अन्याय की गिरफ्त में है न्यायापलिका!

विश्लेषण , , शनिवार , 13-01-2018


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डॉ. राजू पांडेय

सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों की पत्रकार वार्ता को क्या न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण की खुली स्वीकृति के रूप में देखा जा सकता है? चीफ जस्टिस पर अपने पसंदीदा न्यायाधीशों की पीठ को संवेदनशील मामले सौंपने का आरोप लगा है जिससे कि वे अपनी इच्छानुसार फैसले इनके माध्यम से करा सकें। यदि यह आरोप सही है तो फिर यह सवाल उठता है कि चीफ जस्टिस की न्यायाधीशों और निर्णयों के बारे में पसंद-नापसंद का निर्धारण कौन करता है? यदि उन पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए गए हैं तो निश्चित ही उन पर सत्ताधारी दल के राजनीतिज्ञों के लाभ के लिए कार्य करने का आरोप तो अप्रत्यक्ष रूप से लगाया जा रहा है। ऐसे चार वरिष्ठ और स्वच्छ छवि के ईमानदार न्यायाधीश निरीह और निर्विकल्प होकर मीडिया के माध्यम से जनता तक अपना आर्त स्वर पहुंचाने लिए यदि विवश हुए हैं तो इससे न्यायपालिका में व्याप्त राजनीति के आतंक की भयावहता की कल्पना की जा सकती है। 

न्यायपालिका अब तक एक लगभग बन्द तंत्र की तरह कार्य करती थी जिसे इन न्यायाधीशों की पत्रकारवार्ता ने मीडिया और जनता के हस्तक्षेप के लिए खोल दिया है। न्यायाधीशों के इस कदम पर पूर्व जजों, वरिष्ठ वकीलों और कानूनविदों की जो राय आ रही है उसमें मुख्य न्यायाधीश के राजनीतिक दबाव में कार्य करने के प्रति विरोध कम, इन चार जजों को संतुष्ट न कर पाने और इन्हें मीडिया तक पहुंचने देने की उनकी गलती पर आक्रोश अधिक है। जब यह कहा जा रहा है कि यह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है और इसे आपस में निपटा लेना चाहिए था तो इसमें न्यायपालिका की आंतरिक स्वायत्तता और प्रशासनिक सक्षमता के प्रति विश्वास कम अपितु न्यायपालिका में व्याप्त राजनीति और भ्रष्टाचार के सार्वजनिक विमर्श में आने से होने वाली किरकिरी को रोकने आग्रह अधिक है।

अब जब जनता और मीडिया का प्रवेश इस विमर्श में हो गया है तो चन्द घण्टों में ही इसका असर दिखने लगा है। जनता पूरी अराजकता और अपरिपक्वता (कम से कम पवित्रता और सर्वोच्चता का लंबा आनंद उठा चुके न्यायाधीशों को तो बिल्कुल ऐसा ही लगता होगा) के साथ अपनी अनगढ़ आलोचना कर रही है और मीडिया अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं एवं व्यावसायिक हितों को साधते हुए अपनी व्यवसाय सुलभ निर्ममता के साथ तीखी टिप्पणियां कर रहा है। 

चार जजों की बगावत जैसी सुर्खियां आम हो रही हैं। जब मुख्य न्यायाधीश अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे तो मीडिया इस विवाद का भरपूर आनंद लेगा। मामला राजनीतिक हो और राजनीतिक टीका टिप्पणी न हो यह भी संभव नहीं है। लेकिन आज की राजनीति धार्मिक और जातिगत ध्रुवीकरण तथा चरित्र हनन का आश्रय लेती है। कहा जा रहा है कि बागी न्यायाधीश ईसाई हैं, कांग्रेसी मुख्यमंत्री के बेटे हैं, कांग्रेस के इशारे पर आधार का विरोध करने वाले हैं, आदि आदि। जाति और धर्म के आधार पर अधिकारियों और न्यायाधीशों की लॉबीज होने की चर्चा कभी धीमे और कभी उच्च स्वर में होती रही है लेकिन जाति और धर्म को ही इनकी बुनियादी पहचान बना देने की कोशिश विभाजनकारी और विनाशकारी दोनों है।

