आखिर क्यों हैं सवालों के घेरे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश?

विशेष , नई दिल्ली, रविवार , 12-11-2017


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जनचौक डेस्क

नई दल्ली। देश के सामने एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। सर्वोच्च न्यायिक संस्था का सर्वोच्च पद इस समय सवालों के घेरे में है। वो एक ऐसे मामले की सुनवाई की जिद पर अड़े हैं जिसमें वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर शामिल रहे हैं। अभी तक सिर्फ विक्रमादित्य की पीठ ही एसी रही है कि न्याय के हिसाब से जरूरत पड़ने पर अपने खिलाफ भी फैसला देने से नहीं हिचकती थी। क्या मौजूदा समय के किसी जज से ये उम्मीद की जा सकती है? लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा लोगों से कुछ ऐसी ही अपेक्षा करते हैं। हालांकि वो खुद को मेडिकल कालेज वाले मामले में निर्दोष बता रहे हैं लेकिन मामले की पृष्ठिभूमि में जाने और पूरी पड़ताल करने पर एक दूसरी ही तस्वीर सामने आती है। जिसमें न्यायपालिका का वो काला और विद्रूप चेहरा सामने आता है जिसकी तरफ देखना भी किसी के लिए गवारा नहीं होगा। 

सुप्रीम कोर्ट की अध्यक्षता वाली सात सदस्यों की बेंच जिसे बाद में पांच सदस्यीय कर दिया गया, कैंपेन फार जूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफर्म्स (सीजेएआर) की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सीजेएआर ने याचिका में मामले की जांच के लिए एक स्पेशल इंवेस्टिगेटिव टीम गठित करने की मांग की थी। उसका कहना था कि ये टीम सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित की जानी चाहिए। इस टीम को लखनऊ के एक मेडिकल कालेज से संबंधित भ्रष्टाचार के एक मामले में सीबीआई की तरफ से सितंबर महीने में दर्ज एक एफआईआर की जांच करनी थी। 

भ्रष्टाचार के तार सुप्रीम कोर्ट के जजों तक जाते हैं। याचिका में इस बात को चिन्हित किया गया है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया (एमसीआई) की सलाह पर दो विभिन्न मौकों पर मेडिकल कालेज को काम करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। और दो बार सुप्रीम कोर्ट की बेंचों ने एमसीआई को कालेज के आवेदन पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया था। एफआईआर में ये आरोप लगाया गया है कि कालेज स्थापित करने वाले प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के मैनेजरों की हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज और ढेर सारे व्यक्तिगत लोगों के जरिये मामले की सुनवाई कर रही सर्वोच्च अदालत के सदस्यों के साथ बातचीत चल रही थी। एफआईआर में रिटायर्ड जज और दूसरों पर उच्च अदालत की दलाली करने का आरोप है। खास बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट की दोनों बेंचों में जस्टिस दीपक मिश्रा शामिल थे।

8 नवंबर को जस्टिस चेलमेश्वर जो जस्टिस मिश्रा के बाद सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ जज हैं, ने सीजेएआर की याचिका को स्वीकार कर लिया और उस पर सुनवाई के लिए दो दिन बाद का समय तय किया। बाद में उसी दिन याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री विभाग से एक फोन आया जिसमें उन्हें बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश ने मामला अपने हाथ में लेकर उसे एक दूसरी बेंच के हवाले कर दिया है। चेलमेश्वर जिसके हिस्से नहीं थे। दूसरी बेंच जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण को लेकर बनायी गयी थी।

अगले दिन सुप्रीम कोर्ट की वकील कामिनी जायसवाल ने एमसीआई मामले में एक नयी याचिका दायर की। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने उसी दिन मामले को चलमेश्वर के सामने रखा। चेलमश्वर और अब्दुल नजीर की एक बेंच ने उसी दिन बाद में जायसवाल की याचिका की सुनवाई की और उसे तत्काल सुने जाने की जरूरत बताया और इसके साथ ही उन कारणों को भी चिन्हित किया: “कोर्ट के संज्ञान में ये बात लायी गयी है कि इस देश के एक रिटायर्ड जज के खिलाफ सीबीआई द्वारा कोई एक एफआईआर दर्ज किया गया है जिसमें उस जज पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।”-बेंच ने केंद्र सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी कर दी और कहा कि “एफआईआर में कुछ ऐसी चीजें शामिल हैं जो बेहद परेशान करने वाली हैं। आरोप इस कोर्ट के काम करने के तरीके पर भी सवाल खड़े करता है।”

