संविधान रक्षकों को आखिर क्यों लगानी पड़ी जनता से गुहार?

ख़बरों के बीच , , शनिवार , 13-01-2018


sc-deepak-chalmeshwar-press-conference-corruption

महेंद्र मिश्र

ऐसा आपातकाल के दौरान भी नहीं हुआ। और न ही तब हुआ था जब तीन जजों की वरीयता को दरकिनार कर एएन रे को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। बार एसोसिएशन के स्तर पर फैसले का विरोध जरूर हुआ। तीनों जजों जेएम शेलात, के एस हेगड़े और एएन ग्रोवर ने विरोध में इस्तीफा भी दिया। लेकिन वो प्रेस के सामने नहीं आए। आज देश की सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठतम जजों को अगर प्रेस के जरिये जनता के सामने आना पड़ा है। तो ये घटना अपने आप में अभूतपूर्व है। और प्रेस के सामने उन्होंने जो बातें कही वो उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने खुले तौर पर कहा कि देश के लोकतंत्र को खतरा है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि आज नहीं बोले तो 20 साल बाद वो अपनी आत्मा को जवाब नहीं दे पाएंगे।

ये वो लोग हैं जिन पर देश के संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी है। अगर वही असहाय महसूस कर रहे हैं तो हालात की गंभीरता को समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे में अगर देश की सर्वोच्च अदालत लाचार है तो फिर संविधान, संसद और लोकतंत्र के भविष्य के संकट का अंदाजा लगाना भी कठिन नहीं है। न इन चारों जजों को प्रेस के सामने आने का शौक था। और न ही उनकी किसी से कोई व्यक्तिगत अदावत थी। देश की सर्वोच्च अदालत में पिछले कुछ महीनों से जो कुछ हो रहा है उसकी बातें भी प्रेस के जरिये जनता तक छन-छन कर आ रही हैं। पानी जब सिर के ऊपर चढ़ गया या फिर चीजें बर्दाश्त के बाहर हो गयी होंगी तभी इन लोगों ने मामले को सार्वजनिक करने का फैसला किया होगा। जैसा कि उन्होंने बताया भी प्रेस कांफ्रेंस से पहले शुक्रवार को आखिरी समय में उन लोगों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा से मिलकर मामले को न्यायपालिका के दायरे में हल करने की कोशिश की। लेकिन वो नाकाम रहे। 

आखिर क्या है असली मामला? उन्होंने कुछ बातें खुलकर कहीं और कुछ इशारों में समझाने की कोशिश की। लेकिन इन सबके केंद्र में केवल एक शख्स था वो हैं चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत का प्रशासन पटरी से उतर गया है। उन्होंने सीधे कहा कि प्रशासन के नाम पर चीफ जस्टिस अपनी मनमानी कर रहे हैं। इसको सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कुछ और साफ कर दिया। उनका कहना था कि जस्टिस दीपक मिश्रा केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं। सारे फैसले केंद्र के मुताबिक हो रहे हैं और इसके लिए चुनिंदा जजों के बीच ही केसों को आवंटित किया जा रहा है। इस मामले में उन्होंने एक जज अरुण मिश्रा का नाम तक लिया है। इसी बात को एक दूसरे वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने शुक्रवार को इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में कही है। उन्होंने कहा कि मुकदमों को चुनिंदा जजों को आवंटित करके उनसे मनमुताबिक फैसले करवाये जा रहे हैं।

देश की वो संस्था जिसके हाथ में देश के संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी है। जिसे धरती पर किसी की जिंदगी और मौत को तय करने का अधिकार मिला है। अगर वहां भ्रष्टाचार, पक्षपात और अन्याय का बोलबाला हो जाए और वो इस कदर हो कि दूसरे सहयोगियों का साथ काम करना मुश्किल हो जाए। तो फिर हालात की गंभीरता को पूछने और बताने की जरूरत नहीं है। 

दरअसल मौजूदा चीफ जस्टिस सवालों के घेरे में हैं। उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। उसमें सबसे ताजा मेडिकल कालेज के घोटाले से जुड़ा मामला है। जिसमें ओडीसा हाईकोर्ट के पूर्व जज कुदुसी के अलावा उनका नाम आ रहा है। और जब उस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर दूसरे वरिष्ठतम जज चलमेश्वर ने सुनवाई की कोशिश की तब केस को आवंटित करने के अधिकार के नाम पर चीफ जस्टिस ने उसे अपनी बेंच में ले लिया। तभी ये सवाल उठा था कि भला कोई जज जिस मामले से जुड़ा हुआ हो उस पर कैसे फैसला कर सकता है? इसी तरह से जस्टिस बीएच लोया की मौत का मामला भी जब सुप्रीम कोर्ट में गया तो चीफ जस्टिस ने उसे भी अपने हाथ में ले लिया। ठीक इसी तर्ज पर कई दूसरे मामलों का भी हश्र हुआ जिनका जजों ने जस्टिस दीपक मिश्रा को लिखे पत्र में जिक्र किया है।

