“जिस बहस को मैं खड़ा करना चाहता हूं उसके सामने नौकरी खोना मेरे लिए छोटा जोखिम”: शाह फैजल

इंटरव्यूु , नई दिल्ली, शनिवार , 14-07-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पहले यूपीएससी टापर शाह फैजल अपने एक ट्वीट को लेकर आजकल विवादों में हैं। उस ट्वीट के बाद भारत सरकार के निर्देश उनके महकमे ने फैजल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी है। लेकिन इस मामले में झुकने और पीछे हटने की जगह फैजल ने उससे लड़ने का फैसला कर लिया है। लिहाजा उन्होंने अपने विभाग द्वारा लिखे गए पत्र को ही ट्वीट के जरिये सार्वजनिक कर दिया। इस पूरे मामले के केंद्र में सबसे प्रमुख बात ये है कि किसी प्रशासनिक अधिकारी को सोशल मीडिया पर खुद को अभिव्यक्त करने का अधिकार है या नहीं?

न्यूज़ 18 को दिए एक साक्षात्कार में फैजल ने कहा कि “जिस स्तर की बहस मैं खड़ी करने की तैयारी कर रहा हूं उसमें नौकरी खोना अब मेरे लिए छोटा जोखिम है।”

मौजूदा समय में जम्मू-कश्मीर के पर्यटन विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत और अमेरिका से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रहे फैजल से न्यूज़ 18 ने बात की है। पेश है उसके कुछ अंश:

प्रश्न: अपने खिलाफ जारी अनुशासनात्मक कार्रवाई की नोटिस को ट्वीट के जरिये पोस्ट करके आप क्या चीज साबित करने की कोशिश कर रहे हैं? 

शाह फैजल: मेरा उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कमी को सामने लाना था। सरकारी कर्मचारी समाज के एक बड़े हिस्से का निर्माण करते हैं लेकिन हम उनके बारे में आमतौर पर बात नहीं करते हैं। सामान्य सोच ये है कि सरकार और कर्मचारियों के बीच एक समझौता है और कर्मचारियों को केवल आदेशों का पालन करना है।

इस ट्वीट के जरिये जो मैं कहना चाहता हूं वो ये कि कर्मचारी भी समाज का एक सदस्य है। वह व्यापक नैतिक सवालों से बहुत ज्यादा समय तक अलग नहीं रह सकता है। केवल सरकारी कर्मचारी है इसका मतलब ये कतई नहीं है कि सार्वजनिक डिसकोर्स से अलग हो जाए। और मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि मैंने बोलने के अधिकार को जरूरी एहतियात के साथ इस्तेमाल किया है। उदाहरण के लिए मानदंडों का पालन करते हुए मैंने कभी भी सरकार के नीतियों की आलोचना नहीं की।

प्रश्न: आप जम्मू-कश्मीर के तमाम युवा नौकरशाहों में से एक हैं जो नियमित तौर पर सोशल मीडिया पर खुद को अभिव्यक्त करना पसंद करते हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर कुछ बहुत ही ज्यादा विवादास्पद मुद्दों पर भी लिखते हैं। एक सरकारी अफसर से जिस तरह के व्यवहार की अपेक्षा की जाती है ये उसमें क्रांतिकारी बदलाव है।

शाह फैजल:  हां, बहुत सारे अफसर ऐसे हैं जो अपने दिमाग में आयी बातों को कहने से नहीं हिचकते। मामला ये है कि लोगों को बोलने से रोकने वाले नियम इंटरनेट आने से बहुत पहले बनाए गए थे। वो ऐसे समय बनाए गए थे जब भोजन और रिहाइश के अधिकार सबसे ज्यादा चिंता के विषय बने हुए थे। लेकिन आज बोलने की स्वतंत्रता एक अधिकार के तौर पर बहुत जरूरी हो गयी है।

इस तरह के समय में कैसे सरकार अपने कर्मचारी से चुप रहने, गुमनाम बने रहने, विचारहीन होने, बड़े मुद्दों पर होने वाली सार्वजनिक बहसों में नहीं भागीदारी करने की उम्मीद कर सकती है?

