जब प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से कहा- आप इस मामले में शामिल हैं लिहाजा इसकी सुनवाई नहीं कर सकते

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, शुक्रवार , 11-11-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में अभूतपूर्व किस्म का हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। जब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक मामले में सीधे शामिल होने का आरोप लगा दिया और उनसे उस मामले की सुनवाई से अलग होने की अपील कर डाली। बेंच के एक सदस्य और बार एसोसिएशन ने इसे कोर्ट की अवमानना करार दिया और उन लोगों ने भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग शुरू कर दी। जिसको मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की पीठ ने ये कहते हुए खारिज कर दिया कि सहनशीलता ही कोर्ट की ताकत है।

ये सब कुछ काली सूची में दर्ज लखनऊ स्थित प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा संचालित एक मेडिकल कालेज के मामले की सुनवाई के दौरान हुआ। जिसमें कालेज को काली सूची से निकालने के एवज में एमसीआई से लेकर कोर्ट के कुछ जजों तक को घूस देने का आरोप है। इस मामले में दर्ज एफआईआर में हाईकोर्ट के एक पूर्व जज आईएम कुदिसी का भी नाम शामिल है। जिनको गिरफ्तार किया जा चुका है।

इसके पहले मुख्यन्यायाधीश के नेतृत्व वाली पांच जजों की पीठ ने दो जजों की बेंच के उस फैसले को रद्द कर दिया था जिसमें उसने मेडिकल कालेज के मामले की सुनवाई संविधान पीठ के जरिये करने का आदेश दिया था। मुख्य न्यायाधीश वाली पांच सदस्यीय बेंच ने मामले पर व्यवस्था देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच काम का बंटवारा और बेंचों को गठित करने का अधिकार केवल और केवल मुख्य न्यायाधीश के पास है। और इसके साथ ही एकमत से गुरुवार को जस्टिस जे. चलमेश्वर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही संविधान पीठ ने कहा कि कोई भी आदेश जो मान्य नियमों के खिलाफ हो उसे लागू नहीं किया जा सकता है।

इसके साथ ही बेंच जिसमें जस्टिस आर के अग्रवाल, अरुण मिश्रा, अमितव राय और एएम खानविल्कर दूसरे सदस्य हैं, ने 1997 के एक फैसले का उदाहरण दिया जिसमें उसने कहा था कि हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश ही रोस्टर का मालिक है। बेंच का कहना था कि वही सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट के संचालन में भी लागू होता है। 

दो जजों की बेंच के फैसले को अपवाद मानते हुए संविधान पीठ ने अपने आदेश में कहा कि एक बार अगर ये कह दिया गया है कि चीफ जस्टिस रोस्टर का मालिक है उसके बाद उसे अकेले ही बेंचों के गठन का विशेषाधिकार हासिल हो जाता है। यहां ये बताने की जरूरत नहीं है कि वो दो जजों की बेंच हो या फिर तीन जजों की बेंच किसी मामले की सुनवाई कौन करेगा इसको तय करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इसको और अगर सरल तरीके से कहा जाए तो उसको मुख्य न्यायाधीश को निर्देशित करने का अधिकार नहीं है। जिसमें वो बताए कि किसे बेंच में रखा जाए या फिर किसको लेकर बेंच गठित की जाए। बेंच एक बार फिर दोहराती है कि इस तरह के आदेश पारित नहीं किए जा सकते हैं। ये कानून की मान्यताओं के खिलाफ है।

गौरतलब है कि गुरुवार को एक एनजीओ केंपेन फार ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफर्म्स (सीजेएआर) ने एक याचिका दायर कर मेडिकल कालेज के भ्रष्टाचार के मामले की एसआईटी से जांच कराने की मांग की थी जिसमें ओडीसा हाईकोर्ट के पूर्व जज आईएम कुदिसी के शामिल होने का आरोप है। कुदिसी को पांच अन्य लोगों के साथ सीबीआई ने 21 सितंबर को गिरफ्तार किया था। जिसमें बताया जाता है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से लेकर दूसरी कोर्टों को पक्ष में करने और उनसे मनमुताबिक फैसला लेने की कोशिश की थी।