जायसवाल की याचिका में आरोप है कि “गैरवाजिब तरीके से प्रभावित करने का प्रयास किया गया था।” ये एमसीआई और प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन याचिका का निचोड़ था। इसमें ये बात भी कही गयी है कि “एफआईआर में आरोपी के तौर पर हाईकोर्ट के एक पूर्व जज का नाम भी दर्ज है जो एक दलाल के जरिये इस कोर्ट के सामने विचाराधीन एक याचिका में मनमाफिक फैसले के लिए सौदा कर रहा था।” पूरी परिस्थितियों पर गौर करने के बाद चेलमेश्वर और नजीर की बेंच ने अपने आदेश में इस बात को दर्ज किया कि “हमें ऐसा उचित लगता है कि वरिष्ठता के क्रम में पांच वरिष्ठ जजों की संवैधानिक पीठ को इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए।” आखिरी तौर पर मामले की सुनवाई के लिए 13 नवंबर की तारीख तय की गयी।

10 नवंबर को सीकरी और भूषण की दो जजों की बेंच ने भी सीजेएआर की याचिका को एक संवैधानिक पीठ द्वारा सुने जाने का आदेश दिया। उसी दोपहर को एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित एक सात सदस्यीय बेंच के सामने सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध हो गया।

प्रशांत भूषण ने सीकरी और भूषण के सामने विशेष तौर पर गुजारिश की थी कि इस मामले को सुनने वाली किसी भी बेंच में मुख्यन्यायाधीश मिश्रा शामिल नहीं होने चाहिए। उन्होंने कहा था कि “एफआईआर में बहुत साफ-साफ लिखा है कि सीजेआई की बेंच पर आरोप है।” और अब मुख्य न्यायाधीश के सामने खड़े होकर प्रशांत भूषण उनसे मामले से अलग रहने की मांग कर रहे थे। 

भूषण ने कहा कि “एफआईआर सीधे आप के खिलाफ दर्ज है।” ऐसा सुनते ही पूरे कोर्टरूम में कानाफूसी शुरू हो गयी।

मिश्रा ने उत्तर दिया “ये बेवकूफाना बात है। एफआईआर में एक भी शब्द मेरे खिलाफ नहीं है। अब आप कोर्ट की अवमानना के दायरे में आ गए हैं।”

भूषण ने कहा कि “अवमानना की नोटिस जारी कीजिए।”

इस पर जस्टिस मिश्रा ने कहा कि “आप इस लायक ही नहीं हैं।”

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मामले में एक पक्ष के तौर पर खुद को जिरह में शामिल कर लिया। गौरतलब है कि सीकरी और भूषण की बेंच के सामने संविधान पीठ गठित होने से पहले उसने मौखिक तौर पर इसकी इजाजत ले ली थी। कोर्ट में बार एसोसिएशन के सचिव गौरव भाटिया भूषण के मुख्यन्यायाधीश को मामले से अलग करने की दलील से बेहद दुखी दिख रहे थे। इस बात का इजहार उन्होंने कोर्ट के सामने भी किया। सीजेएआर और जायसवाल की दो अलग-अलग याचिकाओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अपने पक्ष में आदेश हासिल करने के लिए आतंकी रास्ता अपनाया जा रहा है।

भाटिया जारी रहे। उन्होंने 1998 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सीजेआई कोर्ट का प्रशासनिक मुखिया होता है। और दूसरे जज मामले को खुद ही आवंटित नहीं कर सकते हैं। चेलमेश्वर की नोटिस के मामले में सीजेआई ने कहा कि “ मैंने कल का फैसला देखा है।” ये कोर्ट इस तरह से काम नहीं कर सकती है। एडिशनल सालीसीटर जनरल पीएस नरसिम्हा उससे सहमत थे। उन्होंने कहा कि “ सीजेआई के कार्यकारी अधिकार को न्यायिक शक्ति के जरिये प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।”

प्रशांत भूषण ने कम से कम दो बार कोर्ट के सामने शिकायत की कि कामनी जायसवाल की याचिका संविधान पीठ के सामने नहीं है। उन्होंने कहा कि “वो मामला आपके सामने नहीं है मी लार्ड हम क्यों उस पर बात कर रहे हैं”? फिर भी ऐसा लग रहा था कि कोई भी उनको सुनने के लिए तैयार नहीं था। यहां तक कि जस्टिस मिश्रा एक बार उनकी तरफ मुड़कर देखे तक नहीं। हमेशा जैसे ही भूषण बोलना शुरू करते कोर्ट में एक अजीब किस्म की बेचैनी छा जाती- इस बात की आशंका कि अब वो क्या कह देंगे। 