सरकारी अफसरों की एक शास्त्रीय छवि बनी हुई है- वो अनाम हैं, उनसे बहस की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, उनके आस-पास जो हो रहा है उससे उन्हें आंख मूंद लेना चाहिए- अब इन चीजों में बदलाव की जरूरत है। सरकारी अफसरों को इस परंपरागत विचार को तोड़ देने की जरूरत है। क्योंकि हम जैसे लोग जो सरकारी अफसर हैं उसी तरह से प्रभावित हैं जैसे दूसरे लोग। हम इस समाज में रहते हैं और इसकी प्रगति और गिरावट दोनों हमें प्रभावित करते हैं।

प्रश्न: क्या आप जानते हैं कि उस पत्र को बहस के व्यंग्यपूर्ण कैप्शन के साथ पोस्ट करने से आपकी नौकरी जाने का खतरा है?

शाह फैजल:  आप उसे उत्तेजक कह सकते हैं। मैं नहीं समझता वो व्यंग्यपूर्ण था। जिस स्तर की बहस मैं खड़ा करना चाहता हूं उसके मुकाबले नौकरी खोना बहुत छोटा जोखिम है। हां मैं अपनी नौकरी खो सकता हूं। लेकिन उसके बाद दुनिया संभावनाओं से भरी हुई है।

प्रश्न: अपनी पिछले 8 साल की सेवा को किस रूप में देखते हैं?

शाह फैजल: ये बहुत ही घटनाक्रम वाला समय रहा है जिसमें हमने शिक्षा और हाइड्रो पावर सेक्टर में कुछ काम किया है। ये बेहद विस्मयकारी समय था और अगर हमें विकल्प दिया जाए तो मैं लोगों की सेवा जारी रखना पसंद करूंगा।

प्रश्न: क्या नौकरशाही में सेवा करते हुए आपको एक दृष्टि मिली है जो बाहर रहते कभी नहीं मिल पाती?

शाह फैजल: लोगों की सेवा करने के दौरान जिन चुनौतियों से सिविल अफसर गुजरता है मैं उन्हें समझता हूं। और निश्चित तौर पर वहां बहुत चुनौतियां हैं। राजनेताओं के तहत काम करना इन चुनौतियों में से एक है क्योंकि आपके काम की स्वतंत्र रूप से पहचान नहीं की जाती है। इसे राजनीतिक भागीदारी के जरिये तय किया जाता है। यहां तक कि अगर मैं अपना 100 फीसदी भी देने की कोशिश करूं उसके बावजूद मेरा काम और उसकी प्रशंसा राजनीतिक माहौल के हिसाब से होगी। मैं सिर्फ आशा करता हूं कि घाटी के हालात में सुधार आएगा। 

प्रश्न: क्या एक पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के ट्विटर पर आपके साथ खड़े होने से आपको तनाव से निजात पाने में कुछ मदद मिली?

शाह फैजल: ये केवल उमर अब्दुल्ला नहीं मैं पहले कुछ दूसरी राजनीतिक शख्सियतों से भी बातचीत कर चुका हूं। सरकारी कर्मचारियों के लिए बोलने की स्वतंत्रता की जो बात हमने की है उसका इन सार्वजनिक शख्सियतों तक विस्तार होता है। जब वो मेरी बात से तर्क या फिर उसका समर्थन करते हैं तो वो इस काम को एक व्यक्ति के तौर पर अपने निजी दायरे में करते हैं। इस तरह की टिप्पणियों को किसी को एक पूर्व इस या उस से आ रही हैं के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस दिए गए संदर्भ में ये कहना ही कि एक पूर्व मुख्यमंत्री ने मेरा समर्थन किया गैरजरूरी राजनीतिक बहस को पैदा करना है।

प्रश्न: आपको निश्चित तौर पर घाटी में लौटकर अपने दफ्तर में काम करने की खुजली हो रही होगी?

शाह फैजल: वो भी और फिर से ट्वीट करने...(हंसते हुए)




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