इसके पहले कल ही जस्टिस ए के सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने लंच से पहले मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि मामले में उचित आदेश के लिए इसे मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश किया जाना चाहिए। इसके साथ ही बेंच ने बार एसोसिएशन को भी जिरह में शामिल होने की छूट दे दी थी।

इस आदेश पर काम करते हुए चीफ जस्टिस ने संक्षिप्त नोटिस पर पांच सदस्यी बेंच गठित कर दी और मामले की उसी दिन सुनवाई शुरू कर दी। शुरू में सीजेआई की कोर्ट के सामने नोटिस बोर्ड पर सात सदस्यीय बेंच के गठन की बात लिखी गयी थी जिसे संशोधित नोटिस में पांच सदस्यीय कर दिया गया।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान माहौल उस समय गरम हो गया जब सीजेएआर का पक्ष रखते हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चीफ जस्टिस को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए क्योंकि इसके पहले इसी मेडिकल कालेज के मामले में वो आदेश दे चुके हैं। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने उनकी मांग को खारिज कर दिया। इससे नाराज होकर भूषण बीच में ही कोर्ट का बहिष्कार कर ये कहते हुए चले गए कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है।

शुरुआत में एडिशनल सॉलीसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने लखनऊ कालेज को संचालित करने वाले प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मामले में कोर्ट के आदेश को पढ़ा। इस पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस मिश्रा ने कहा कि कोर्ट ने कालेज को कोई राहत नहीं दी थी और उसने मामले को मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया पर छोड़ दिया था।

इस दौरान चीफ जस्टिस बेहद परेशान दिख रहे थे जो उनके चेहरे पर बिल्कुल साफ देखा जा सकता था। चीफ जस्टिस ने प्रशांत भूषण को उस समय रोक दिया जब वो हस्तक्षेप कर बोलने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि “नहीं प्रशांत भूषण, आप हमारे आदेश पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं।”

जैसे ही सुनवाई आगे बढ़ी जस्टिस अरुण मिश्रा ने पूछा कि अगर कोई कहता है कि चीफ जस्टिस को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए तो क्या ये अवमानना के दायरे में नहीं आता है?

इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि “मैं अभी भी चीफ जस्टिस से मांग कर रहा हूं कि उन्हें मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए। श्रीमान आपके खिलाफ एफआईआर दर्ज है।” इस पर बेंच ने उनसे एफआईआर पढ़ने को कहा। फिर भूषण ने वैसा ही किया। लेकिन अपने आरोपों की पुष्टि के लिए उसमें चीफ जस्टिस का नाम नहीं दिखा सके।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि “हमारे खिलाफ कहां है एफआईआर? ये बेवकूफी है। मेरे नाम से जुड़ा एफआईआर में एक शब्द भी नहीं है। पहले आदेश को पढ़िए। मुझे बेहद दुख है। आप पर कोर्ट की अवमानना का मामला बनता है।”

फिर भूषण ने बेंच को चुनौती के लहजे में कहा कि “अभी का अभी अवमानना की नोटिस जारी करिये।” लेकिन चीफ जस्टिस ने कहा कि “आप अवमानना के लायक ही नहीं हैं।” इसके बाद भूषण जारी रहे, “मैं चीफ जस्टिस से निवेदन कर रहा हूं कि वो मामले की सुनवाई न करें। ये कोर्ट की प्रतिष्ठा के खिलाफ होगा।”

इस पर एएसजी नरसिम्हा ने कहा कि ये कोई पक्ष नहीं तय कर सकता है कि किसे मामले से अलग होना चाहिए और किसे नहीं। बेंच का गठन चीफ जस्टिस के कार्यकारी अधिकार के तहत आता है और एक न्यायिक आदेश उसे प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर ऐसा होता रहा तो संस्थाएं काम नहीं कर पाएंगी। उन्होंने कहा कि “ मैं इस तर्क को नहीं समझ पा रहा हूं कि चीफ जस्टिस को रोस्टर का मालिक होने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”

