आरएसएस के संतुलन का कमाल! मीडिया लिंचिंग और मॉब लिंचिंग बने एक दूसरे के पूरक

खरी-खरी , , बृहस्पतिवार , 12-07-2018


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विकास नारायण राय

आरएसएस का आज का प्रशासनिक जलवा देखना है तो उसे मोदी की भाजपा सरकार से संतुलनकारी भूमिका में देखिये। वरना, पहली नजर में यही लगेगा कि सुषमा स्वराज के विदेश मंत्रालय ने जो धर्मान्तरण को मुद्दा बनाने वाले पासपोर्ट अफसर का दंडात्मक तबादला किया, उसमें और जूनियर वित्त मंत्री जयंत सिन्हा के सजायाफ्ता ‘गौ रक्षक’ हत्यारों को माला पहनाने में कोई सम्बन्ध नहीं है। न मोदी के एक और मंत्री गिरिराज सिंह के सांप्रदायिक हिंसा आरोपियों को बिहार की जेल में जाकर सांत्वना देने और नीतीश कुमार के साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त न करने की हालिया बयानबाजी में।

साफ है, आरएसएस को अपने हार्डकोर उच्च जाति अनुयायियों का राजनीतिक ध्यान रखना पड़ेगा ही। हाल में, सुप्रीम कोर्ट के जज आदर्श कुमार गोयल को अवकाश प्राप्ति के साथ ही एनजीटी का चेयरमैन बनाये जाने को, उनके एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने वाले फैसले से जोड़ कर चर्चा रही है। आरएसएस जब-तब जातिगत आरक्षण को भी कमजोर कर सकने वाला इसी मिजाज का फैसला सुप्रीम कोर्ट से हासिल करने की कवायद करता आ रहा है। जबकि इससे उपजे असंतोष को संतुलित करने के दिखावे में कभी मोदी तो कभी अमित शाह को सफाई की मुद्रा में सामने आना पड़ जाता है। 

जरूरी नहीं कि आरएसएस की हर संतुलनकारी चाल चर्चा में भी आये। कश्मीर में मोदी-महबूबा गठबंधन के समानांतर ‘गोली समाधान’ वाले जनरल बिपिन रावत को सीनियर जनरलों की अनदेखी कर सेनाध्यक्ष बनाए जाने का सन्दर्भ मीडिया के नेपथ्य में ही रह गया। हालाँकि, अंतर्राष्ट्रीय मंचों की बाध्यता को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार को कश्मीर में वार्ता का दिखावा करने के लिए अंततः एक ‘इंटरलोक्यूटर’ भी लगाना पड़ा। वैसे ही, जैसे नेहरू को गरियाने का एजेंडा मोदी निभा रहे हैं और साथ ही नेहरू भक्त प्रणब मुखर्जी को आरएसएस मुख्यालय में दीक्षांत भाषण के लिये आमंत्रित किया जा रहा है।

गवर्नर, मंत्री, प्रोफेसर, निगम-बोर्ड जैसी नियुक्तियों में आरएसएस का कोटा तो जग जाहिर है। लेकिन कम ही पता है कि दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनने के दावेदार को अमित शाह ही नहीं आरएसएस कमांड तक भी अर्जी पहुंचानी पड़ती है। जिन राज्यों में सीधे आरएसएस के कृपा पात्र मुख्यमंत्री हैं, वहां मलाईदार प्रशासनिक पदों पर लगने के लिए आरएसएस का वरदहस्त भी चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में, सुप्रीम कोर्ट के राज्यों को मॉब लिंचिंग को रोकने के ताजा निर्देश की व्यर्थता को महसूस कीजिये। दिल्ली में दीवाली में पटाखा नियंत्रण या महाराष्ट्र में बाल गोविन्दाओं के मटकी फोड़ने पर रोक जैसे सुप्रीम कोर्ट आदेशों का हश्र याद कीजिये।

