पूजन और उसके बाद कांग्रेस के ही एक प्रधानमंत्री नरसिंहराव के शासन में बाबरी मस्जिद का गिरना इसको और पुख्ता कर देता है। 

इस बात को अपने तरीके से कांग्रेस के नेता स्वीकार भी करते रहे हैं। एक पोर्टल के साथ साक्षात्कार में पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद से जब पूछा गया कि क्या कभी पार्टी ने आरएसएस के खिलाफ लड़ाई की कोई रणनीति बनायी थी? तो इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ऐसा उन्हें याद नहीं है जब पार्टी के भीतर इस तरह का एजेंडा बनाकर कोई बहस हुई हो। अब इस बात से समझा जा सकता है कि इस समय पैदा हुई देश की सबसे बड़ी समस्या पर देश में सबसे ज्यादा दिनों तक शासन करने वाली पार्टी का क्या रुख था।

इस इफ्तार में विपक्षी दलों की एकता के प्रति प्रतिबद्धता एक बार फिर दिखी। हालांकि उसी के साथ एक और बात भी दिखी कि विपक्षी पार्टियां राहुल को अभी अपना नेता मानने के लिए तैयार नहीं हैं। क्योंकि सीताराम येचुरी और शरद यादव को छोड़ दिया जाए तो इस इफ्तार में दूसरे दल अपने दूसरे दर्जे के नेताओं को ही भेजे थे। डीएमके से कनिमोझी, बीएसपी से सतीश चंद्र मिश्र, आरजेडी से मनोज झा, टीएमसी से दिनेश त्रिवेदी, एनसीपी से डीपी त्रिपाठी, जेएमएम से हेमंत सोरेन आदि शामिल हुए।

डिप्लोमैट से मिलते राहुल गांधी।

सपा से किसी के न शामिल होने के पीछे उसी दिन अखिलेश द्वारा लखनऊ में भी इफ्तार का आयोजन बताया जा रहा है। अगर ऐसा न भी हो तो कल प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को इशारे में ही मायावती को पीएम बनाने के लिए काम करने का आह्वान किया था उससे इस पार्टी में उनकी गैरमौजूदगी सवालों के घेरे में आ जाती है।

लेकिन सोनिया गांधी की गैरमौजूदगी में राहुल गांधी द्वारा विपक्षी दलों और समाज-राजनीति के दूसरे हिस्सों के साथ मेल-मिलाप का ये पहला मौका था। उसमें जिस तरह से दो पूर्व राष्ट्रपति और ढेर सारे डिप्लोमैट के अलावा विपक्षी दलों के प्रतिनिधि शामिल हुए उससे राहुल गांधी के नेतृत्व की भविष्य की संभवानाओं को बल मिलता है। और ऐसे मौके पर जब विपक्षी इफ्तार पर भोजन का आनंद ले रहे थे तभी सामने आया पीएम मोदी का योगा और फिटनेस वीडियो मुफ्त में उनके मनोरंजन का साधन बन गया। जिसमें कई नेता खुलेआम उसकी चुटकियां लेते देखे गए।




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