स्वयंसेवक की किस्सागोई पार्ट-4: पंडित जी! रणनीति और तिकड़म मिल जाएं तो साहेब की साख को आप डिगा नहीं सकते

पड़ताल , , बुधवार , 14-11-2018


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

2014 का जनादेश ही क्यों? उसके बाद कमोवेश 18 राज्यों के चुनाव पर भी गौर करें और फिर सोचना शुरू करें बीजेपी के पास क्या वाकई कभी कोई ऐसा तुरुप का पत्ता रहा है जो चुनाव प्रचार के मैदान में उतरता है तो सारे समीकरण बदल जाते हैं। वाजपेयी जी भाषण अच्छा देते थे । लोग सुनते थे । लेकिन भाषण के सुखद क्षण वोट में तब्दील हो नहीं पाते थे । लेकिन नरेन्द्र मोदी के शब्द वोट में तब्दील हो जाते हैं ।

स्वयंसेवक की ये बात प्रोफेसर साहेब को खटक गई तो बरबस बोल पड़े इसका मतलब है संगठन कोई काम नहीं कर रहा है । बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह जिस तरह बूथ दर बूथ बिसात बिछाते हैं क्या उसे अनदेखा किया जा सकता है । या फिर आप इसे चुनावी जीत की ना हारने वाली जोड़ी कहेंगे । हम कुछ कहेंगे नहीं । सिर्फ ये समझने की बात है कि आखिर कैसे उसी बीजेपी में अमित शाह जीत दिलाने वाले तिकड़मी मान लिये गये । उसी बीजेपी में आखिर कैसे मोदी सबसे प्रभावी संघ के स्वयंसेवक होते हुये भी विकास का मंत्र परोसने में ना सिर्फ कामयाब हो गये बल्कि जीत का आधार भी वही रहा । 

बात तो महोदय आप ठीक कह रहे हैं । मुझे इस बहस के बीच कूदना पड़ा । मोदी साढ़े चार बरस में अयोध्या नहीं गये । वह भी सत्ता के पांचवें बरस भी नहीं जा रहे हैं जब सरसंघचालक मोहन भागवत भी नागपुर से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का दबाव अपने शब्दों के जरिये बना रहे हैं । 

पंडित जी अभी दोनों तथ्यों को ना मिलाइये । पहले चुनावी प्रचार की रणनीति-तिकड़म और मोदी-शाह की जोड़ी को समझें । क्यों संघ समझ गया है । मैं ये तो नहीं कह सकता कि संघ कितना समझा है लेकिन प्रचार जिस रणनीति के आसरे चल रहा है वह बीजेपी के कार्यकर्ता को सक्रिय करने की जगह कुंद कर रहा है, इंकार इससे किया नहीं जा सकता । 

कैसे , इसे दो हिस्सों में समझना होगा । पहला , जब अमित शाह की बिसात है और नरेन्द्र मोदी सरीखा चेहरा है तो फिर बाकी किसी को करने की जरूरत ही क्या है । दूसरा , जिन जगहों पर बीजेपी कमजोर है वहां भी अगर जीत मिल रही है तो फिर मोदी-शाह की जोड़ी ही केंन्द्र से लेकर राज्यों में काम करेगी । तो बाकियों की जरूरत ही या क्यों है । 

बाकी का मतलब ? 

बाकी यानी केन्द्र में बैठे मजबूत चेहरे । जिनके बगैर कल तक बीजेपी कुछ नहीं लगती थी । 

मसलन

मसलन, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी सरीखे कोई भी नाम ले लीजिये.....किसी की भी जरूरत क्या किसी भी विधानसभा चुनाव तक में पड़ी । या आपने सुना कि कोई नेता गया और उसने चुनावी धारा बदल दी । सब कुछ केन्द्रित है नरेन्द्र मोदी के ही इर्द-गिर्द । 

प्रोफेसर साहेब जो बार-बार बीच में कुछ बोलना चाह रहे थे । झटके में स्वयंसेवक महोदय के तमाम तथ्यों को दरकिनार करते हुये बोले......मैं सिर्फ आपकी इस बात से सहमत हूं कि बाकी कोई नेता फिलहाल मायने नहीं रख रहा है लेकिन आप अब भी उस नब्ज को पकड़ नहीं पा रहे हैं जहां रणनीति और तिकड़म मिल रही है । अब स्वयंसेवक को बोलना पड़ा। प्रोफेसर साहेब आप ही बताइये कैसे । 

