जजों ने सीजेआई को लिखे पत्र में कहा-चीफ जस्टिस केवल समान लोगों में पहला है; न इससे ज्यादा, न इससे कम

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, शुक्रवार , 12-01-2018


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जनचौक डेस्क

(सु्प्रीम कोर्ट के चारों वरिष्ठ जजों- जस्टिस चलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर औऱ कुरियन जोसेफ ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को एक पत्र लिखकर पिछले दिनों सर्वोच्च अदालत द्वारा लिए गए उन कुछ फैसलों पर चिंता जाहिर की है जिनका पूरी जस्टिस डिलीवरी प्रणाली पर उल्टा प्रभाव पड़ा है। पेश है पूरा पत्र- संपादक)


प्रिय मुख्य न्यायाधीश, 

बेहद दुख और गुस्से की भावना के तहत हमने ये चिट्ठी लिखने का फैसला किया है। इस खत का मकसद देश की इस सबसे बड़ी अदालत में किए गए उन बड़े फैसलों पर रोशनी डालना है जिसने हाईकोर्ट्स की स्वतंत्रता, न्यायिक डिलीवरी सिस्टम और मुख्य न्यायधीश के प्रशासनिक कामकाज पर विपरित प्रभाव डाला है। जैसा कि आप जानते हैं कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास हाईकोर्ट के अस्तित्व के ही समय से न्यायिक कार्यप्रणाली कुछ परंपराओं के आधार पर चलती रही है। इन परंपराओं को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनाया, याद रहे कि ये कोर्ट इन अदालतों के सौ साल बाद अस्तित्व में आया था। 

इन्हीं परंपराओं में से एक सामान्य सिद्धांत है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर तैयार करने का अधिकार होता है और वह तय करते हैं कि कौन सी बेंच और जज किस मामले की सुनवाई करेंगे। हालांकि सालों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे की वजह केसों के निपटारे से जुड़ी कार्यप्रणाली के अनुशासित और व्यवस्थित तरीके से किए जाने की व्यवस्था है। इसका मतलब ये नहीं है कि ये अधिकार किसी तरह से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को दूसरे जजों के ऊपर कोई वैधानिक उच्चता देता ....हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था में ये एकदम साफ है कि चीफ जस्टिस सभी समान लोगों में पहला है। यानि सभी बराबर के जजों में प्रथम, ना उससे कम ना उससे ज्यादा। केसों के रोस्टर को लेकर चीफ जस्टिस के सामने परंपराओं के दिशा निर्देश मौजूद हैं। इस नियम की अनदेखी करना ना सिर्फ अवांछित परिणामों को जन्म देगा, बल्कि संस्था की विश्वसनीयता को लेकर भी लोगों के मन में सवालों को जन्म देगा।

उपरोक्त सिद्धांत के बाद अगला तर्कसंगत कदम ये होगा कि इस अदालत समेत अलग-अलग न्यायिक इकाइयां ऐसे किसी मामले से ख़ुद नहीं निपट सकतीं, जिनकी सुनवाई किसी उपयुक्त बेंच से होनी चाहिए। हमें बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हाल के समय में इन दोनों नियमों का सही तरीके से पालन नहीं हुआ। ऐसे मौके रहे हैं जब देश के लिए अहम मामलों को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने बिना किसी वाजिब तार्किकता के ऐसे ही बेंचों को सौंप दिया।

संस्थान की प्रतिष्ठा को हानि न पहुंचे, इसलिए मामलों का जिक्र नहीं कर रहे हैं, लेकिन इसकी वजह से पहले ही न्यायपालिका की संस्था की छवि को नुकसान हो चुका है। 

उपरोक्त मामले को लेकर हम ये उचित समझते हैं कि आपका ध्यान 27 अक्टूबर, 2017 के आरपी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य मामले की ओर लाया जाए। इसमें कहा गया था कि जनहित को देखते हुए मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने में और देर नहीं करनी चाहिए। जब मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन एंड एएनआर बनाम भारतीय गणराज्य मामले में संवैधानिक पीठ का हिस्सा था, तो ये समझना मुश्किल है कि कोई और पीठ ये मामला क्यों देखेगी?

इसके अलावा संवैधानिक पीठ के फ़ैसले के बाद मुझ समेत पांच न्यायाधीशों के कॉलेजियम ने विस्तृत चर्चा की थी और मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देकर मार्च 2017 में चीफ़ जस्टिस ने उसे भारत सरकार के पास भेज दिया था। भारत सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और इस चुप्पी को देखते हुए ये माना जाना चाहिए कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन मामले में इस अदालत के फ़ैसले के आधार पर मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को स्वीकार कर लिया है।

इसलिए किसी भी मुकाम पर पीठ को मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने को लेकर कोई व्यवस्था नहीं देनी थी या फिर इस मामले को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए नहीं टाला जा सकता।

चार जुलाई, 2017 को इस अदालत के सात जजों की पीठ ने माननीय जस्टिस सी एस कर्णन को लेकर फ़ैसला किया था। उस फ़ैसले में (आरपी लूथरा के मामले में) हम दोनों ने व्यवस्था दी थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है और साथ ही महाभियोग से अलहदा उपायों का तंत्र भी बनाया जाना चाहिए। मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को लेकर सातों जजों की ओर से कोई व्यवस्था नहीं दी गई थी।

मेमोरैंडम ऑफ़ प्रॉसिजर को लेकर किसी भी मुद्दे पर चीफ़ जस्टिस की कॉन्फ्रेंस और पूर्ण अदालत में विचार किया जाना चाहिए। ये मामला काफ़ी महत्वपूर्ण है और अगर न्यायपालिका को इस पर विचार करना है, तो सिर्फ़ संवैधानिक पीठ को ये ज़िम्मेदारी मिलनी चाहिए।

उपरोक्त घटनाक्रम को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। भारत के माननीय चीफ़ जस्टिस का कर्तव्य है कि इस स्थिति को सुलझाएं और कॉलेजियम के दूसरे सदस्यों के साथ और बाद में इस अदालत के माननीय जजों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद सुधारवादी कदम उठाएं।

एक बार आपकी तरफ़ से आर पी लूथरा बनाम भारतीय गणराज्य से जुड़े 27 अक्टूबर, 2017 के आदेश के मामले को निपटा लिया जाए। फिर उसके बाद अगर ज़रूरत पड़ी तो हम आपको इस अदालत की ओर से पास दूसरे ऐसे न्यायिक आदेशों के बारे में बताएंगे, जिनसे इसी तरह निपटा जाना चाहिए।

धन्यवाद,

जे चेलमेश्वर 

रंजन गोगोई 

मदन बी लोकुर 

कुरियन जोसफ़






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