सक्रिय न्यायाधीश और स्वतंत्र पत्रकार लोकतंत्र की पहली पंक्ति के रक्षक: रंजन गोगोई

विशेष , नई दिल्ली, शुक्रवार , 13-07-2018


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। ‘‘जरूरत पड़ने पर खुलकर बोलने वाले न्यायाधीश और स्वतंत्र पत्रकार लोकतंत्र की पहली पंक्ति के रक्षक हैं। न्यायपालिका की संस्था को जवाबदेह बनाने और समाज में बदलाव के लिए सुधार नहीं बल्कि क्रांति की जरूरत है।’’ चीफ जस्टिस के बाद सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने बृहस्पतिवार को ये बातें कही। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में शामिल रंजन गोगोई ‘‘तीसरे रामनाथ गोयनका स्मारक व्याख्यान’’ में ‘‘द विजन ऑफ जस्टिस’’ विषय पर विचार व्यक्त कर रहे थे। तीनमूर्ति भवन के ऑडिटोरियम में व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ‘‘आशा का अंतिम आधार’’ थी और इसे ‘‘ अनियंत्रित’’ रहने और ‘‘सक्रिय’’ रहने की जरूरत है। न्यायपालिका के नैतिक और संस्थागत चरित्र को संरक्षित करने के लिए इसे सबसे आगे रहना होगा।  

द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ( द इकोनॉमिस्ट ) के लेख ’हाऊ डेमोक्रेसी डेज’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि,  ‘‘...स्वतंत्र न्यायाधीश और सक्रिय पत्रकार लोकतंत्र की रक्षा की पहली पंक्ति हैं। लोकतंत्र की मौत की रिपोर्ट बहुत अतिरंजित है। लेकिन सरकार की बदहाल व्यवस्था बहुत चिंतनीय है, परेशान करने वाली है। इसे रक्षकों की जरूरत है। ‘‘न्यायमूर्ति गोगोई ने लेख की उक्त पंक्ति की प्रशंसा करते हुए  कहा, “मैं सहमत हूं, लेकिन केवल आज के संदर्भ में मामूली संशोधन का सुझाव दूंगा- न केवल स्वतंत्र न्यायाधीशों और सक्रिय पत्रकार, बल्कि यहां तक कि स्वतंत्र पत्रकारों और कभी-कभी सक्रिय न्यायाधीश भी।’’

 ‘‘एक श्रृंखला केवल उतनी ही मजबूत होती है जितनी उसकी सबसे कमजोर कड़ी होती है। तो एक संस्था के रूप में हमें यदि आत्मनिरीक्षण करना है तो हम जहां हैं वहां से शुरू कर सकते हैं। शायद, हम भविष्य में उम्मीद कर सकते हैं और प्रयास कर सकते हैं, यह हमारा अंतिम प्रयास नहीं है, लेकिन वास्तव में हम असफल न हों इसलिए इसे परिभाषित करना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को ‘‘महान सामाजिक विश्वास’’ के साथ स्थापित किया गया है और यह तथ्य है कि इसकी  विश्वसनीयता ही इसे वैधता देती है। ‘‘यह एक संस्था के लिए बहुत ही वांछनीय  जगह है।’’ 

इस साल की शुरुआत में, 12 जनवरी को न्यायमूर्ति गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के अपने तीन सहयोगियों, जस्टिस जे चेलेश्वर (अब सेवानिवृत्त), मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ के साथ एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस किया था। जिसमें उन्होंने नवंबर में भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखे पत्र की चर्चा की थी। इस पत्र में अदालत के कामकाज से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाया गया था। पत्र में विशेष रूप से मुकदमों के आवंटन का मामला था। न्यायमूर्ति गोगोई ने तब कहा था, ‘‘यह देश का ऋण है जिसे उतारने की हमने कोशिश किया है।’’

कार्ल गुस्टाफ युंग और अरस्तू के दर्शन के हवाले से व्यवहारिक  बात करते हुए   न्यायमूर्ति गोगोई ने न्याय की अपनी दृष्टि बताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका आज “एक गरीब कार्यकर्ता नहीं है जो अपने औजारों को दोषी ठहराता है बल्कि यह ऐसा कार्यकर्ता है जिसके पास कोई औजार नहीं है।“ उन्होंने “एक फ्रांसीसी लेखक के हवाले से कहा, ‘‘सब कुछ पहले से ही कहा गया है, लेकिन जैसा कि कोई भी नहीं सुनता है, हमें फिर से शुरू करना होगा, ’मैं केवल उनसे पूछूंगा और निवेदन करूंगा कि आप सुने की नहीं। आखिरकार उनके सुनने तक सुनना चाहूंगा ताकि हमें फिर से शुरू न करना पड़े।“

 “दो भारत“ के बीच विभाजन को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि- एक भारत ऐसा मानता है कि “यह नया आदेश है“ और दूसरा जो “हास्यास्पद रूप से तैयार गरीबी रेखा“ से नीचे रहता है - उसने न्यायपालिका के “संवैधानिक अधिकार“ की मांग की, जो “लंबे समय से लंबित रहा है“।

