रक्षा क्षेत्र में अनुभव के नाम पर रिलायंस के खाते में दर्ज है कागज पर कंपनियों का निर्माण और नामों में बदलाव

ख़ास रपट , , रविवार , 11-02-2018


reliance-defence-company-rafale-modi-france

नवनीत चतुर्वेदी

डस्सॉल्ट ग्रुप फ्रांस से अनुबंध होने से पहले ही रिलायंस समूह ने एक भूमिका बनानी शुरू कर दी थी, ताकि यह लगे कि उसको रक्षा क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव है। राफेल के पीछे रिलायंस समूह का आना वस्तुतः गुजरात मॉडल का करिश्मा है, जो कुछ इस तरह है- गुजरात के सुदूर समुद्री तट पर स्थित 1997 में स्थापित एक कंपनी पिपावा डिफेन्स एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड पर यकायक अनिल अंबानी की दृष्टि जा गिरती है और वो कंपनी योजनाबद्ध रूप से अलग-अलग रंग-रूप नाम से बदल होते हुए आज रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड के नाम से जानी जाती है, मात्र 12 महीने के दरम्यान में इस कंपनी का नामकरण 5 बार अदल-बदल होता है। 

कंपनीज एक्ट में हालांकि नाम भले 5 क्यों 50 बार बदला जा सकता है कोई गैरकानूनी कृत्य तो नहीं है लेकिन अपने आप में एक संदेह जरूर पैदा करता है- आइये इस समूह की नामकरण यात्रा पर एक नजर डालते हैं-

1. पिपावा डिफेन्स एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड  

2. पिपावा शिप डिस्मैंटलिंग एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड 

3. पिपावा शिपयार्ड लिमिटेड 

4. रिलायंस डिफेन्स एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड 

5. रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड- आज की तारीख में यह नाम है। साल 2015 से 2016 के बीच उपरोक्त नाम बदले गए हैं।

सिलसिला यहां से शुरू होता है, रिलायंस डिफेन्स नाम से पचासों कंपनीज वर्ष 2015 में बनाई गईं। ये वो वक़्त था जब राफेल डील आदरणीय प्रधानमंत्री जी अंबानी के लिए करवा रहे थे।

1. रिलायंस इंजीनियरिंग एंड डिफेंस सर्विसेज लिमिटेड

2. रिलायंस एयरपोर्ट डेवेलपर्स लिमिटेड 

3. रिलायंस डिफेन्स लिमिटेड 

4. रिलायंस डिफेंस सिस्टम एंड टेक्नोलॉजी लिमिटेड 

5. रिलायंस डिफेंस एंड एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड 

6. रिलायंस डिफेंस टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड 

7. रिलायंस डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड 

8. रिलायंस डिफेंस वेंचर्स लिमिटेड 

9. रिलायंस डिफेंस सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड 

10. रिलायंस नेवल सिस्टम लिमिटेड 

11. और इस तरह के मिलते जुलते नाम से और भी पचास कंपनीज उपलब्ध हैं जिनका वजूद सिर्फ कागजों में ही है और जाहिर है इनका प्रयोग सिर्फ एक अकाउंट से दूसरे अकाउंट में पैसे घुमाने और रिश्वत के पैसे एडजस्ट करने -काले धन को सफ़ेद करने का ही मकसद है। उपरोक्त सब कम्पनीज नाम में भारी-भरकम हैं लेकिन उनकी कैपिटल शायद ही किसी की 5 लाख से ज्यादा हो। जिस कम्पनी की कैपिटल ही 5 लाख हो वह डिफेंस क्षेत्र में क्या व कितना काम कर रही होगी यह समझदार इंसान खुद सोच सकता है।

जो कंपनीज वास्तविक है वो है मौजूदा; रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड; प्रथमदृष्टया इंटरनेट पर या मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉर्पोरेट अफेयर्स की वेबसाइट पर देखेंगे तो पता चलेगा कि 1499 करोड़ की कैपिटल है और 1997 से स्थापित है। अब 1997 के बाद कैसे मात्र एक साल 2016 में ही इसका नाम 5 बार बदला गया था। वो आर्टिकल की शुरू में ही बताया गया है कि यह कंपनी अम्बानी ने खरीदी है रातों-रात खुद को स्थापित किया है।

दूसरी वास्तविक कम्पनी है डस्सॉल्ट एयरक्राफ्ट सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड जो 2012 में बनाई गई थी ,जिसके सभी निदेशक फ्रांस के हैं, इस कंपनी का मुख्य काम डसाल्ट समूह फ्रांस और भारत सरकार के बीच डील करवाना, और यहां खुद के लिए कोई ज्वाइंट वेंचर ढूंढना। कंपनी की ऑफिस डिफेन्स कॉलोनी, दिल्ली स्थित एक फ्रांस दूतावास अधिकारी के निवास का है। इन पंक्तियों के लेखक को छानबीन के बाद पता चला है। 

