भारत का भविष्य तय करेगा गुजरात चुनाव: संजीव भट्ट

गुजरात की जंग , , मंगलवार , 05-12-2017


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स्पर्श उपाध्याय

एक स्वस्थ जनतंत्र की यही पहचान होती है की उसमें उन आवाज़ों को भी सुना और समझा जाता है जिन आवाज़ों को हम पसंद नहीं करते या जो आवाज़ें मुख्याधारा से जुदा हों। और मेरी समझ में एक सच्ची डेमोक्रेसी वही है जहाँ, "We Accommodate Uncomfortable Truths". एक खुले पार्क सा वातावरण, जनतंत्र का सार है और किसी भी प्रकार का डर उस पार्क की दहलीज़ के पार रहता है। जहाँ डर है वहां जनतंत्र सांस नहीं ले सकता, इस बात को इतिहास के तमाम गवाह भी क़ुबूल करते हैं।

कबीर का एक दोहा यूँ ही चर्चित नहीं है, "निंदक नियरे रखिये, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।" जिसका बहुत सीधा सा अर्थ है, हमे अपनी आलोचना सहर्ष स्वीकार करनी चाहिए, दूसरों की जी-हुज़ूरी हमे शैतान बना देती है, याद रहे तानाशाह व्यक्तित्व का निर्माण जी-हुज़ूरी से ही शुरू होता है और विध्वंसकारी विनाश पर समाप्त।

जनतंत्र में तराज़ू लेकर लोगों को तौला नहीं जाता, तर्क तौले जाते हैं और जिस तर्क का पलड़ा भारी हो वो जरूरी नहीं कि तादाद में भी बड़ा हो, बस जरूरी है तो वह है सच की मजबूत पकड़ और बातचीत का स्पेस। ऐसे ही एक शख्स से मैं हाल ही में मिला, जिसकी हुकूमत से लड़ाई बहुत लंबी रही है, मैं सच और झूठ को तराज़ू में तौले बिना बस वो बातें आपके सामने रखूँगा जो बातें उन्होंने मुझसे कीं। वैसे भी जनतंत्र तर्कों से चलना चाहिए, सच और झूठ की दीवार खड़ी करके नहीं, क्योंकि ऐसे सच अमूमन 'अंतिम सच' कह कर हमें थमा दिए जाते हैं। जिनके आगे कोई वाद-विवाद संभव नहीं होता, ऐसे सच खतरनाक होते हैं और हम जनता को महज़ वोट देने की मशीन भर बना देते हैं।

पेश है, पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट से मेरी मुलाकात के कुछ अंश:-

स्पर्श उपाध्याय: देश की मौजूदा स्तिथि पर आपका क्या कहना है? दूसरी आवाज़ों पर जिस तरह से प्रहार हो रहा है, आप उसे कैसे देखते हैं? मीडिया कितना न्यूट्रल रह गया है?

संजीव भट्ट: ऑटोक्रेट्स अर्थात स्वेच्छाचारी शासक हमेशा एक असहमत आवाज़ से डरता है इसलिए वह हमेशा इस कोशिश में रहता है कि किस प्रकार मतभेद या असहमत आवाज़ें जितनी हो सके दबी रहें, और बोलने की आज़ादी पर जो प्रहार वर्तमान-काल में हो रहा है वह उसी ऑटोक्रेटिक विचारधारा का एक प्रमाण है। हम यह देखते हैं की पब्लिक-स्पेसेस में जिस प्रकार एक तरफ़ा बातें होती हैं, जहाँ सवाल पूछने का मौका नहीं दिया जाता। वह चिंताजनक है। मीडिया न ही सवाल पूछना चाह रहा है न ही मीडिया को पूछने दिया जा रहा है, यह सब बहुत साफ़ इशारा इस बात की ओर करता है कि आज का मीडिया पूरी तरह कॉर्पोरेट दबाव में है। जहाँ चर्चाओं का स्तर घटता जा रहा है और किसी भी प्रकार की जनता के प्रति जिम्मेदारी को मीडिया नकारता जा रहा है।