इसके बाद चीफ जस्टिस ने जस्टिस सीकरी के आदेश का हवाला दिया जिसको उन्होंने उचित बताया। साथ ही कहा कि “मैंने गुरुवार का एक आदेश देखा है जो शायद किसी दूसरे मामले में हो। ये संस्था कैसे काम कर पाएगी।”

उसके बाद भूषण ने कोर्ट को बताया कि गुरुवार को सुनवाई के दिन जस्टिस चेलमेश्वर और जस्टिस नजीर के सामने एक नोट पेश किया गया जिसके बारे में बताया जा रहा है कि वो चीफ जस्टिस की आफिस की तरफ से था। जो कार्यवाही में दर्ज है।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि ये उनका नोट था और जस्टिस चेलमेश्वर की बेंच में रजिस्ट्री के एक अफसर के जरिये भेजा गया था।

इसके बाद बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आरएस सूरी और सचिव गौरव भाटिया जिरह में शामिल हो गए उन्होंने कहा कि भूषण का पूरा कार्य और व्यवहार अवमानना के दायरे में आता है। वो पूरी संस्था को अपमानित कर रहे हैं किसी एक व्यक्ति को नहीं। लेकिन बेंच ने अवमानना की कार्रवाई शुरू करने से इंकार कर दिया। जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि “सहनशीलता ही हमारी शक्ति है।” 

जस्टिस मिश्रा ने भूषण के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि एफआईआर सुप्रीम कोर्ट के एक जज की तरफ इशारा करता है। उन्होंने कहा कि ये असंभव है क्योंकि कानून ये कहता है कि इस तरह के किसी मामले को दर्ज करने के लिए चीफ जस्टिस की इजाजत लेनी पड़ेगी। इस पर उन्होंने सवालिया अंदाज में पूछा कि क्या हम अपनी न्यायपालिका को एक सब इंस्पेक्टर के रहमोकरम पर छोड़ सकते हैं। इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है और न ही ऐसा इजाजत देने योग्य है। उन्होंने कहा कि भूषण के आरोप एफआईआर में परिलक्षित नहीं होते हैं और वो केवल अफवाह थे।

शुक्रवार को संविधान पीठ ने भूषण से पूछा कि गुरुवार को क्यों दूसरी याचिका दर्ज की गयी जबकि सीजेएआर के पक्ष को जस्टिस चेलमेश्वर की बेंच ने बुधवार को ही सुन लिया था। और शुक्रवार को उस पर सुनवाई होनी थी।

भूषण उसका उत्तर देने का प्रयास कर रहे थे लेकिन लगातार बार एसोसिएशन के दूसरे सदस्यों द्वारा उसमें बाधा पहुंचाया जा रहा था। तकरीबन 40 मिनट तक उसके सदस्य बोलते रहे। इस पर प्रशांत भूषण ने कोर्ट से पूछा कि क्या उन्हें नहीं सुना जाएगा। इस बीच दूसरे वकीलों का दखल जारी रहा जिससे नाराज होकर भूषण कोर्ट रूम से बाहर ये कहते हुए चले गए कि कोर्ट अगर उन्हें नहीं सुनना चाहता है फिर तो वो जैसा चाहे आदेश पारित कर दे।

बाद में एक ट्वीट में भूषण ने कहा कि “इस मामले को पांच सदस्यीय बेंच को देने के कल के आदेश की अवहेलना कर चीफ जस्टिस ने अपनी अध्यक्षता में अपने चुने सदस्यों की बेंच गठित कर ली।”






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sanjeev srivastava :: - 11-11-2017
Very confusing, What Mr. Prashant Bhushan is trying to prove may be a point of consideration; but he has to have a solid proof because the chief Justice of India is also right when he says that his name is not mentioned in the FIR which Mr. Prashant Bhushan has provided as his proof.