मस्तिष्क को कंप्यूटर से भी ज्यादा जटिल मानते थे हॉकिंग

इंटरव्यूु , , बुधवार , 14-03-2018


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लोकमित्र गौतम

स्टीफन विलियम हॉकिंग आइंस्टाइन के बाद निर्विवादित रूप से 20वीं सदी के सबसे बड़े वैज्ञानिक थे। आज 76 साल की उम्र में इस महान वैज्ञानिक का निधन हो गया। उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी त्रासदी ही उनकी महानता का आधार बन गई। दरअसल जिस विचित्र बीमारी के चलते वह न बोल पाते थे, न कुछ सुन पाते थे। माना जाता है कि उसी के चलते उन्होंने अपने मस्तिष्क को इस कदर एकाग्र करने में दक्षता हासिल की कि वह गणित के बड़े-बड़े सवालों को मस्तिष्क में ही एक दो नहीं बल्कि ग्यारह डाइमेंसन से हल कर लेते थे। स्टीफन विलियम हॉकिंग इसलिए भी दुनिया के महानतम वैज्ञानिक थे, क्योंकि वह ताउम्र मानव के भविष्य के सवालों से चिंतित रहे। 10 साल पहले ‘द टेलीग्राफ लंदन’ ने उनसे बहुत महत्वपूर्ण इंटरव्यू किया था, जिसमें उन्होंने मानव के भविष्य से संबंधित तमाम सवालों के जवाब दिये थे। पेश हैं, उस साक्षात्कार के कुछ महत्वपूर्ण अंश-

प्रश्न: दुनिया की जनसंख्या हर 40 सालों में दुगुनी हो रही है। अगर यह इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो 2600 तक पृथ्वी पर हमारे रहने के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं बचेगी। ऐसी स्थिति में क्या हम दूसरे ग्रहों तक जा सकेंगे?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: इस सदी के अंत तक हम संभवतः मानवयुक्त अंतरिक्षयानों बल्कि निजी यानों से मंगल ग्रह तक उड़ सकेंगे। लेकिन हमारे सौर परिवार में पृथ्वी ही हमारे रहने योग्य सबसे अनुकूल जगह है। मंगल बहुत ठंडा और बहुत कम वायुमंडल वाला ग्रह है। अन्य ग्रह तो मानव के रहने लायक हैं ही नहीं। ऐसे में हमें या तो अंतरिक्ष स्टेशनों पर रहना सीखना होगा या फिर दूसरे तारा प्रणाली (सौरमंडल) की यात्रा करनी पड़ेगी जो कि हम इस सदी में भी कर पायेंगे। वैसे, जनसंख्या बढ़ने की यह रफ्तार हमेशा नहीं रहेगी। आशंका तो यह भी है कि हम खुद अपना सफाया कर डालेंगे।

प्रश्न: दूसरे तारे की यात्रा के लिए हम अपनी गति को किस हद तक बढ़ा सकेंगे?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: मेरा ख्याल है कि हम चाहे जितने भी चतुर-चालाक हो जाएं, प्रकाश की गति से तेज यात्रा कभी भी न कर पायेंगे। यदि हम प्रकाश से भी तेज यात्रा कर सके तो हम समय में वापस चले जाएंगे। रैप ड्राइव की जगह राकेटों का इस्तेमाल कर दूसरे तारों की यात्रा करना बहुत थकाऊ और धीमी प्रक्रिया होगी। आकाशगंगा के केन्द्र की यात्रा के एक चक्कर में ही एक लाख वर्ष लग जाएंगे और इस समय तक तो मानव प्रजाति इस कदर बदल जायेगी कि उसे कोई पहचान ही नहीं पायेगा बशर्ते उसका सफाया न हुआ हो।