देश में और भी समस्याएं हैं जिनमें प्रमुखता से राष्ट्रवाद को लेकर जिस तरह की बहसें हैं वह बहुत ही साफ़ तौर पर इस ओर इंगित करती हैं कि सरकार की आलोचना किसी को भी देश विरोधी अथवा राष्ट्र विरोधी बना सकती है। और गुजरात प्रदेश में भी यही हाल है।  

संवाददाता स्पर्श और पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट।

स्पर्श उपाध्याय: यह विकास का मॉडल आखिर है क्या जिसकी देश में 2014 से लेकर हर चुनाव में खूब चर्चा की जा रही है? जहाँ गुजरात को एक आदर्श मॉडल बनाकर देश में दिखाया जा रहा है? विचार पर चर्चा इतनी क्यों बढ़ गयी है?

संजीव भट्ट: विकास का मॉडल या गुजरात मॉडल कोई मॉडल है ही नहीं। और जो कुछ भी उस मॉडल के नाम पर दिखाया जा रहा है वह गुजरात की जनता की मेहतन, लगन और अथक परिश्रम का परिणाम है, इसमें प्रदेश में सत्ता पर बैठ चुकी सरकारों का कोई योगदान नहीं है। यह मॉडल गुजरात की अस्मिता है और लोगों के द्वारा खड़ा किया गया है, न की सरकारों द्वारा और यह कहना कि किसी ख़ास सरकार ने उस मॉडल को बनाया या खड़ा किया है तो यह ग़लत होगा। आप देखें की गुजरात की जनता में 'गिरकर तुरंत खाधोजाने" की अपार क्षमता है, जिसमें किसी भी गुजराती भाई को अगर व्यापार में घाटा होता है तो वह तुरंत बाउंस बैक करके अपने आप को संभल लेता है। आप देखेंगे कि किस तरह यहाँ इतिहास में भी व्यापार और उद्यमिता (entrepreneurship) का चलन रहा है जिसकी खास वजह गुजरात का समुद्र के निकट होना रहा है। इस्लाम का आगमन, विभिन्न देशों के व्यापारियों का आगमन और अंग्रेज़ों का आगमन, भारत में सर्वप्रथम गुजरात में ही हुआ था और यहाँ व्यापार का इतिहास रहा है। तो जो भी सरकारें यहाँ की व्यापारी अस्मिता को खुद का परिश्रम बता रही हैं वह जनता को गुमराह कर रही हैं और गुजराती अस्मिता पर चोट कर रही हैं।

स्पर्श उपाध्याय: प्रदेश में जिस तरह राजनीतिक दल 'विकास पागल हो गया है' के नारे इस्तेमाल कर रहे हैं, उसका क्या तात्पर्य है? कांग्रेस की विपक्ष के रूप में गुजरात में क्या भूमिका रही है?

संजीव भट्ट: विकास कोई पागल नहीं हुआ है और कांग्रेस के पास कोई खास नारा नहीं था तो उन्होंने इसे अपना लिया है। जिसके कोई ख़ास मायने नहीं होने वाले हैं। कांग्रेस के गुजरात के नेतागणों में एक स्वस्थ विरोध करने की क्षमता नहीं है। वह सरकार के साथ वाद-विवाद नहीं करते और एक बेहद कमजोर एवं सुस्त विपक्ष बने रहे हैं। राहुल गाँधी के इस बार के चुनाव में ऊर्जा भरने से कुछ बदलाव आ रहा है और मुझे उम्मीद है की कांग्रेस अपनी गलतियों को सुधारेगी।

स्पर्श उपाध्याय: गुजरात में चुनावी सरगरमियाँ तेज़ हैं, आपके हिसाब से इस चुनाव में मुद्दे क्या हैं?