तकरीबन आधे घंटे तक जजों ने कोर्ट रूम में ढेर सारे वकीलों की दलीलें सुनीं- इनमें बहुत सारे ऐसे थे जो कोर्टरूम में केवल मौजूद थे और मामले में किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे। हर बार एक नई आवाज आती थी। विजिटर बाक्स से कोई अपनी नोटबुक से नजर हटाकर देखता था और फिर पूछ बैठता था,“कौन है वो शख्स”? एक स्पीकर ने तो यहां तक कह दिया कि लोगों के जेहन में सुप्रीम कोर्ट अब राजनैतिक तंत्र से भी बदतर हो गया है। एक वकील ने बेंच को संबोधित करते हुए कहा कि “संस्था की प्रतिष्ठा को ध्वस्त किया जा रहा है।” इस पर सीजेआई ने पूछा “कौन कर रहा है।”? उसके बाद कुछ सेकेंड के लिए खामोशी छा गयी।

भूषण फिर खड़े होकर कहते हैं कि “ अब हर एक के जरिये। यहां तक कि इस मामले में जो पक्ष नहीं हैं उनको भी सुना जा रहा है। क्या मैं अपनी बात रख सकता हूं।” भूषण ने पूछा कि “क्या हमारे जज याचिकाकर्ता का बगैर पक्ष सुने एक आदेश पारित करने जा रहे हैं”?

जायसवाल की याचिका में चेलमेश्वर के आदेश पर बहुत सारी बातचीत हुई। एक वरिष्ठ वकील ने कहा कि लोग न्यायपालिका पर हंस रहे हैं। जब एक जज ने पूछा कि चेलमेश्वर के सामने जायसवाल की याचिका का जिक्र किसने किया था इस पर बहुत सारे लोगों ने एक साथ जवाब दिया, “दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण।” सीजेआई ने फिर दोहराया, “संस्था इस तरह से काम नहीं कर सकती।”

इस पूरे मामले को समझने के लिए इसकी पृष्ठिभूमि में जाना बेहद जरूरी है। 2015 में प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट जो जौनपुर और लखनऊ में ढेर सारी शिक्षण संस्थाएं चलाता है, ने केंद्र सरकार के सामने एक मेडिकल कालेज खोलने का आवेदन दिया था। सरकार ने उस पर विचार करने के लिए उस आवेदन को एमसीआई को भेज दिया था। जिसे उसने सरकार से रद्द करने की सिफारिश की थी। एमसीआई के जवाब पर जून 2016 में सरकार ने ट्रस्ट के आवेदन को खारिज कर दिया।

दो महीने बाद केंद्र सरकार ने ट्रस्ट को कालेज को स्थापित करने की इजाजत दे दी। ऐसा मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित ओवरसाइट कमेटी की सिफारिश के आधार पर किया गया। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के तहत काम करने वाली ओवरसाइट कमेटी एमसीआई के संचालन पर निगरानी रखने का काम करती है। हालांकि पिछले साल अनुमति पत्र की शर्तों के मुताबिक एमसीआई ने कालेज का निरीक्षण किया और विभिन्न क्षेत्रों में उसे कमियां दिखने को मिलीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्पताल परिसर पूरी तरह से वीरान था और उसके सभी दरवाजे बंद पाए गए। इसी साल 31 मई को एमसीआई की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कालेज को छात्रों के प्रवेश लेने पर दो अकादमिक साल के लिए पाबंदी लगा दी। साथ ही एमसीआई को 2 करोड़ रुपये के कालेज की बैंक गारंटी को भी भुनाने की इजाजत दे दी।

उसके बाद ट्रस्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। दीपक मिश्रा, अमितव राय और एएम खानविल्कर के तीन जजों वाली एक बेंच ने मंत्रालय को एक और निरीक्षण कराने का आदेश दिया। आदेश में कहा गया था कि “इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं प्रक्रिया में कोई अन्याय तो नहीं हुआ है उस पर नये सिरे से विचार की जरूरत है।” दो दिन बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने कालेज के पक्ष को एक बार फिर से सुना लेकिन 10 अगस्त को वो फिर से उसी पुराने नतीजे पर पहुंचा। सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के मुताबिक ट्रस्ट के एक मैनेजर बीपी यादव ने उसके बाद ओडीसा हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज आईएम कुदुसी से संपर्क किया और मामले को हल करने के लिए एक आपराधिक और षड़यंत्रकारी डील हुई। एफआईआर में कहा गया है कि कुदुसी की सलाह पर यादव ने अपनी याचिका को सुप्रीम कोर्ट से वापस ले लिया और फिर उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली। 25 अगस्त को हाईकोर्ट ने बैंक गारंटी को भुनाने पर रोक लगा दी और कहा कि प्रवेशार्थी छात्रों की कौंसिलिंग से कालेज को नहीं रोका जा सकता है।

