जांचकर्ताओं की नजर में समझौता धमाके से बिल्कुल साफ जुड़ता था हिंदुत्व समूहों का लिंक

ख़ास रपट , नई दिल्ली, शुक्रवार , 22-03-2019


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जनचौक ब्यूरो

(समझौता धमाका मामले में एनआईए कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। 21 मार्च 2019 को आए इस फैसले में मुख्य आरोपी स्वामी असीमानंद समेत सभी चारों आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया है। इस मौके पर मामले की शुरुआती मुख्य जांचकर्ता विकास नारायन राय का एक साक्षात्कार दिया जा रहा है जो 6 जून 2016 को दि वायर में प्रकाशित हुआ था-संपादक।)

नई दिल्ली। समझौता धमाके के मुख्य जांचकर्ता रहे विकास नारायन राय के मुताबिक घटना में इंदौर आधारित अतिवादी हिंदू समूहों के हाथ होने के पुख्ता प्रमाण थे। इसके जरिये उनका इशारा सीधे-सीधे आरएसएस की तरफ था। ये बातें तीन साल पहले उन्होंने “दि वायर” को दिए एक इंटरव्यू में कही थी। इस आतंकी हमले में 68 लोगों की मौत हो गयी थी जिसमें ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिक थे।

2007 से 2010 तक विशेष जांच दल यानी एसआईटी के मुखिया के तौर पर काम करने वाले हरियाणा के पूर्व आईपीएस अफसर राय ने बताया कि पुलिस ने घटनास्थल से एक गैरफटा बम बरामद किया था। जांच की प्रक्रिया में यह पाया गया कि विस्फोटक के सभी हिस्से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी समूहों से जुड़े लोगों द्वारा खरीदे गए थे।

राय ने बताया कि प्रमाणों का पीछा करते हुए जांच दल इंदौर पहुंचा जहां ऐसा पाया गया कि आरएसएस सदस्य सुनील जोशी और उसके दो सहयोगी अपराध में लिप्त थे। अभी जांच दल के लोग जोशी से कुछ पूछताछ कर पाते उससे पहले ही उनकी हत्या कर दी गयी।

गौरतलब है कि एनआईए कोर्ट ने इस मामले में मुख्य आरोपी स्वामी असीमानंद समेत चार अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने पहले मामले में पाकिस्तान आधारित आतंकी समूह लश्कर-ए-तोएबा का हाथ होने का संदेह जाहिर किया था।

2015 में मालेगांव धमाके की सरकारी वकील रोहनी सालियन ने हिंदू अतिवादियों के प्रति नरमी से पेश आने के लिए एनआईए द्वारा उनके ऊपर दबाव डाले जाने का आरोप लगाया था। कुछ सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने भी इस बात का आरोप लगाया था कि एनआईए मुखिया शरद कुमार का कार्यकाल इसलिए विस्तारित किया गया था जिससे 2006 से 2008 के बीच हुए धमाकों की श्रृंखला में हिंदू अतिवादियों की भूमिका से लोगों का ध्यान हटाया जा सके।

राय द्वारा जांच का दिया गया विवरण न केवल संघ बल्कि बीजेपी को भी शर्मिंदा करने के लिए काफी है। लेकिन हिंदुत्ववादी इसे खारिज करते हैं और कुल मिलाकर कांग्रेस का प्रोपोगंडा करार देते हैं।

इंदौर की भूमिका

दिसंबर, 12 में रिटायर होने वाले 1977 बैच के आईपीएस अफसर राय ने बताया कि “धमाका हरियाणा में पानीपत के पास फरवरी 2007 में हुआ था और दो या तीन दिनों के भीतर एसाआईटी गठित हो गयी थी। विस्फोटकों के फटने से ट्रेन की वो दो बोगियां बिल्कुल क्षतिग्रस्त हो गयी थीं जिनमें उन्हें लोड किया गया था। हम बड़े सौभाग्यशाली रहे कि एक विस्फोटक ऐसा हासिल कर लिए जो फट नहीं सका था। यह विस्फोटक सूटकेस में पैक्ड था।”