प्रश्न: क्या हम लोग (विकास क्रम के तहत) बदलते रहेंगे या फिर विकास और ज्ञान के अंतिम स्तर तक पहुंचने में सक्षम होंगे?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: संभव है अगले 100 वर्षों में या हो सकता है अगले 20 ही सालों में हम ब्रह्मांड के पूर्ण मूलभूत सिद्धांतों को खोज लें (सब कुछ का तथाकथित सिद्धांत जिसमें क्वांटम थ्योरी को आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षतावाद थ्योरी से एकीकृत किया जाता है) लेकिन इन नियमों के तहत हमारे द्वारा बनाये जाने वाले जैविक और इलेक्ट्रॉनिक जटिलताओं की सीमा नहीं होगी। अब तक हमारे पास जो सबसे जटिल प्रणाली है, वह हमारा अपना शरीर है। मानव डीएनए में पिछले दस हजार सालों में कोई सार्थक परिवर्तन नहीं हुआ है। लेकिन जल्दी ही हम अपनी आंतरिक जटिलताओं, अपने डीएनए को और भी विकसित करने में सक्षम होंगे- जैविक विकास क्रम की धीमी प्रक्रिया का इंतजार किये बिना। बहुत संभव है कि अगले एक हजार वर्षों में हम इसे पूरी तरह दुबारा डिजाइन कर लें। उदाहरण के लिए हम अपने मस्तिष्क का आकार बढ़ा कर ऐसा कर सकेंगे।

निश्चित रूप से बहुत लोग इस पर आपत्ति करेंगे क्योंकि मानव पर जेनेटिक इंजीनियरिंग पर प्रतिबंध होगा, लेकिन मुझे शक है कि हम इसे रोक पायेंगे। यह एक दिन जरूर वास्तविकता बनेगी भले ही हम चाहें न चाहें। आर्थिक कारणों के चलते वनस्पतियों और जंतुओं पर जेनेटिक इंजीनियरिंग की छूट दे दी जायेगी। कोई न कोई इसे मानव पर भी आजमायेगा, जब तक कि इस पर कोई सार्वभौमिक नियम न बने। 

प्रश्न: यदि ऐसे विकास ने मानव को विकसित कर दिया तो विकसित स्थिति में वह अन्य अविकसित लोगों के लिए सामाजिक, राजनीतिक दिक्कतें पैदा नहीं करेगा?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: मैं मानव जेनेटिक इंजीनियरिंग का पक्षधर नहीं हूं। मैं केवल यह कह रहा हूं कि ऐसा हो सकता है और हमें इस पर विचार करना होगा कि इससे कैसे निपटा जाए। एक तरह से मानव प्रजाति को अपनी मानसिक और शारीरिक जटिलताएं बढ़ानी होंगी यदि उसे अपने चारों ओर की जटिल दुनिया से काम लेना है और अंतरिक्ष यात्रा जैसी चुनौतियों का सामना करना है। हमें तब और भी जटिल (विकसित) होना होगा यदि हमें अपनी जैविक प्रणाली को इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से आगे रखना है। मौजूदा समय में कंप्यूटर को गति का लाभ मिल रहा है लेकिन उनमें मानव जैसी बुद्धि का अभाव है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आज के कंप्यूटर केंचुए के मस्तिष्क से ज्यादा जटिल नहीं है। केंचुआ, जिसे कि बुद्धि के मामले में बहुत पिछड़ा माना जाता है। लेकिन कंप्यूटर की स्पीड हर 18 महीनों में दुगुनी हो जाती है और संभवतः यह तब तक जारी रहेगी जब तक कि वह मानव मस्तिष्क के समकक्ष न पहुंच जाए।

प्रश्न: कंप्यूटर कितना ही विकसित क्यों न हो जाए, क्या वह सही मायनों में सही बुद्धि का प्रदर्शन कर पायेगा?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: मेरा ख्याल है कि अत्यंत जटिल रासायनिक अणु जब मानव में संक्रिया कर उसे बुद्धिमान बना सकते हैं, तब उसी तरह जटिल विद्युत परिपथ (इलेक्ट्रॉनिक सर्किट) कंप्यूटर को बुद्धिमान तरीक से काम करने में भी सक्षम बना सकता है और यदि वे इंटेलीजेंट हुए तो वे ऐसे कंप्यूटर डिजाइन कर सकते हैं जिनमें व्यापक बुद्धि और जटिलता हो।