तीसरी वास्तविक कंपनी है जो 23 सितम्बर 2016 को भारत सरकार एवं डसाल्ट समूह फ्रांस के बीच रक्षा सौदे 36 राफेल जहाज का अनुबंध होने के बाद 10 फरवरी 2017 को 60 करोड़ की कैपिटल के साथ; डस्सॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड के नाम से शुरू हुई। और फिर सितम्बर 2017 में महाराष्ट्र नागपुर के समीप इस कम्पनी की आधारशिला रखी गई। भूमि पूजन हुआ। आधिकारिक रूप से यह कंपनी फ्रांस के डस्सॉल्ट और इंडिया के रिलायंस के बीच हुआ जॉइंट वेंचर है। जो फ्रांस की कम्पनी डस्सॉल्ट और भारत सरकार के रक्षा सौदे में आधिकारिक कंपनी है।

उपरोक्त 3 वास्तविक कंपनियों के अलावा जो भी हैं वो सब शैल कंपनियां हैं। जी वही शैल कंपनियां जिसका दावा प्रधानमंत्री मोदी करते हैं कि उन्होंने 3.46 लाख शैल कंपनियों को बंद करवा दी। जिसकी लिस्ट खुद मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉर्पोरेट अफेयर्स के पास नहीं है कि कब ये लाखों कंपनियां बंद हो गईं। लेकिन प्रधानमंत्री जी के मुंह से एक बार 3.46 लाख शैल कंपनियां बंद करवा दी। यह शब्द निकल गया तो वही सत्य माना जायेगा जैसा अब का रिवाज चल निकला है।

उपरोक्त सब शैल कंपनियों और उक्त तीनों वास्तविक कंपनीज में एक अमेरिकी शख्स कॉमन है वह है ''अंथोनी जेसुडासन'' और दूसरा कॉमन शखस है अनिल अंबानी।

अब बात आती है उस पहली वास्तविक कंपनी रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड की। वह क्यों बनाई गई? वास्तविकता यह है कि इस कम्पनी को बनाने और खड़ा करने की जिद की कीमत भारतीय बैंको ने चुकाई है। 15000 करोड़ रुपये की चपत से, एक कम्पनी एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड जो 1974 से भारत में नौसेना व तटरक्षक दल के लिए जहाज, बोट और अन्य युद्धक संचार उपकरण बनाती आई है उस कम्पनी का 22000 करोड़ का टेंडर सर्वप्रथम निरस्त किया गया, रिलायंस समूह के इशारे पर और इस कम्पनी को बैंकरप्ट हो जाने को मजबूर किया गया, अंततः जून 2016 में यह कम्पनी बैंकरप्ट हुई, सरकारी बैंको का 15000 करोड़ यहां रिलायंस के फायदे के लिए डुबो दिया गया, अब यही कम्पनी रिलायंस समूह कौड़ियों के दाम में नेशनल कॉर्पोरेट लॉ ट्रिब्यूनल से खरीदने की प्रक्रिया में है। और इसी कम्पनी के पुराने कर्मचारी अधिकारी आज कल रिलायंस समूह में देखे जा रहे हैं। यह फ़िल्मी किस्सा भले लगता हो, पर हकीकत है जिसको कोई भी आदमी एबीजी शिपयार्ड के चेयरमैन ऋषि अग्रवाल से सुन सकता है।

अब बात आती है सबसे महत्वपूर्ण जैसा सोशल मीडिया में भगत समुदाय #मोदास वर्ग कह रहे हैं कि यह दो सरकारों के बीच हुआ सौदा है। यहां कोई घोटाला सम्भव नहीं। उस भगत समुदाय की जानकारी के लिए डस्सॉल्ट समूह फ्रांस का एक निजी उपक्रम है। जैसे हमारे यहां के अंबानी-अडानी वैसे ही। डस्सॉल्ट कोई फ़्रांसीसी सरकार की कम्पनी नहीं है, जो सौदा हुआ है वो भारत सरकार और डस्सॉल्ट एक निजी कम्पनी के मध्य हुआ है।

अन्य महत्वपूर्ण बात जैसा पिछले दिनों हो-हल्ला मचा था कि आखिर 36 राफेल की वास्तविक कीमत क्या है !!! इस आर्टिकल के लेखक   के पास उपलब्ध दस्तावेज साफ़-साफ़ बताते हैं कि क्या है उसकी कीमत। उसका खुलासा पब्लिक डोमेन में कब और कैसे किया जा सकता है उस पर उचित क़ानूनी सलाह के बाद ही सामने लाया जाएगा।

(पत्रकार नवनीत चतुर्वेदी द्वारा लिखा गया ये लेख गिरीश मालवीय के फेसबुक से साभार लिया गया है।)






Leave your comment