सुबोध नहीं, ये संविधान की हत्या है!

ख़बरों के बीच , , बृहस्पतिवार , 06-12-2018


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महेंद्र मिश्र

इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या की घटना से ज्यादा योगी सरकार का उस पर रवैया अहम हो गया है। उसने इसे एक अभूतपूर्व घटना में तब्दील कर दिया है। बाबरी विध्वंस की बरसी से एक दिन पहले इसे एक दूसरी बाबरी मस्जिद की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। या फिर इसे सांप्रदायिक हत्यारी ताकतों का उससे भी आगे बढ़ा हुआ कदम करार दिया जा सकता है। बाबरी मस्जिद में तो कम से कम सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश था और पालन न करने पर संबंधित शख्स को सजा हुई थी। दूसरे शब्दों में कहें तो एक औपचारिकता ही सही उसे निभाया गया था। लेकिन कल तो मानो संविधान ही बिल्कुल ठप पड़ गया। देश का लोकतंत्र और उसकी संस्थाएं मौन हो गयीं।

यहां तक कि पुलिस के आला अधिकारी अपने एक शहीद भाई के साथ नहीं खड़े हो पाए। घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में सूबे के आला पुलिस अफसरों के साथ बैठक के बाद राज्य सरकार की जो विज्ञप्ति आयी है वो अभूतपूर्व है। बैठक में जांबाज पुलिस अफसर को उसकी बहादुरी और शौर्य के लिए सम्मान और श्रद्धांजलि दिए जाने के बजाय विज्ञप्ति में नाम तक डाला जाना जरूरी नहीं समझा गया। और उनकी हत्या और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की जगह पशुओं के कथित हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही गयी। उसमें एक भी शब्द सुबोध की हत्या के संबंध में नहीं है और न ही उनके दोषियों के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात कही गयी है।

विज्ञप्ति देखकर ऐसा लगता है कि ये मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं बल्कि बजरंग दल के हेडक्वार्टर से जारी हुई है। और उसका सरगना संविधान के तहत काम करने वाले पुलिस अफसरों के साथ नहीं बल्कि संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठक किया हो। इस विज्ञप्ति के माध्यम से सीधे-सीधे सूबे की नौकरशाही को ये संदेश देने की कोशिश की गयी है कि जो भी सरकार और उससे जुड़े संगठनों की इच्छा के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा उसका यही हस्र होगा। उसे ये बताने की कोशिश की गयी है कि भले ही देश में अभी मनुस्मृतीय फासीवादी व्यवस्था घोषित नहीं की गयी है लेकिन सरकार उसी हिसाब से चल रही है।

दरअसल यही गुजरात मॉडल है जहां अफसर नहीं गुर्गे पाले जाते हैं। और उनका अपने घृणित सांप्रदायिक मंसूबों और निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो भी संविधान के मुताबिक या ईमानदारी या फिर सच और तथ्य के हिसाब से न्याय के पक्ष में खड़ा होने की कोशिश करता है वो दुश्मन घोषित कर दिया जाता है। और फिर सत्ता रहने के दौरान उसको जीवन भर उसका संत्रास भोगना पड़ता है। गुजरात में इसके सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। जिसमें पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट और आईएएस प्रदीप शर्मा अभी भी जेल में हैं। और कितने अफसर पुलिस और सिविल सेवा की नौकरियां छोड़कर दूसरे पेशे में चले गए।

आखिर क्या गलती थी सुबोध सिंह की? यही कि उन्होंने ईमानदारी से अपना फर्ज निभाने की कोशिश की थी? यही काम तो उन्होंने अखिलेश सरकार के दौरान भी किया था। कोबरा पोस्ट ने तो अब उस मामले को उजागर भी कर दिया है। जब अखिलेश सरकार ने अखलाक कांड में अपने मुताबिक मांस और रिपोर्ट बदलवाने की कोशिश की थी लेकिन सुबोध ने सरकार की बात को मानने से इंकार कर दिया था। इस बात में कोई शक नहीं कि नतीजे में उन्हें उसकी सजा भी भुगतनी पड़ी थी और उनका बनारस तबादला कर दिया गया था।

लेकिन यहां तो बात न मानने पर जान ले ली जा रही है। और बदले में श्रद्धांजिल के एक शब्द भी नहीं कहे जा रहे हैं। ऊपर से हत्यारों और उसके गिरोह को मुआवजा देकर पुरस्कृत किया जा रहा है। और वहां शहीद इंस्पेक्टर की नहीं बल्कि कथित गायों की हत्या और उसके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को तरजीह दी जा रही है। जिसकी सचाई ये है कि मामले में दर्ज एफआईआर में ज्यादातर नाम फर्जी निकले हैं। और घटना को भी हिंदुओं द्वारा अंजाम दिए जाने की बात की जाने लगी है। जिसका वीडियो पहले ही देश के सामने आ चुका है।

दरअसल यही ब्राह्मणवादी फासीवादी व्यवस्था है जिसमें व्यवस्था और उसमें बैठे लोगों का निहित स्वार्थ सबसे ऊपर हो जाता है। और उसको हासिल करने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसमें एक छोटे समूह कहिए या समुदाय के हितों को पूरा करने के लिए पूरी व्यवस्था और समाज को संचालित किया जाता है। संविधान इसके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। लिहाजा सरकार ने अब उसे अप्रासंगिक बनाना शुरू कर दिया है।

इसीलिए कहा जा रहा है कि ब्राह्मणवादी-फासीवादी व्यवस्था संविधान और लोकतंत्र को लील जाने के लिए तैयार है। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि इस मौके पर नौकरशाही के बीच से एक आवाज तक नहीं उठी। ऐसे पुलिस महकमे से भला क्या उम्मीद की जा सकती है जो खुद अपने शहीद भाई को भी न्याय दिलाने के लिए नहीं खड़ा हो पा रहा है। एक छोटी सी सत्ता और उसका टुटपुंजिया शासक पूरे संविधान और उसकी शपथ पर भारी पड़ रहा है।

सत्ता तंत्र और उससे जुड़े लोग कितने क्रूर और निर्लज्ज हो सकते हैं वो घटना के दिन पीएम मोदी के रवैये से दिखा जब वो इंस्पेक्टर की शहादत के दिन अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की शादी में पहुंच गए। और कोई गम जाहिर करने की जगह अटट्हास करते दिखे। बात-बात पर लोगों के जीवन और मरण को याद करने वाले मोदी ने इस घटना पर एक ट्वीट तक करना जरूरी नहीं समझा। सूबे के मुख्यमंत्री एक दूसरे सूबे छत्तीसगढ़ के मुखिया रमन के साथ गोरखपुर में लाइट एंड साउंड शो करते देखे गए। उन्होंने अपने इस कार्यक्रम को रद्द करना भी जरूरी नहीं समझा। ये बताता है कि हम कितने संकटग्रस्त दौर में पहुंच गए हैं। जब हत्याओं पर संवेदना जताने की जगह उसका जश्न मनाया जा रहा है।

 










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