शुरू हो गया सत्ता का खेल, सोनिया ने संभाली कमान

राजनीति , , शनिवार , 18-05-2019


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महेंद्र मिश्र

17वीं लोकसभा के लिए चुनाव प्रचार समाप्त हो गया है। 19 मई को वोटिंग के बाद सबकी निगाहें 23 के नतीजे पर रहेंगी। लेकिन आम तौर पर माना जा रहा है कि किसी गठबंधन या दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने जा रहा है। यहां तक कि सत्तारूढ़ बीजेपी अपने स्पष्ट बहुमत का दावा नहीं कर रही है। हां अपने एनडीए के लिए जरूर यह बात कह रही है। जो उसकी मजबूरी है। इन स्थितियों को देखते हुए सभी दलों ने 23 के बाद की संभावनाओं के लिहाज से अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। शुरुआत यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी की तरफ से हुई है। चुनाव के दौरान बिल्कुल नदारद दिखीं सोनिया अब इस आखिरी मौके पर सक्रिय हो गयी हैं। 

बताया जाता है कि उन्होंने कई विपक्षी नेताओं से संपर्क साधा है। और जिस नेता से वह खुद बात नहीं कर सकती हैं उसके लिए उन्होंने अपने दूसरे नेताओं को लगाया है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अगर कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार के गठन की स्थिति नहीं बनती है तो वह दूसरे दल और नेता को भी समर्थन देने के लिए तैयार है। वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के बयान को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर पार्टी प्रधानमंत्री का पद नहीं पाती है तो यह उसके लिए कोई मुद्दा नहीं है। बताया जा रहा है कि राहुल गांधी को उसी स्थिति में पीएम पद के लिए पेश किया जाएगा जब उसके पास सम्मानजनक सीटें होंगी। इसी कड़ी को और पुख्ता करने के लिए सोनिया 23 मई को ही विपक्षी नेताओं की बैठक बुला ली है।

केसीआर ने डीएमके नेता स्टालिन से मिलकर उनसे तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर बात की है। बताया जा रहा है कि केसीआर की निगाह डिप्टी प्राइम मिनिस्टर की कुर्सी पर है। और उनकी ये सक्रियता तीसरे मोर्चे और उसमें अपने लिए एक बड़ी जगह बनाने के लिए है। हालांकि स्टालिन पहले ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार के तौर पर पेश कर चुके हैं। लिहाजा इस मुलाकात के बाद एक बार फिर उन्होंने तीसरे मोर्चे की किसी संभावना को खारिज कर दिया है। इस बीच केसीआर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ का भी टेलीफोन गया है। बताया जाता है कि सोनिया ने कुछ लोगों से बात करने की जिम्मेदारी कमलनाथ को सौंपी है। सूत्रों की मानें तो केसीआर पहले से ही आजाद और अहमद पटेल के संपर्क में हैं।

क्षेत्रीय दलों के नेता भी बेहद उदार तरीके से विचार कर रहे हैं। उन लोगों ने भी अपने सभी विकल्प खोल रखे हैं। बताया जाता है कि अगर किसी दल या फिर उसके नेता को केंद्र में उचित स्थान नहीं मिल पाया तो उसकी भरपाई राज्य में किए जाने का विकल्प खुला रखा गया है। जो एक बेहतर पैकेज के रूप में उपलब्ध होगा। 

इधर दो महिलाओं की आकांक्षाएं भी हिलोरें मार रही हैं। यूपी में गठबंधन ने चुनाव ही इसी नजरिये से लड़ा है। जिसमें कई जगहों पर अखिलेश इस मंशा को जाहिर कर चुके हैं कि वह मायावती को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। खुद मायावती भी चुनाव के बाद पीएम बनने की स्थिति में अपने लिए संभावित लोकसभा क्षेत्र पर नेताओं के साथ बात करते हुए देखी जा चुकी हैं। बताया जा रहा है कि एनसीपी के मुखिया शरद पवार एक दो दिन के बीच यूपी का दौरा कर मायावती से मुलाकात कर सकते हैं। दूसरी महिला ममता बनर्जी हैं। जिस तरह से उन्होंने पीएम मोदी से सीधी तकरार मोल ली है उससे उनके चुनाव बाद विपक्ष की धुरी के तौर पर उभरने की संभावनाएं बेहद प्रबल हो गयी हैं। 

लिहाजा विपक्षी दल एकमत से इस बात पर एकजुट हैं कि उन्हें किसी भी कीमत पर मोदी और शाह की जोड़ी को हटाना है। यहां तक कि एनडीए के भीतर के कुछ दल भी इन दोनों नेताओं से संतुष्ट नहीं रहे हैं। शिवसेना उन्हीं दलों में से एक है। जो सबसे ज्यादा मुखर रही है। 

वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की मानें तो सोनिया ने ड्राइविंग सीट संभाल ली है। और विपक्षी नेताओं तक उनकी व्यक्तिगत पहुंच और साख इस मौके पर उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। यहां तक कि ममता से भी उनके बेहतर रिश्ते रहे हैं। जरूरत पड़ने पर वह एनडीए के राम विलास पासवान से भी बात कर सकती हैं। और पासवान भी खुशी-खुशी उनसे बात करना पसंद करेंगे। 








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