संघ के बदलते चेहरे की असलियत!

ख़बरों के बीच , , बृहस्पतिवार , 20-09-2018


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महेंद्र मिश्र

आरएसएस चीफ मोहन भागवत विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम के तीसरे दिन मंदिर और धारा-370 पर खूंटा वहीं गड़ेगा के अंदाज में बोले। और इन मुद्दों से कतई पीछे नहीं हटने की बात कही। जबकि समान नागरिक संहिता पर उनका रुख इसलिए नरम दिखा क्योंकि उनका मानना था कि सिर्फ मुस्लिम ही नहीं बल्कि बहुत सारे हिंदू समुदायों की जीवन शैली पर भी इसका असर पड़ेगा। लिहाजा इस मसले पर वो फिर से विचार के पक्ष में दिखे।

लेकिन इनके अलावा तमाम विवादित मुद्दों पर भागवत अपनी परंपरागत सोच के मुकाबले बिल्कुल उदार दिखे। वो संविधान हो या कि आरक्षण। यहां तक कि एलजीबीटी समुदाय को मिली छूट तक पर मौजूदा व्यवस्था से वो सहमत दिखे। अंतरजातीय विवाह तक पर संघ प्रमुख को कोई एतराज नहीं है। इसके साथ ही इस पूरे आयोजन के दौरान एक अचरज भरी बात और दिखी जिसमें उन्होंने सबसे ज्यादा सालों तक संगठन के शीर्ष पद पर रहकर उसकी वैचारिक-सांगठनिक सेवा करने वाले गुरू गोलवलकर का नाम तक नहीं लिया। 

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे तीन दिन के कार्यक्रम में 32 शख्सियतों का उन्होंने 102 बार जिक्र किया। लेकिन उसमें गुरू गोलवलकर का एक बार भी जिक्र नहीं आया। उनका नाम श्रोताओं की ओर से पूछे गए एक सवाल के दौरान जरूर आया। जिसमें किसी ने उनके “बंच ऑफ थाट्स” के हवाले से संघ द्वारा मुसलमानों को शत्रु करार देने के उनके विचार के बारे में पूछा था। जिस पर भागवत ने किताब के नये संस्करण में उसको हटा दिए जाने की बात कहकर मामले को टाल दिया। 

अगर मंदिर और धारा-370 को छोड़ दिया जाए तो सर संघचालक की बाकी बातों को देखकर किसी को ऐसा लग सकता है कि संघ बिल्कुल बदल गया है। और वो भी तमाम दूसरे उदारवादी संगठनों की कतार में आकर खड़ा हो गया है। लेकिन क्या ये सच है? क्या सचमुच में संघ बदल गया है? इस पर कोई भोला इंसान ही विश्वास कर सकता है। इस बात को वही शख्स मान सकता है जो संघ के बारे में ए, बी, सी नहीं जानता हो। या फिर अपने भीतर राजनीति की बुनियादी समझ भी नहीं विकसित कर पाया हो।

अगर किसी के दिमाग में इस तरह की थोड़ी बात भी चल रही हो तो उसे एक मिनट के लिए ठहरकर जरूर इस बात पर विचार करना चाहिए कि आखिर तकरीबन 100 साल पुराना संगठन अभी तक जिस काम और लक्ष्य के लिए लगा हुआ था क्या उसे अचानक छोड़ देगा? और एक ऐसे मौके पर जबकि वो सफलता की नई सीढ़ियां चढ़ता जा रहा हो। केंद्र की सत्ता उसके हाथ में हो। और उसके तमाम संगठन दिन दूनी-रात चौगुनी गति से विस्तार पा रहे हों। अनायास नहीं हिंदू राष्ट्र के प्रश्न पर संघ प्रमुख रत्ती भर भी विचलित नहीं होते। और सर सैय्यद अहमद खां के भारत मां का बेटा और राम के इमाम-ए-हिंद होने का हवाला देकर अल्पसंख्यक समुदाय को भी उसके दायरे में खींच लाते हैं।  

तब ऐसी स्थिति में इस पूरे आयोजन और उसमें मोहन भागवत के वक्तव्यों की चीरफाड़ बहुत जरूरी हो जाती है। निश्चित तौर पर ये आयोजन बेहद खास है। और यही नहीं इसके पहले शिकागो और उससे भी पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नागपुर मुख्यालय जाना इसी की प्रारंभिक कड़ी के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन तीनों आयोजनों के पीछे दूरगामी और तात्कालिक उद्देश्य हैं। जिन्हें राजनीतिक शब्दावली में रणनीति और कार्यनीति बोला जाता है।