राय ने बताया कि “जब हम लोगों ने डिवाइस को ध्वस्त किया तो उसके बाद उनके विभिन्न आइटमों के स्रोतों को भी खोजना शुरू किया। हम डिवाइस के हर पार्ट के निर्मताओं तक पहुंच गए। हमने स्टाकरों से संपर्क किया। रिटेलरों को भी तलाशा। यह पूरे देश के स्तर पर चलाया गया था। आखिर में हम लोग इंदौर पहुंचे। वहां हम उस बाजार को चिन्हित करने में कामयाब रहे जहां से सूटकेस को खरीदा गया था। मुझे स्टोर का नाम आज भी याद है। वह रघुनंदन अटैची स्टोर के नाम से बुलाया जाता था और उसका मालिक एक बोहरा मुस्लिम था। दुकान के सेल्समैन में एक हिंदू था और एक मुस्लिम। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि दो युवा लड़के आए थे (सूटकेस खरीदने के लिएए)। ये दोनों हिंदी इंदौरी लहजे में बोल रहे थे। (गहराई से जांच के बाद) उनका हम पर विश्वास बढ़ गया और बताया कि वे इस बात को लेकर बिल्कुल निश्चित हैं कि दोनों हिंदू थे मुस्लिम नहीं”।

उन्होंने कहा कि हालांकि सेल्समैन का विवरण शुरुआती ब्रेकथ्रू माना गया लेकिन एसआईटी इसे आखिरी प्रमाण नहीं मान रही थी। उन्होंने बताया कि “स्केच बनने में उनके सहयोग के बाद हम लोगों ने उन व्यक्तियों की तलाश शुरू कर दी। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रगति तब हुई जब पता चला कि बम का हर आइटम इंदौर से लिया गया है। और वे सभी सूटकेस स्टोर के एक किलोमीटर के दायरे में थे। यह बात स्थापित हो गयी कि पूरा बम वहीं असेंबल किया गया था।”

राय ने आगे बताना जारी रखा। उन्होंने कहा कि एसआईटी का पहला शक स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकी समूहों या संगठनों पर था। लेकिन जैसे ही जांच आगे बढ़ी यह बात साफ होती गयी कि वे शामिल नहीं थे। उन्होंने बताया कि “उस समय हम लोगों ने जेल में बंद बहुत सारे मुसलमानों से पूछताछ की थी। इसमें सिमी का हेड सफदर नागौरी भी शामिल था। इंदौर न केवल सिमी के लिए कुख्यात था बल्कि हिंदुत्व कार्यकर्ताओं के लिए भी।”

जब एमपी पुलिस ने अपना हाथ खींचा

उन्होंने यह आरोप लगाया कि एक बार जैसे ही ब्रेकथ्रू होने के बाद एसआईटी ने हिंदुत्व के कोण से मामले की जांच शुरू की तो उसको एमपी पुलिस से बहुत ज्यादा सहयोग नहीं मिला। उन्होंने बताया कि “निजी तौर पर कुछ पुलिस अफसरों ने हमें बताया कि हम सही दिशा में हैं लेकिन आधिकारिक तौर पर हम ज्यादा मदद नहीं हासिल कर सके।”

राय ने बताया कि “जल्द ही सुनील जोशी की अगुआई में हिंदुत्व समूह के अस्तित्व की बात हम लोगों को पता चल गयी....वह एक आरएसएस सदस्य था। लेकिन जैसे ही हमने इस पहलू से जांच शुरू की उस शख्स की उसी साल के अंत में 2007 में हत्या हो गयी। स्थानीय पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा लेकिन आखिरी तौर पर उन्हें छोड़ना पड़ा (प्रमाणों की कमी के चलते)। हम सुनील जोशी और उसके दो सहयोगियों कलसांगरे औऱ आंग्रे की भूमिका की जांच कर रहे थे। हमें उनका ठीक-ठीक पूरा नाम नहीं याद है। ये दोनों अभी तक लापता हैं। यहां तक कि एनआईए भी उन्हें पकड़ने में सफल नहीं हुई।”

उन्होंने आगे बताया कि एसआईटी इस बिंदु के आगे नहीं जा सकी लेकिन टीम हिंदुत्व समूहों से संबंधों की बात सामने आने से चकित थी। क्योंकि उससे पहले इस तरह के किसी अपराध में उनके जुड़े होने का कोई उदाहरण नहीं था। उन्होंने बताया कि यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारी भी इस प्रगति से अचंभे में थे। उन्होंने बताया कि “आतंकवाद से जुड़े कई मामलों में प्रगति की समीक्षा के लिए गृहमंत्रालय कई संयुक्त बैठकें करता था जिसमें से कुछ में मैंने भी हिस्सा लिया था। वे पाकिस्तानी एंगल को देख रहे थे।”