देखिये मैंने जो बीजेपी के चुनाव प्रचार का अध्ययन किया है उसके मुताबिक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनाव प्रचार की रणनीति बनाते वक्त तीन स्तर पर काम करते हैं लेकिन केंद्रित एक ही स्तर पर होते हैं। 

कैसे, थोड़ा साफ करें । 

जी, अमित शाह किसी भी राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले पता लगाते हैं कि वह किस सीट को जीत नहीं सकते। उन सीटों को अपने दायरे से अलग कर राज्यों के कद्दावरों को कहते हैं आप इन सीटों पर जीत के लिये उम्मीदवार बताइये। जीत के तरीके बताइये । तो राज्य स्तर की पूरी टीम जो कल तक खुद को बीजेपी का सर्वेसर्वा मानती रही है वह हार की सीटों को जीत में बदलने के दौरान अपने ही अध्यक्ष के सामने नतमस्तक हो जाती है। दूसरे स्तर पर जिन सीटों पर बीजेपी जीतती आई है उन सीटों पर अपने करीबी या कहें अपने भक्तों को टिकट देकर सुनिश्चित कर लेते हैं कि राज्य में सरकार बनने पर उनके अनुसार ही सारी पहलकदमी होगी । और सारा ध्यान उन सीटों पर होता है जहां कम मार्जिन में जीत-हार होती है । या फिर कोई मुद्दा बीजेपी के लिये परेशानी का सबब हो और किसी इलाके में एकमुश्त हार की आशंका हो । 

जैसे ?

जैसे , गुजरात में सूरत या राजकोट के हालात बीजेपी के लिये ठीक नहीं थे । पटेल तो इन दोनों जगहों पर अमित शाह की रैली तक नहीं होने दे रहे थे। लेकिन चुनाव परिणाम इन्हीं दोनों जगहों पर बीजेपी के लिये सबसे शानदार रहे । 

हां, इसे ही तो स्वयंसेवक महोदय रणनीतिक बिसात की सफलता और मोदी के प्रचार के जादू से जोड़ रहे हैं । 

प्रसून जी ये तर्क ना दीजिये......जरा समझने की कोशिश कीजिये । यूं ही ईवीएम का खेल नहीं होता और दुनिया भर में ईवीएम को लेकर यूं ही सवाल नहीं उठ रहे हैं । आप ईवीएम से समूचे देश को प्रभावित नहीं कर सकते हैं लेकिन जब आपने बीस से तीस फीसदी सीटों को लेकर रणनीति बनानी शुरु की तो ईवीएम का खेल भी वहीं होगा और बीजेपी का चेहरा भी प्रचार के आखिरी दौर में वहीं चुनावी प्रचार करेगा । जिसके बाद जीत मिलेगी तो माना यही जायेगा कि ये बीजेपी के तुरुप के पत्ते का जादू है । यानी विकास की थ्योरी जिसे एक तरफ नरेन्द्र मोदी देश के सामने परोस रहे हैं और दूसरी तरफ संघ का एजेंडा मंदिर-मंदिर कर रहा है तो जीत विकास की थ्योरी को मिलेगी । क्योंकि तब आप उन क्षेत्रों में जाति या धर्म के आधार पर वोटों को बांट नहीं सकते । यानी खेल ईवीएम का होगा लेकिन मैसेज मोदी के प्रचार से समहति बनाते वोटरों का होगा । 

अब स्वयंसेवक महोदय ने ही सवाल किया......प्रोफेसर साहेब अगर मौजूदा हालात को आप सिर्फ ईवीएम के माथे मढ़ देंगे तो फिर रास्ता निकलेगा नहीं । क्योंकि याद कीजिये गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में क्या हुआ था । कलेक्टर ने आखिरी राउंड की गिनती के बाद काउंटिंग रोक दी थी । और तब विपक्ष से लेकर मीडिया ने हंगामा किया तो क्लेक्टर को झुकना पड़ा । फटाफट नतीजों का ऐलान करना पड़ा । 

तो इससे क्या मतलब निकाले...