संजीव भट्ट: मुद्दों की अगर बात करूँ तो रोज़गार, नोटबंदी, जीएसटी, खेडूत और पाटीदार आंदोलन बड़े मुद्दे हैं। हालाँकि और भी कई मुद्दे हैं जिन पर इस चुनाव में फोकस रहेगा लेकिन मुख्य तौर पर यही वो मुद्दें हैं जो चुनाव को प्रभावित करेंगे।

स्पर्श उपाध्याय: खेडूतों की समस्या क्या है प्रदेश में?

संजीव भट्ट: सबसे बड़ी समस्या न्यूनतम समर्थन मूल्य 'एमएसपी' (Minimum Support Price) की है। गुजरात का किसान परेशान है, और बहुत रोष में है कि उसकी फसलों की सही कीमत उसे नहीं मिल पा रही है। गुजरात में कई खेतों तक पानी न पहुँच पाना भी एक बड़ी समस्या है और किसानों की हालत पर भावी सरकारों को सोचना चाहिए।

स्पर्श उपाध्याय: प्रदेश के युवा को किस तरह देखते हैं आप? उनके क्या मुद्दे या समस्याएं हैं?

संजीव भट्ट: युवाओं की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी है, गुजरात में हम देखते हैं की कई नामचीन प्राइवेट कॉलेज खुल जाने के बावजूद उन्हें उचित कौशल और उसके उपरांत उचित रोजगार नहीं मुहैय्या हो पा रहा है। प्राइवेट कॉलेज जिस प्रकार से संख्या में बढ़े हैं, उस प्रकार से उनमे गुणवत्ता नहीं है। आज के समय में कॉलेज युवा को Unemployed ही नहीं Unemployable भी बना रहे हैं. यह समस्या गुजरात प्रदेश में ही नहीं है, पूरे देश की हालत भी कुछ वैसी ही होती जा रही है। युवाओं को अगर देखें तो उनमें भी उत्सुकता की कमी आयी है, वह अपना इतिहास नहीं पढ़ रहा है न ही उसके मूल्यों को समझ रहा है, ऐसी स्थिति हम सभी के लिए चिंताजनक है, मुझे लगता है कि केंद्र एवं विभिन्न प्रदेश की सरकारों को युवा-कौशल एवं रोजगार के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

स्पर्श उपाध्याय: गुजरात में पाटीदारों का एक नए तरह से शक्ति प्रदर्शन करके उभरना काफी रोचक है, कैसे देखते हैं आप उनके इस तरह के उभार को? और कांग्रेस के साथ उनके समर्थन के क्या हैं मायने?

संजीव भट्ट: जिस प्रकार से पाटीदारों और खासकर के उनके युवा नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेस की जरुरत है, उसी प्रकार कांग्रेस को हार्दिक पटेल की जरुरत है। पाटीदारों के नजरिये से देखा जाये, तो वह मौजूदा सरकार से रुष्ट हैं, मैं पूरे पाटीदार समाज की बात नहीं कर रहा परन्तु एक तबका है जो मौजूदा सरकार से नाखुश है. अब चूँकि गुजरात में एकमात्र विपक्षी पार्टी कांग्रेस ही है तो पाटीदारों का उनकी तरफ झुकाव स्वाभाविक है। पाटीदारों को देखा जाए तो वह एकमुश्त वोट देते हैं और उनके वोट के भाजपा के लिए बहुत मायने रहे हैं और इस बार के चुनाव में पाटी दार अपनी एक अहम भूमिका न केवल सिर्फ निभाना चाहते हैं बल्कि साफ़ तौर पर दिखाना भी चाहते हैं।

स्पर्श उपाध्याय: भाजपा का यह आरोप रहा है कि कांग्रेस के पास गुजरात में खुद का कोई बड़ा नेता नहीं है इसलिए वो दूसरे दलों/आंदोलनों के नेताओं को 'आउटसोर्स' कर रही है। फिर वो भले ही हार्दिक पटेल हों, अल्पेश ठाकोर हों या जिग्नेश मेवानी हों। क्या कहना है इस पर आपका?