इन न्यायाधीशों की चारित्रिक विशेषताएँ भी चर्चा में हैं। यह जज कंज़र्वेटिव हैं, यह बोल्ड हैं आदि। यह चर्चाएं भी अब जोर पकड़ेंगी और यह अस्वाभाविक भी नहीं है। दिक्कत तो तब होगी जब अपनी छवि को बरकरार रखने या तोड़ने के लिए न्यायाधीश फैसले देने लगेंगे तब नुकसान न्याय की आस लगाने वाले का ही होगा। न्यायालय के फैसलों का मीडिया ट्रायल भी अब बढ़ सकता है और आरोपियों के मीडिया ट्रायल के अनुसार न्यायालय के फैसले देने की अपेक्षा भी बढ़ सकती है। ऐसा नहीं है कि यह चारों न्यायाधीश क्रांतिकारी हैं, इन्होंने भ्रष्ट निचली अदालतों की बर्बरता को देखा, भोगा और सहन किया है भले ही ये उसके हिस्सेदार नहीं रहे हैं। राजनीतिक दबावों को झेलते और राजनीतिक दबावों के आगे समर्पण करते सहकर्मियों के साथ लंबी अवधि बिताते हुए ये सेवानिवृत्ति के निकट जा पहुंचे हैं।

संभवतः जिस बात ने इन्हें पीड़ित किया है वह नंगेपन और निर्लज्जता का अतिरेक है जो न्यायपालिका में व्याप्त हो गया है। पहले किसी भ्रष्ट कारोबारी या अपराधी राजनेता की सहायता करते हुए जिस भय, ग्लानि या संकोच का अनुभव न्यायाधीश करते थे और जिसके कारण ऐसे प्रकरणों की संख्या नगण्य थी वह समाप्तप्राय हो गया है।। जब सर्वोच्च स्तर पर अनैतिक आचरण के लिए अपराधबोध कम होता दिखे बल्कि सर्वोच्च पदों पर पदस्थ लोग नेता-अपराधी-अधिकारी गठजोड़ का हिस्सा बनने में गौरव का अनुभव करने लगें तो कंज़र्वेटिव जजों की चिंता स्वाभाविक है और यहाँ उनका कंज़र्वेटिव होना एक ऐसा गुण बन जाता है जो पेशे की बुनियाद के प्रति उनकी आस्था को व्यक्त करता है। इन न्यायाधीशों की पत्रकारवार्ता में उनका संकोच और पीड़ा स्पष्ट देखे जा सकते थे। उनका वक्तव्य अस्पष्ट होने की सीमा तक संयत था और आम जनता से इस संबंध में निर्णय करने की उनकी अपील में भी मुख्य न्यायाधीश पर दबाव बनाकर उनकी कार्यप्रणाली में सुधार लाने की आकांक्षा स्पष्ट दिखती थी।

भारतीय समाज की नैतिकता का दोगलापन इस बात से उजागर होता है कि हम भ्रष्टाचार और यौन शोषण जैसे अपराध करने में तो नहीं झिझकते किंतु जब कोई साहसी इन्हें सार्वजनिक विमर्श में लाता है तो हम नैतिकता के पैरोकार बन जाते हैं और उसे मर्यादाओं की याद दिलाने लगते हैं, उसकी अभिव्यक्ति के तरीके पर सवाल उठाने लगते हैं, यही इन जजों के साथ भी हो रहा है। इन्होंने घाव में चीरा लगाया है तो मवाद की बदबू तो फैलेगी ही किन्तु इससे घाव के ठीक होने की संभावना भी बढ़ेगी।

इस अकल्पनीय स्थिति के पारंपरिक समाधान भी ढूंढे जा रहे हैं और असाधारण स्थिति को साधारण बनाकर सुलझाने की कोशिश हो रही है। कॉलेजियम सिस्टम में सुधार या उसके विकल्प की तलाश का सुझाव भी एक ऐसा ही प्रयास है। भ्रष्टाचार ने देश की हर संस्था को खोखला किया है और अब हमें तय करना है कि हमें संस्थाओं में कॉस्मेटिक परिवर्तन लाने हैं या भ्रष्टाचार से आर-पार की लड़ाई लड़नी है।

लोकतंत्र खतरे में है- न्यायाधीशों की यह टिप्पणी लोकतंत्र के शोधन और सशक्तिकरण का अवसर बन जाए यह सुनिश्चित करना हमारा उत्तरदायित्व है।

(लेखक विभिन्न विषयों पर नियमित तौर पर लिखते रहते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)










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?????? ????? :: - 01-14-2018
बहुत ही सटीक लेख

?????? ????? :: - 01-14-2018