यही कि ईवीएम या चुनावी गड़बड़ी का विरोध हो रहा है तो 2019 के लोकसभा चुनाव में ज्यादा होगा । 

न न मेरा कहना कम या ज्यादा से नहीं है । मेरा कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी के जादू को जिस तरह विकास की थ्योरी के तौर पर लार्जर दैन लाइफ बना कर बीजेपी या संघ परिवार भी पेश करने में लगा है उसके पीछे टेक्नॉलाजी की ट्रेनिंग है । 

मुझे लगा अभी के हालात पर बात तो आनी चाहिये .....तो बह के बीच में कूदना पड़ा ....स्वयंसेवक महोदय आपको अगर याद हो तो 2009 में बीजेपी जब चुनाव हारी तो ईवीएम का मुद्दा उसने भी उठाया था । और 2010 में तो बकायदा जीवीएल नरसिम्हा राव जो कि तब सैफोलोजिस्ट हुआ करते थे बकायदा ईवीएम के जरिये कैसे लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा है इस पर एक किताब " डेमोक्रेसी इन रिस्क " लिख डाली । और अगर उस किताब को पढ़ा जाये तो मान कर चलिये ईवीएम के जरिये वाकई लोकतंत्र को राजनीतिक सत्ता हड़प ले रही है ये खुले तौर पर सामने आता है । लेकिन अगला सवाल है कि फिर कांग्रेस ये खेल 2014 में क्यों नहीं कर पायी । 

अब स्वयंसेवक ही पहले बोल पड़े । आप दोनों सही हो सकते हैं । लेकिन 2014 का चुनाव आपको इस दृष्टि से देखना ही होगा कि कांग्रेस की दस बरस की सत्ता से लोग उब चुके थे या कहें गुस्से में थे । और उस वक्त चुनाव प्रचार से लेकर कारपोरेट फंडिंग और वोटिंग ट्रेंड भी तो देखिये । फिर कैसे बीजेपी जो चुनाव 2014 में जीतती है उसे बेहद शानदार तरीके से मोदी की जीत और अमित शाह को मैन आफ द मैच में परिवर्तित किया गया । क्योंकि आने वाले वक्त में सत्ता का विस्तार नहीं करना था बल्कि सत्ता को चंद हाथों में सिमटाना था । और ये फिलास्फी 2019 में क्या गुल खिला सकती है अब मोदी सत्ता के सामने यही चुनौती है । 

और क्या संघ परिवार इसे समझ रहा है । 

समझ रहा है या नहीं सवाल ये नहीं है ..... सवाल तो ये है कि संघ के भीतर संघर्ष करते हुये विस्तार या फिर सत्ता की सहूलियत तले आंकड़ों का विस्तार महत्वपूर्ण है । उलझन इसको लेकर है । तभी तो मोदी जी अयोध्या नहीं जाते और योगी जी अयोध्यावासी ही हो जाते हैं । मोदी जी बनारस जा कर गंगा या मंदिर को याद नहीं करते बल्कि गंगा में चलती नाव को देखकर खुश होते हैं । 

तो क्या हुआ मोदी जी और योगी जी के रास्ते दो तरीके से बीजेपी को लाभ पहुंचा सकते हैं तो अच्छा ही है । 

जी नहीं ...ऐसा होता नहीं है । जो चेहरा है वही सबसे बड़ा मोहरा है । और बीजेपी कहीं बोझ तो नहीं जरा इसका एक असर तमिलनाडु में देख कर समझें । रजनीकांत भी बीजेपी के खिलाफ नोटबंदी को लेकर बोल रहे हैं और एआईडीएमके भी फिल्म सरकार का समर्थन करने पर रजीनाकांत को निशाने पर ले रही है । 

तो...

तो क्या कुछ दिनों पहले तक एआईडीएमके, रजनी कांत और बीजेपी एक ही बिसात पर खड़े थे । लेकिन अब कोई भी दूसरे का बोझ लेकर चलने को तैयार नहीं है । 

तो क्या बीजेपी भी बोझ बन रही है । 

क्यों नहीं । बिहार, यूपी में छोटे दल जो सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातिगत वोट लेकर बीजेपी से 2014 में जुड़े वह अब क्या कर रहे हैं । 

जारी

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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