रणनीति दूरगामी होती है जबकि कार्यनीति तात्कालिक या फिर समय और परिस्थितियों के हिसाब से तय की जाती है। संघ के सामने इस समय दो चुनौतियां हैं। एक तरफ उसे तात्कालिक तौर पर 2019 की चुनावी भंवर को पार करना है। दूसरी तरफ इस मुकाम पर पहुंचकर जबकि उसे खुलकर सामने आना पड़ा है तब इन नई परिस्थितियों में आगे की रणनीति तय करना है। 

इन आयोजनों के जरिये संघ ये संदेश देना चाहता है कि अब वो समाज की नेतृत्वकारी भूमिका में आने के लिए तैयार है। उसने इतनी ताकत अर्जित कर ली है कि न सिर्फ एक दल (बीजेपी) बल्कि दूसरे दलों को भी वो प्रभावित करने में सक्षम है। और इस प्रक्रिया में उसकी कोशिश पूरे समाज और राजनीति को अपने हाथ में लेने की होगी। इसके शुरुआती दौर में कुछ चीजों पर समझौता करना पड़े तो संघ उसके लिए भी तैयार है। जिसको भागवत ने सरल शब्दों में परीक्षा प्रश्नों के हल करने के उदाहरण से साफ किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी सबसे पहले सरल सवाल का उत्तर देता है उसके बाद आखिर में वो कठिन सवालों को हल करता है। अब संघ के जीवन में कठिन सवालों को हल करने का समय आ गया है।

समझौते की उसकी ये रणनीति 2019 की उसकी जरूरतों पर भी फिट बैठती है। जब उसे बीजेपी के उसी बहुमत के साथ सत्ता में आने की गुंजाइश नहीं दिख रही है जैसा कि पिछली बार था। या फिर उसमें विपक्ष तक कि सरकार बनने की संभावनाएं हैं। यही वजह है कि उसे अपनी आक्रामकता के इस केंचुल को उतारना पड़ रहा है। इसके संकेत भागवत ने शिकागो की बैठक में ही दे दिए थे जब उन्होंने कहा था कि जंगली कुत्ते मिलकर कभी-कभी एक शेर का भी शिकार कर लेते हैं। लिहाजा इस “शेर” को जिंदा रहने के लिए अब अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ रहा है। और मोदी भी इस दौर में किसी ध्रुवीकरण पर भरोसा करने की जगह जहां से जितना वोट मिल सके उसके प्रयास में जुट गए हैं। 

इस लिहाज से वो मुसलमानों के वोहरा समुदाय को पटाने से लेकर तीन तलाक पर अध्यादेश के जरिये मुस्लिम महिलाओं तक से वोट हासिल करने के जुगाड़ में लग गए हैं। एससी-एसटी एक्ट में परिवर्तन और पिछड़े आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर उन्होंने पिछड़े और दलित हिस्से में भी उसी तरह की कोशिश की है। और रही सवर्णों की नाराजगी की बात तो संघ प्रमुख ने नोटा के विकल्प को खारिज कर उन्हें बीजेपी के पक्ष में खड़े होने का संदेश पहले ही दे दिया है।

इसके साथ ही इस बैठक में संघ की एक दूरगामी रणनीति भी दिखी है। जिसके तहत उसने गोलवलकर को पृष्ठभूमि में धकेल कर अपने खिलाफ इस्तेमाल होने वाले मुस्लिम विरोधी हथियारों को बोथरा करने की कोशिश की है। इसके जरिये संघ उस तबके को चुप करा देना चाहता है जो गोलवलकर का उदाहरण देकर उसको घेरने की कोशिश करता रहा है। क्योंकि संघ जो कहता है वो करता नहीं और जो करता है उसको कहने की जरूरत नहीं पड़ती। लिहाजा गोलवलकर को पीछे रखने का मतलब ये कतई नहीं है कि वो उनसे इत्तफाक नहीं रखता। या फिर भविष्य में उसकी कोई जरूरत नहीं रही। बल्कि उसका मानना है कि जब पूरे समाज पर हिंदुत्व का वर्चस्व हो जाएगा तो उसके जिस भी हिस्से को जिस तरह से रखने की जरूरत होगी उसको पूरा किया जा सकता है।

बीजेपी के सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने के साथ ही एक तरह से उसने देश की अगुवाई हासिल कर ली है। इस कड़ी में कांग्रेस को भी अपने एजेंडे पर लाने के लिए मजबूर कर एक तरह से उसने समाज और राजनीति पर अपना वैचारिक वर्चस्व स्थापित कर लिया है। नेहरू की कांग्रेस अगर शिवभक्त राहुल की कांग्रेस बन जाए तो उसे भला उससे क्या परहेज हो सकता है? पूरे पोलिटिकल डिसकोर्स में अगर उसने अल्पसंख्यकों को अप्रासंगिक कर दिया है तो उसके लिए इससे बड़ी सफलता और क्या होगी? ऐसे में अगर अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए दो कदम पीछे हटने की शर्त हो तो इसको वो खुशी-खुशी स्वीकार करेगी।










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