EXCLUSIVE:आरटीआई में खुलासा; मौत से एक सप्ताह पहले हटा ली गयी थी जज लोया की सुरक्षा व्यवस्था

EXCLUSIVE , नई दिल्ली/नागपुर, रविवार , 10-06-2018


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महेंद्र मिश्र

नई दिल्ली/नागपुर। सीबीआई जज बीएच लोया से जुड़ा एक और सनसनीखेज खुलासा हुआ है। एक आरटीआई के जवाब में ये बात सामने आयी है कि 24.11.2014 से 02.12.2014 के बीच लोया के पास किसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। जबकि उसके पहले उन्हें सुरक्षा मिली हुई थी और बताया जा हा है कि एक बॉडीगार्ड नियमित तौर पर उनके साथ रहता था।

आरटीआई कार्यकर्ता अशोक पै ने 21.12.2017 को मुंबई पुलिस आयुक्त के कार्यालय में इससे संबंधित एक आरटीआई डाली थी। जिसमें उन्होंने कई सवाल पूछे थे। विषय सीबीआई जज बीएच लोया बताया गया था। और सूचना के समयांतराल में 24 नवंबर 2014 से 02 दिसंबर 2014 की तारीख लिखी थी।

उसके बाद तीसरे कॉलम में सिलसिलेवार तरीके से कई सवाल पूछ गए थे। जिसमें सबसे पहले सवाल में उन सभी अफसरों के नाम और उनके पद पूछे गए थे जो जज लोया की सुरक्षा में उक्त समयांतराल में तैनात थे।

दूसरे में संबंधित अफसरों के ड्यूटी रजिस्टर की कॉपी मुहैया कराने की मांग की गयी है।

मुंंबई पुलिस आयुक्त दफ्तर में दायर आरटीआई।

अगले सवाल में सभी अफसरों की मौजूदा तैनाती और उनके पद का विवरण मांगा गया था।

आखिर में बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल पूछा गया है। इसमें कहा गया है कि मुंबई पुलिस जज लोया के नागपुर दौरे के दौरान नागपुर पुलिस को मुहैया कराए गए उनके कार्यक्रम के ब्योरे की प्रमाणित कॉपी उपलब्ध कराए।

स्पीड पोस्ट के जरिये मुंबई पुलिस आयुक्त मुख्यालय की ओर से 26 दिसंबर 2017 को मिला आरटीआई का जवाब बेहद चौंकाने वाला है। 

मुंबई पुलिस का आटीआई का जवाब।

इसमें कहा गया है कि “आपको सूचित किया जाता है कि 24.11.2014 से 2.12.2014 के दौरान सेफ्टी और सिक्योरिटी डिपार्टमेंट की ओर से सीबीआई कोर्ट के जज माननीय श्री बीएच लोया को कोई सुरक्षा नहीं मुहैया करायी गयी थी।”

आरटीआई जवाब का अंग्रेजी तर्जुमा।

हालांकि इसमें नागपुर पुलिस को उनके कार्यक्रम की जानकारी देने संबंधी सवाल का जवाब नहीं दिया गया है। लेकिन नागपुर में भी उन्हें कोई सुरक्षा नहीं दी गयी थी। क्योंकि विधि और न्याय विभाग की ओर से रविभवन के व्यवस्थापक और प्रोटोकाल अफसर को जारी पत्र में उसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।

इसके साथ ही इसकी पुष्टि नागपुर में दायर एक आटीआई के एक जवाब में भी हुई है। नागपुर सिटी के पुलिस कमिश्नर से पूछा गया था कि 29.11.2014 से 01.12.2014 तक क्या जज लोया को कोई सुरक्षा मुहैया करायी गयी थी। 11.12.2017 को हासिल हुए इस आरटीआई का पुलिस कमिश्नर के दफ्तर ने 30.12.2017 को जवाब दिया। सूचना अफसर एमएन कोटनाके द्वारा हस्ताक्षरित आरटीआई के इस जवाब में कहा गया है कि “नागपुर सिटी के उपलब्ध रिकार्ड की जांच के बाद जज लोया को बॉडीगार्ड सप्लाई करने से जुड़ा एंट्री नोट नहीं मिला।” इसका मतलब है कि जज लोया को नागपुर सिटी में भी किसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था मुहैया नहीं करायी गयी।

नागपुर पुलिस कमिश्नर द्वारा दिया गया आरटीआई का जवाब।

इसके पहले जज लोया की बहन अनुराधा बियानी ने मुंबई में उनके रहने के दौरान उनके सुरक्षा गार्ड की तबियत खराब होने का जिक्र किया था। लेकिन उसके स्थान पर कोई दूसरा बाडीगार्ड नहीं दिया गया था। ऐसी स्थिति में जबकि किसी सिक्योरिटी अफसर की तबियत खराब होती है तो वैकल्पिक बॉडीगार्ड मुहैया कराना पुलिस विभाग की जिम्मेदारी बन जाती है। और वैसे भी आमतौर पर बॉडीगार्ड शिफ्टों में काम करते हैं और उनकी ड्यूटी बदलती रहती है। लिहाजा शिफ्ट के हिसाब से उनकी ड्यूटी पर नजर रखना पुलिस महकमे का कर्तव्य होता है।

लेकिन यहां 24 नवंबर 2014 से लेकर 2 दिसंबर 2014 के बीच तक उनके पास किसी तरह की कोई सुरक्षा व्यवस्था थी ही नहीं। यानी नागपुर से जाने से बहुत पहले ही उसे हटा लिया गया था। और जब वो नागपुर पहुंचे तो उन्हें वहां भी कोई सुरक्षा नहीं दी गयी। ये कैसे हुआ, क्यों हुआ और उसके लिए कौन जिम्मेदार है। इसको लेकर कोई जांच नहीं हुई। न ही स्पेशल इंटेलिजेंस विभाग के कमिश्नर संजय बर्वे जिनको एडिशनल डीजीपी का रैंक हासिल है के नेतृत्व में गठित डिस्क्रीट इंक्वायरी में इसका कोई जिक्र है। क्या बर्वे की ये सबसे पहली जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वो इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करते? बर्वे को क्या उस बॉडीगार्ड से सवाल नहीं पूछना चाहिए था? या फिर उनकी सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अफसरों से सुरक्षा न मुहैया कराने के पीछे के कारणों की जांच-परख नहीं करनी चाहिए थी?

ये तमाम सवाल हैं जो अभी भी अनुत्तरित हैं। सबसे खास बात ये है कि इस तरफ माननीय सर्वोच्च न्यायालय की भी निगाह नहीं गयी। और महाराष्ट्र सरकार ने खुद भी कुछ नहीं बताया।






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जज लोया की कूल ब्लडेड मर्डर हुआ था