जस्टिस मिश्रा को लेकर ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कालिखो पुल ने अपने सुसाइड नोट में भी इनका जिक्र किया है। न्यायिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में उन्होंने मरने से पहले विस्तार से अपने पत्र में लिखा है। और तमाम जजों समेत नेताओं के जरिये कैसे उनके पक्ष में फैसला देने का उन्हें भरोसा दिलाया गया और उसके एवज में उनसे भारी रकम की मांग की गयी। ये सब उस पत्र में है। उसी में एक जगह उन्होंने दीपक मिश्रा के भाई का जिक्र किया है। सुसाइड नोट के पेज नंबर 39 पर उन्होंने लिखा है कि “वही आदित्य मिश्रा, जस्टिस दीपक मिश्रा के भाई ने मुझसे 37 करोड़ रुपये की मांग की थी।”

लेकिन ‘नमो अंधकारम’ के पूजक मीडिया ने शायद प्रकाश न देखने की कसम खा ली है। उसे देश के लोकतंत्र और उसके भविष्य के सामने आने वाले संकट की जगह सत्ता में बैठे अपने आकाओं को बचाना सबसे ज्यादा जरूरी काम लग रहा है। लिहाजा उसने इस पूरे मामले को भी बेहद घृणास्पद तरीके से एक नया मोड़ देने की कोशिश शुरू कर दी है। 

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ये समझना बहुत जरूरी है। दरअसल सरकार न्यायपालिका को अपने कब्जे में लेना चाहती थी। और उसके लिए उसने न्यायिक जवाबेदही विधेयक भी संसद से पारित कराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने उसे असंवैधानिक करार देकर खारिज कर दिया। और उसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खत्म करने की कोशिश का हिस्सा बताया था। जब सरकार न्यायपालिका को कब्जे में लेने के अपने उस कानूनी पैंतरे में फेल हो गयी तो अब उसने पिछले दरवाजे से इसकी कोशिश शुरू कर दी।

चीफ जस्टिस के खिलाफ विभिन्न मामलों में लगे आरोप उसके लिए सोने पर सुहागा साबित हो रहे हैं। और चीफ जस्टिस ने भी मजबूरी वश कहें या फिर भविष्य के किसी और दूसरे लाभ में सरकार के सामने समर्पण कर दिया है। और उसी समर्पण का नतीजा है कि चारों जजों को शुक्रवार को प्रेस के सामने आना पड़ा।   






Leave your comment











Farhat Rizvi :: - 01-15-2018
Good analytical article but commen man dose not know these facts they must be knowing

S D Kureel :: - 01-13-2018
Undoubtedly the fair and unbiased system of judicial functioning is a basis on which we have strong faith and belief to adhere to its verdicts and judgements in ones favour or against. Any doubt in its functional integrity affecting fundamental justice will definitely have highly detrimental impact on our diversified and vulnerable structure of society. National integration, solidarity and social harmony all would be reverse gear. It's essential to thoroughly examine the entire system, its modus operandi and weed out the destructive elements from the system for ever. Govt. must come out with a way to maintain total neutrality in the intrinsic functioning of our judicial system so that people's faith remains intact for ever.

I husain :: - 01-13-2018

I husain :: - 01-13-2018
शेर के आने पर अगर बंदर आँख बंद कर ले तो खतरा टल नही जाता है बलकी खतरा बदसतूर बाकी रहता है जो लोग भी सुपरीम कोरट के अंदर बैठ कर किसी की कटपुतली बन कर काम करते है और इंसाफ का गला घोटते है एैसे लोगो अंत बुरा होता है...

Gupt kumar :: - 01-13-2018
: कोई बात नहीं...चिंता नहीं करो...आखिर कब तक छुपाँएगे अपने काले चेहरे...जनता से...? लगता है ये सरकारी नेता जनता की...असली पावर को भूल गए हैं...!

Sanjay :: - 01-13-2018
It is the last thing all these 4 so called senior judges could have done. If CJI is first among the equal then how can they object to referring cases to remaining 20 Supreme Court judges. Is it not a contempt of Supreme Court? By doubting integrity of remaining 20 judges these 4 judges have made grave offence.