असीमानंद को तमाम आतंकी मुकदमों से बरी कराना मोदी सरकार का राष्ट्रीय एजेंडा यूँ ही नहीं बन गया। ‘भगवा आतंकवाद’ को नकारना आरएसएस के लिए जीवन-मरण जैसा मुद्दा बना हुआ है। उसके वरिष्ठ प्रचारक रहे असीमानंद को दो आतंकी बम-कांडों, अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद मामलों से बरी कराया जा चुका है। समझौता एक्सप्रेस बम काण्ड से भी उसको बरी करने की पूरी तैयारी है। इसके लिए सरकारी गवाहों को स्वयं मोदी की जांच एजेंसी एनआइए ने बैठाया, जिसका काम अन्यथा असीमानंद को सजा दिलाना था।

 कायदे से अदालत में केस कमजोर करने के लिए एनआइए की खासी खबर ली जानी चाहिए थी। लेकिन, इसके उलट, पहले एनआईए चीफ शरद कुमार को दो वर्ष की सेवा वृद्धि दी गयी और अब सेवा निवृत्ति के बाद पुरस्कार स्वरूप उन्हें सेंट्रल विजिलेंस कमीशन में नामित कर दिया गया। याद रहे कांग्रेस शासन में असीमानंद की गिरफ्तारी के समय भी आरएसएस ने आडवानी समेत भाजपा के कई शीर्ष नेताओं से विरोध स्वरूप बयान दिलवाये थे। इसी तरह समझौता मामले को लेकर मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री अरुण जेटली और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से भी उसी अंदाज के बयान दिलवाये गये हैं। 

सत्ता में प्रशासनिक संतुलन का ठेठ असंवैधानिक जलवा कोई पहली बार नहीं देख रहा है देश। इंदिरा गाँधी-संजय गांधी के अधिनायकवादी और दस जनपथ-मनमोहन सिंह के कठपुतली समीकरण भूले नहीं जा सकते। कितने ही तरह के मुख्यमंत्रियों के उदाहरण सामने हैं जिनके निजाम में उनके परिवार का प्रशासनिक दखल किसी भी क़ानूनी या संवैधानिक बंदिश को न मानने वाला रहा है। इस लिहाज से बेशक वर्तमान आरएसएस दौर में कुछ नया न भी हो, लेकिन प्रशासन के विघटन से राष्ट्र और समाज के विघटन की आज जैसे स्तर पर पहुंची खतरनाक संभावना शायद ही पहले कभी बनी होगी।

क्योंकि, आरएसएस दखल का स्वरूप, बहुसंख्यक अलगाववाद के रास्ते पर एक ठेठ सवर्णवादी एजेंडा से कम कुछ नहीं हो सकता। मोदी सरकार में यह मध्ययुगीन एजेंडा, विकास की सवारी अपने लिए गाँठने और आधुनिकता को मनचाहा नाथने को स्वतंत्र है। पुरातनपंथी राष्ट्रवाद के आगे आधुनिक राष्ट्र निर्माण की हैसियत घटी है। मीडिया लिंचिंग और मॉब लिंचिंग एक दूसरे के पूरक नजर आने लगे हैं!

मसलन, वर्षों से कश्मीर में दो स्थाई फ्रंटियर होते थे- पाकिस्तान बॉर्डर और अलगाववादी उग्रवाद। आरएसएस के दखल ने वहां दो फ्रंटियर और स्थाई कर दिए लगते हैं- सेना बनाम नागरिक और राष्ट्र बनाम कश्मीर। मसलन, देश में रोजगार और महंगाई के पारंपरिक फ्रंटियर इस संतुलनकारी दखल की बदौलत इतिहासवाद और सैन्यवाद की भेंट चढ़ गए हैं। मसलन, तिरंगा, जन-गण-मन, और गाँधी जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को संतुलित करने में भगवा, बन्दे मातरम् और गाय जैसे धार्मिक प्रतीक लगे मिलेंगे।

दरअसल, आरएसएस और मोदी सरकार का यह संतुलनकारी समीकरण, भारतीय संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के परस्पर संतुलन को फिलहाल दीमक की तरह चट कर रहा है। पर्याप्त कमजोर करने के बाद वह इसके स्थायित्व को किसी झटके में धराशायी भी कर सकता है।

(विकास नारायण राय आईपीएस की सेवा से रिटायर होकर आजकल हरियाणा में रह रहे हैं। ये लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)








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