चार दिन बाद एमसीआई द्वारा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर स्पेशल लीव पेटिशन पर सुनवाई करते हुए मिश्रा के नेतृत्व वाली तीन जजों की बेंच ने अपने आदेश में बैंक गारंटी पर स्टे को बरकरार रखा और इलाहाबाद में दायर याचिका को खत्म कर दिया। उसके बाद ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में एक नयी याचिका दायर की। 18 सितंबर को जस्टिस मिश्रा के नेतृत्व वाली तीन सदस्यीय बेंच ने एक बार फिर स्टे को बरकरार रखा। दूसरी बार बेंच ने एमसीआई को 2018-19 के अकादमिक सत्र के लिए फिर से निरीक्षण करने का आदेश दिया। उसके अगले दिन सीबीआई ने अपनी एफआईआर को दर्ज किया। जिसमें हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज, दो मैनेजरों समेत छह लोगों का नाम दर्ज था। सीबीआई ने 21 सितंबर को आरोपियों में से पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया।  

चीफ जस्टिस की कोर्ट में सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों और उसकी पूरी पृष्ठभूमि पर बहुत कम बहस हुई या कहें कि न के बराबर बातचीत हुई। पूरा मामला इस पर केंद्रित कर दिया गया था कि कोर्ट के प्रशासनिक हेड के तौर पर सीजेआई के क्या अधिकार हैं। और इस पर हर कोई अपनी राय रख रहा था।

इस बीच कई और वकीलों ने अपना पक्ष रखा। और कई बार बेंच के जजों ने उसमें हस्तक्षेप किया और उसका जवाब भी दिया। लेकिन पूरे मामले को एक दूसरे तकनीकी पक्ष की ओर धकेल दिया गया। और जस्टिस मिश्रा को बेंच में होना चाहिए या नहीं इस पर कोई बात ही नहीं हुई। याचिकाकर्ता भूषण शोरगुल के बीच अपनी कोई सुनवाई न होते देख एक बार फिर उठे और उन्होंने कहा कि क्या जज मेरी बात सुने बगैर कोई आदेश जारी करने जा रहे हैं? जवाब आया लेकिन भूषण ने उसे बीच में ही काटकर फिर पूछा क्या बगैर मेरे पक्ष को सुने ही आप कोई आदेश पारित करने जा रहे हैं? उन्होंने इस बात को तेज आवाज में कहा और उसमें एक तरह की नाराजगी भी शामिल थी। इसके बाद उन्होंने कहा कि जो भी उनके लिए सुविधाजनक लगे जज वो आदेश पारित कर सकते हैं। इसके बाद कोर्टरूम में अफरातफरी मच गयी। और फिर एकाएक कोर्ट का बहिष्कार कर भूषण कोर्टरूम से बाहर चले गए।

रिपोर्टर्स उनके पीछे भागे और फिर वापस आ गए। इस बीच सुनवाई जारी रही। गोपाल सिंह नाम के एक वकील ने सुझाव दिया कि मामले की प्रेस में रिपोर्टिंग पर तुरंत रोक लगायी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रेस को इसे नहीं छापने देना चाहिए। कुछ टीवी रिपोर्टर फिर बाहर भागे। जैसे ही जस्टिस मिश्रा ने प्रेस की स्वतंत्रता का पक्ष लिया वो भीतर आ गए।

उसके तुरंत बाद सीजेआई ने आदेश पारित किया। ये तीन हिस्सों में था। पहला- जस्टिस मिश्रा ने कहा कि सीजेआई रोस्टर का मालिक है। कुछ देर सांस थामने के बाद दूसरा हिस्सा- कोई भी आदेश जो सीजेआई के प्रशासनिक अधिकार के खिलाफ जाता है जैसा कि एक पिछले दिन चलमेश्वर द्वारा दिया गया है, वो अपने आप खारिज हो जाएगा। तीसरा- बेंच के दूसरे सदस्य अरुण मिश्रा से संपर्क करने के बाद जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि सीजेएआर और जायसवाल की याचिकाओं पर सीजेआई द्वारा गठित एक नई बेंच दो सप्ताह में सुनवाई करेगी। सुनवाई के दौरान किसी ने बेंच से पूछा कि क्या वो याचिकाकर्ता के पक्ष को नहीं सुनेंगे। जस्टिस मिश्रा ने मुस्करा कर जवाब देते हुए कहा कि “ओह, लेकिन वो तो बहिष्कार कर चले गए हैं।”

                                (करावां से साभार)






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