आरबीआई डाटा: पिछले तीन सालों में लोन फ्राड के मामलों में तीन गुने की बढ़ोतरी

ख़ास रपट , नई दिल्ली, शनिवार , 17-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। पीएनबी घोटाला और उसमें शामिल रकम को देखकर भले ही कोई अपना होशो-हवाश खो बैठा हो। लेकिन जानकारों का कहना है कि उसे इससे भी बड़े फ्राड के लिए तैयार रहना चाहिए। क्योंकि आरबीआई के हवाले से सामने आया डाटा कुछ इसी तरफ इशारा कर रहा है। इसे देखकर कर कोई भी इस समस्या की गहराई और चौड़ाई का अंदाजा लगा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी रायटर्स के मुताबिक आरटीआई के जरिये हासिल हुआ आरबीआई का डाटा बताता है कि 31 मार्च 2017 तक पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान सरकारी बैंकों में 8670 मामले लोन फ्राड के सामने आए हैं। इनमें कुल तकरीबन 61 हजार 200 करोड़ रुपये शामिल हैं।

भारत में उन मामलों को मुश्किल से ही लोन फ्राड के दायरे में रखा जाता है जिसमें कर्ज लेने वाला शख्स जान-बूझकर लोन देने वाले बैंक को धोखा देता है और फिर उसका पैसा नहीं लौटाता है।

इस मामले में सामने आए आंकड़े समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं। खराब लोन देश में नया रिकार्ड बना रहा है पिछले साल ये तकरीबन 14 हजार 900 करोड़ रुपये था।

इसके साथ ही बैंक लोन फ्राड भी उसी अनुपात में बढ़ गया है। 2012-13 के दौरान इसमें 6 हजार तीन सौ करोड़ की रकम शामिल थी। वो हालिया वित्तीय वर्ष में बढ़कर तरीबन 17 हजार 600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें पीएनबी का मौजूदा मामला शामिल नहीं है।

नितिन देसाई एसोसिएट्स लॉ फर्म की पार्टनर प्रतिभा जैन जो दिवालिया मामलों की सलाहकार हैं ने पीएनबी मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “ये पानी में तैरने वाली बर्फ का छोटा हिस्सा है। या फिर आधा है। यही सबसे बड़ी चिंता की बात है।”

आरबीआई का आंकड़ा।

उन्होंने कहा कि “सचाई ये है कि अभी और भी बहुत कुछ देखने के लिए बाकी है।”

बैंकों के खुलासे

जून 2017 में आरबीआई ने अपनी फाइनेंसियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट में बैंकों और वित्तीय संस्थाओं में होने वाले फ्राड को “वित्तीय क्षेत्र के लिए एक उभरता हुआ संकट बताया था।”

आरबीआई ने कहा कि “ज्यादातर गड़बड़ी के मामलों में क्रेडिट के मानकों में गंभीर अंतराल है।” इसके अलावा अंतराल में कैश फ्लो और कैश लाभ पर लगातार निगरानी की कमी, फंड का डायवर्जन, दोहरा वित्तपोषण और बैंकों में क्रेडिट को रेगुलेट करने के मुद्दे शामिल हैं। 

आरबीआई बैंकों को अपने खराब लोन का खुलासा करने, रिकवरी की प्रक्रिया को तेज करने और एनपीए से जुड़े फ्राड मामलों को छुपाने से रोकने के लिए दबाव बना रहा है।

लेकिन कुछ लोग आरबीआई के रवैये पर ही सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि वो खुद वही फ्राड लोन और दिवालिया होने वाले कर्जदारों के डाटा को सार्वजनिक करने से परहेज करता है। व्यक्तिगत डाटा के खुलासे में बाधा के पीछे एक कारण कानूनी बाधाएं हैं साथ ही इस बात की भी चिंता रहती है कि प्रभावित बैंक पर निवेशक धौंस न दिखाना शुरू कर दें। जिससे लोन की रिकवरी और कठिन हो जाएगी।

वास्तव में पूरे देश में लोन फ्राड के मामले बहुत ज्यादा हैं। लेकिन उसमें ज्यादातर आरबीआई को रिपोर्ट ही नहीं किए जाते हैं लिहाजा वो सामने ही नहीं आ पाते।

रायटर्स ने अपनी आरटीआई में 21 सरकारी बैंकों में से 20 से डाटा मांगा था। लेकिन उनमें से केवल 15 ने उत्तर दिया। लोन फ्राड के मामले में पीएनबी 389 केसों के साथ सबसे ऊपर है। इसमें पिछले पांच वित्तीय सालों में तकरीबन 6 हजार 500 करोड़ रुपये शामिल हैं।

पीएनबी के बाद लोन फ्राड के मामलों में दूसरा नंबर बैंक ऑफ बड़ौदा का है। इसके 389 केसों में तकरीबन 4 हजार 400 करोड़ रुपये का घपला है। जबकि बैंक आफ इंडिया का स्थान तीसरा है। जिसके 231 केसों में तकरीबन 4 हजार करोड़ रुपये दांव पर लगे हैं।

भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक आफ इंडिया के खाते में 1069 फ्राड लोन के मामले दर्ज हैं। लेकिन पिछले पांच वित्तीय वर्ष में कितना रकम शामिल है। उसने इसको बताने से इंकार कर दिया।

आरबीआई का आंकड़ा।

बैंकों ने इन सालों में कितनी रिकवरी की इसका भी कोई डाटा नहीं है।

ये खराब लोन के बढ़ने का ही नतीजा था कि सरकार पिछले साल तकरीबन 3 हजार 200 करोड़ रुपये इस सेक्टर के बेल आउट के लिए आवंटित किए।  

     










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