प्रश्न: बढ़ायी गयी यह जैविक और वैद्युत जटिलता क्या हमेशा के लिए होगी या फिर इनकी भी प्राकृतिक सीमाएं होंगी?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: जैविक या बॉयलोजिकल परिदृश्य में मानव बुद्धि की सीमाएं अब तक मानव मस्तिष्क के आकार द्वारा निश्चित है जो बर्थ कैनाम के माध्यम से गुजरती हैं। लेकिन अगले 100 सालों में मुझे उम्मीद है कि हम यह जान पायेंगे कि मानव शरीर से अलग बच्चों को कैसे पैदा करना है, विकसित करना है। इस तरह यह सीमा टूट जायेगी लेकिन अंततः जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए मानव मस्तिष्क की बढ़ोत्तरी समस्या भी पैदा करेगी क्योंकि हमारी मानसिक सक्रियता के लिए जिम्मेदार रासायनिक संदेश अपेक्षाकृत धीमी गति से चलते हैं। इस तरह मस्तिष्क की जटिलता में बढ़ोत्तरी गति की कीमत पर होगी। हम हाजिरजवाब या बहुत इंटेलीजेंट हो सकते हैं लेकिन दोनों नहीं।

दूसरा तरीका, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक सर्किट गति को बनाये हुए अपनी जटिलता को बढ़ा सकते हैं, मानव मस्तिष्क की नकल है जिसमें एक सीपीयू (सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट आफ कंप्यूटर) नहीं, जो प्रत्येक कमांड को क्रम से प्रोसेस करता है, बल्कि इसमें (मानव मस्तिष्क) लाखों प्रोसेसर हैं, जो एक ही समय में एक साथ काम कर रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक इंटेलीजेंस का भविष्य ऐसे ही व्यापक समानांतर प्रोसेसर्स का होगा।

प्रश्न: क्या हम नयी सहस्त्राब्दि में पृथ्वीबाह्य सभ्यता (एलियन) से संपर्क कर पायेंगे?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: मानव प्रजाति अपने इस मौजूदा रूप में पिछले 20 लाख वर्षों से है जबकि बिग बैंग के बाद 15 अरब वर्षों से ब्रह्मांड अस्तित्व में है। ऐसे में यदि अन्य तारा प्रणालियों में जीवन विकसित भी हुआ तब मानव विकास के इस चरण में उसे जानने के अवसर बहुत कम हैं। पृथ्वीबाह्य जीवन से कभी यदि हमारा सामना हुआ तो या तो वह बहुत ही अविकसित होगी या फिर हमसे बहुत ज्यादा विकसित।

प्रश्न: लेकिन यदि वह सभ्यता बहुत विकसित होगी तो उसने हमसे अभी तक क्यों संपर्क नहीं किया?

स्टीफन विलियम हॉकिंग: हो सकता है वहां कोई विकसित सभ्यता हो जो हमारे अस्तित्व से भी वाकिफ हो लेकिन वह हमें अपने ही हाल में (अति अल्प विकसित समझकर) छोड़ देना चाहती हो। ऐसे में मुझे शक है कि कोई अति विकसित सभ्यता अपने से अत्यंत लघु विकसित जीवन रूप पर सोचना भी चाहती हो। इस संदर्भ में एक मजाक भी किया जाता है कि पृथ्वीबाह्य विकसित सभ्यताओं ने हमसे इसलिए संपर्क नहीं किया क्योंकि जब कोई सभ्यता विकास की हमारी अवस्था में पहुंचती है तब वह अस्थिर हो जाती है और अपने को नष्ट कर डालती है। लेकिन मैं आशावादी हूं। मैं समझता हूं कि परमाणु युद्ध रोकने के हमारे पास पर्याप्त मौके हैं।

         (द टेलीग्राफ, लंदन में प्रकाशित इंटरव्यू के कुछ अंश)

नोट:इसका अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार लोकमित्र गौतम ने किया है।










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