संजीव भट्ट: मैं यह नहीं मानता कि इसे 'आउटसोर्सिंग' का नाम दिया जाना चाहिए। आप देखिये किसी भी बड़ी मुहिम या आंदोलन की शुरुआत विभिन्न विचारधारा रखने वालों के एक साथ आने से होती है, इतिहास इसका गवाह रहा है। जहाँ तक हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी का प्रश्न है ये सभी युवा मौजूदा सरकार की नीतियों के विरोध में खड़े हुए हैं और यह स्वाभाविक है कि एक मजबूत विपक्ष बनाने के लिए और अपनी आवाज़ उठाने के लिए उन्हें कांग्रेस के साथ आना था। कांग्रेस और तीनों युवाओं के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वो साथ आकर एक जनतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई लड़ सकते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं। हमें यह समझना होगा कि कांग्रेस और तीन युवा साथ आये हैं पर विचारधारा का विलय पूर्ण रूप से नहीं हुआ है, सब अपने अपने तरीके से विरोधी स्वर जोड़ रहे हैं। हालाँकि अप्लेश ठाकोर के विषय में यह नहीं कहा जा सकता जिन्होंने कांग्रेस पार्टी अभी हाल ही में ज्वाइन की है।

स्पर्श उपाध्याय: मौजूदा सरकार भाजपा और मौजूदा विपक्ष कांग्रेस के लिए गुजरात चुनाव के क्या मायने हैं?

संजीव भट्ट: देखिये, भाजपा के लिए गुजरात की सत्ता दुबारा हासिल हो एक बेहद जरूरी मिशन है। क्योंकि अगर उनके हाथ से गुजरात निकलता है तो 2019 के जनरल इलेक्शन पर इसका गलत प्रभाव पड़ेगा। उनकी रणनीति पर सवालिया निशान लग जायेंगे और प्रधानमंत्री के स्वयं के प्रदेश का हार जाना उनकी उपयोगिता पर भी सवाल उठाएगा। जिस गुजरात मॉडल की बात भाजपा करती है उसे भी शक की निगाहों से देखे जाने का डर होगा।

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है तो उनके पास खोने को कुछ खास नहीं है। हालाँकि जिस तरह उनके भावी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने गुजरात चुनाव के लिए तमाम प्रयत्न किये हैं उसकी सार्थकता उनके लिए जरूर दांव पर है। 

स्पर्श उपाध्याय: आप गुजरात की जनता को आगामी चुनाव से पहले क्या संदेश देना चाहेंगे?

संजीव भट्ट: देखिये जनता को मैं बस यही संदेश देना चाहूंगा कि वो Firm Decision लें, किसी के बहकावे में आकर वोट न दे और अपने नेताओं से सवाल करना न छोड़े। यह चुनाव कई मायने में भारत का भविष्य तय करेगा और हम सभी को यह समझना होगा की हमारे द्वारा की गयी गलतियों को सुधारना हमारी ही जिम्मेदारी है, जिसका बहुत ईमानदारी से हमें निर्वहन करना होगा।

स्पर्श उपाध्याय: अंत में एक आख्रिरी सवाल, आपका विपक्ष को क्या सुझाव है?

संजीव भट्ट: देखिये हाल के समय में सरकार के सामने एक मजबूत विपक्ष बनना बहुत जरूरी है। और एक मजबूत विपक्ष विभिन्न दलों/विचरधाराओं के साथ आने से तैयार हो सकता है। उन्हें किसी भी तरह से बिखरना नहीं चाहिए और जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भली भांति समझना चाहिए।

स्पर्श उपाध्याय: जी, अपना कीमती वक़्त देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

संजीव भट्ट: जी शुक्रिया।






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