राय ने आगे जोड़ा कि इन संयुक्त बैठकों में ही उन्हें इस बात का पता चला कि मक्का मस्जिद धमाके (2007), अजमेर शरीफ धमाके (2007), मालेगांव ब्लास्ट (2006) और समझौता एक्सप्रेस धमाके में पैटर्न बिल्कुल एक है। राय ने कहा कि “ठीक वही डिवाइसेज, बिल्कुल वही मोडस आपरेंडी का इस्तेमाल किया गया था.....हम लोगों ने हिंदुत्व गतिविधियों में शामिल कुछ लोगों की सूची तैयार कर ली थी। ये वे सदस्य थे जिन्हें रंगरूट के तौर पर शामिल किया गया था।”

राय के मुताबिक “दूसरा अहम खुलासा 2008 में हुआ जब मालेगांव में दूसरा बम ब्लास्ट हुआ। मेरे पास सूचना थी कि महाराष्ट्र के एटीएस चीफ हेमंत करकरे ने कुछ महत्वपूर्ण सुराग हासिल किए हैं। हमारी अक्तूबर 2008 में उनसे बातचीत हुई थी। उन्होंने बताया कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटरसाइकिल के जरिये वह कर्नल पुरोहित और असीमानंद जैसे हिंदुत्व नेटवर्क के दसूरे सदस्यों तक पहुंचे। उन्होंने कहा था कि 15-20 दिनों के भीतर सभी सबूतों के टुकड़ों को इकट्ठा करने के बाद वह फिर हमसे मिलते हैं लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि मुंबई हमले में उनकी हत्या हो गयी।” यह हमला 26 नवंबर, 2008 को हुआ था।

2010 में एनआईए द्वारा केस को हाथ में लिए जाने से पहले अजमेर शरीफ ब्लास्ट और मक्का धमाके की जांच के अलावा सीबीआई दूसरे केसों की निगरानी कर रही थी। राय ने बताया कि हरियाणा एसआईटी ने जो जांच किया था उस पर उन्हें गर्व है। “हमारी टीम इंदौर पहुंची। हम पहले लोग हैं जिन्हें इंदौर को केंद्र के तौर पर स्थापित किया। हमने हिंदुत्व लिंक को चिन्हित किया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जो हम कहना चाहते हैं वह ये कि हम किसी जल्दबाजी में लोगों की गिरफ्तारी करने में नहीं फंसे। सिमी के संचालकों को गिरफ्तार करके उनसे पूछताछ करना बहुत आसान था। लेकिन हमने जांच की और केस की गहराई तक गए।”

यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी टीम पर यूपीए सरकार द्वारा कुछ दबाव डाला गया था। उन्होंने कहा कि “वास्तव में वे इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि हम कुछ पाकिस्तानी संपर्क को हासिल कर लेंगे इसलिए वे उन्हें शर्मिंदा कर सकते हैं (अपने पाकिस्तानी विरोधियों को)। लेकिन ऐसा नहीं होना था। कोई दबाव नहीं था क्योंकि समझौता किसी के लिए मायने नहीं रखता था। धमाके दिल्ली में होने थे लेकिन बम पानीपत के पास फटा। इसलिए यह हरियाणा का मामला बन गया। अगर यह दिल्ली केस होता तो ये और ज्यादा प्रचार हासिल करता। साथ ही पीड़ित भी स्थानीय लोग नहीं थे। गृहमंत्रालय और एसआईटी दोनों की पहली धारणा एक ही थी- एक पाकिस्तानी कोण की। हमने सोचा कि इसे इसलिए अंजाम दिया गया है जिससे भारत और पाकिस्तान के बीच की बातचीत को पटरी से उतार दिया जाए। जैसे ही हम लोगों ने हिंदुत्व एंगल पाया हम बेहद सावधान हो गए। हम तब तक शांत रहे जब तक उसको लेकर निश्चित नहीं हो गए।”

राय सरकार में रहते कई महत्वपूर्ण पदों पर सेवा कर चुके हैं। जिसमें हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पुलिस एकैडमी भी शामिल है जहां वह निदेशक के तौर पर तैनात थे। और पांच साल पहले वह वहीं से रिटायर हुए।

 










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