 न्याय के तंत्र का हवाला देते हुए, न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि ‘‘संवैधानिक नैतिकता’’ पर “नकली“ सामाजिक नैतिकता को स्थायी करने का प्रयास किया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल ही में दिल्ली सरकार बनाम एल-जी मामले में और धारा 377 से संबंधित मामले की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में “संवैधानिक नैतिकता“ की इस धारणा को स्थापित किया गया। 

न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट विकसित हो रहा है। और 1970-1980 के दशक में मूल संरचना सिद्धांत (संविधान के कुछ पहलुओं पर हमला करने के योग्य थे) का विस्तार हुआ, तो 1980 के दशक में, इसने अनुच्छेद 21 (  जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता  का दायरा बढ़ाया और 1990 के दशक तक, यह कार्यकारी और विधायी निष्क्रियता की वजह से संवैधानिक प्रावधानों का नए रूप से व्याख्या करके “सुशासन न्यायालय“  बन गया था।    

‘‘हमारी आजादी के पहले पचास वर्षों में, अदालत ने एक बहुत ही अच्छा न्यायशास्त्र पैदा किया है जिसे हमने आगे बढ़ाना जारी रखा है। यह वास्तव में जड़ता है जिसने हमें अभी तक जारी रखा है। लेकिन आज जिस तरह से चीजें खड़ी हैं, अदालत की प्रक्रिया शुरू होने के पहले ही एक परीक्षण शुरू हो जाता है। हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि यह हमारे हिस्से की सामूहिक विफलता है, लेकिन कानून के शासन द्वारा शासित राष्ट्र के लिए, क्या यह चिंता का विषय नहीं है कि कम से कम इस हद तक, हम समावेश के विचार को खारिज कर रहे हैं? जमीन पर चुनौतियों को पूरा करने में सक्षम होने के लिए और इस संस्था को एक आम आदमी के सेवा के योग्य और राष्ट्र के लिए प्रासंगिक रखने के लिए अब सुधार नहीं, बल्कि क्रांति की जरूरत है।’’

लेकिन मैं निश्चित रूप से कहूंगा कि न्यायपालिका को आगे बढ़ कर और अधिक सक्रिय होना चाहिए। यही वह है जिसे मैं संवैधानिक नैतिकता (शक्तियों को अलग करने) के अधीन, अपनी दिक्कत की भावना के प्रवर्तन और प्रभावकारिता के मामलों में एक संस्था के रूप में अपनी भूमिका को फिर से परिभाषित कर सकेंगे। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि न्यायपालिका को सभी स्तरों पर, कानूनों की व्याख्या के मामलों में अधिक गतिशील बनने की जरूरत है। ’’

रामनाथ गोयनका को याद करते हुए न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि वो ऐसे व्यक्ति थे जो सत्ता के सामने सच  बोल सकते थे। इसकी चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े। वह टूटने के लिए तैयार रहते थे लेकिन झुकने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। यह उनका दृढ़ संकल्प कहा जा सकता है.....मुझे लगता है कि हमें खुद से कुछ सवाल पूछने की जरूरत हैः हमारे भीतर आज गोयनका कहां है; उनके आदर्श; उसके मूल्य कहां हैं? क्या इन असाधारण घटनाओं ने आज इन सभी वर्षों के बाद अपनी प्रासंगिकता खो दी है? ’’

न्यायमूर्ति गोगोई ने संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थापकों में से एक अलेक्जेंडर हैमिल्टन को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘‘न्यायपालिका सरकार की दो अन्य शाखाओं के साथ’’ है।  “अमेरिकी संविधान पर विचार करते हुए, उन्होंने (हैमिल्टन) कहा था कि न्यायपालिका तीन शाखाओं में सबसे कमजोर है क्योंकि इसमें न तो कार्यकारी का बल है और न ही विधायिका की इच्छा है, बल्कि केवल निर्णय है। न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा, “और मैं पूरी तरह से सहमत हूं, उन्होंने कहा, ’इस मामले का यह सरल दृष्टिकोण’ था।

उन्होंने कहा, ‘‘ जटिल विचार यह है ... नागरिक स्वतंत्रताओं को न्यायपालिका से अकेले डरने के लिए कुछ   नहीं है। लेकिन, जब न्यायपालिका सत्ता की अन्य दो शाखाओं से जुड़ जाती है तो डरने के लिए सब कुछ होगा।’’  न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने कहा कि वो रामनाथ गोयनका के इस विचार से सहमत हैं कि ‘‘अबाध स्वतंत्रता’’ बिना भय या पक्षपात के जांच’’ न्याय का स्थयी आधार है। न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि मैं यह कहना चाहता हूं कि ’स्वतंत्रता’ संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करने में मददगार होती है। 

इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने जस्टिस गोगोई का स्वागत करते हुए कहाः “अदालत और न्यूज़रूम दो ऐसी जगहे हैं जो न्याय और तथ्यों की खोज में प्रतिकूल प्रक्रियाओं पर भरोसा करते हैं। दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि कहानी या मामले में दो या अधिक पक्ष हो सकते हैं और प्रत्येक को भय या पक्षपात के बिना सुना जाना चाहिए।


 




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Subhash Chandra :: - 07-13-2018
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