यशवंत सिन्हा ने गिनाई मोदी सरकार की नाकामियां,नेताओं को पत्र लिखकर कहा-देश हित में उठाइये आवाज

विशेष , , मंगलवार , 17-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपनी पार्टी की केंद्र सरकार पर देश को रसातल में ले जाने का आरोप लगाते हुए पार्टी के लोगों से चुप्पी तोड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि खामोश रहना देश के प्रति अपकार होगा। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख के तौर पर प्रकाशित अपने पत्र में उन्होंने तमाम मोर्चों पर केंद्र सरकार की नाकामियां गिनाईं हैं। बीजेपी नेताओं और सांसदों को संबोधित इस पत्र में रेप जैसे अपराधों के आम हो जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सख्त कार्रवाई के बजाय हम रेपिस्टों के समर्थक बन गए हैं। इन जघन्य अपराधों के बहुत से मामलों में तो हमारे ही लोग शामिल हैं।–

हम सभी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत के लिए बहुत कठिन परिश्रम किए। हममें से कुछ यूपीए सरकार के शासन के खिलाफ संसद के भीतर और बाहर तब से संघर्ष कर रहे थे जब वो 2004 में सत्ता में आयी। जबकि कुछ दूसरे अपने-अपने राज्यों में सरकार में होने का फल लूट रहे थे। हम 2014 के नतीजे देखकर बहुत खुश थे और इस बात की अपेक्षा कर रहे थे कि ये अभूतपूर्व जीत देश के इतिहास में एक नये और शानदार अध्याय की शुरूआत करेगी। हमने प्रधानमंत्री और उनकी टीम का पूरे विश्वास के साथ समर्थन किया।

सरकार ने अब अपने तकरीबन चार साल पूरे कर लिए हैं। इस दौरान वो पांच बजट पेश कर चुकी है। और नतीजे दिखाने के लिए अपने पास मौजूद सभी अवसरों का वो इस्तेमाल कर चुकी है। लेकिन आखिर में लगता है कि हम अपने रास्ते से भटक गए और हमने मतदाताओं का विश्वास खो दिया।

देश के पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि दुनिया की सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के सरकार के दावे के बावजूद देश की आर्थिक स्थिति भयावह है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बैंकों में नॉन-परफोर्मिंग असेट्स का ढेर नहीं लगाती है। हमने चार सालों में यही किया है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसान संकट में नहीं होते, युवा बेरोजगार नहीं होते, छोटे कारोबार नष्ट नहीं होते और बचत व निवेश का इस कदर बुरा हाल नहीं होता जैसा कि चार सालों में हुआ।  कितनी बुरी स्थिति है कि भ्रष्टाचार ने अपना घिनौना सिर फिर उठा लिया है। एक के बाद एक बैंक घोटाले जारी हैं। घोटालेबाज देश छोड़कर भाग निकल पा रहे हैं और सरकार बेबस सी मूकदर्शक बनी हुई है।

कठुआ और उन्नाव कांड को लेकर दुनियाभर में किरकिरी झेल रही मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी की भूमिका पर यशवंत सिन्हा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि महिलाएं आज जितनी असुरक्षित कभी नहीं थीं। आए दिन बलात्कार हो रहे हैं और हम उनक खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय उनके हिमायती हो गए हैं। इन जघन्य अपराधों के बहुत से मामलों में तो हमारे अपने ही लोग शामिल हैं। अल्पसंख्यक अलग-थलग कर दिए गए हैं। सबसे बुरी बात यह कि हमारे समाज के कमजोर तबके अनुसूचित जातियां-जनजातियां अभूतपूर्व उत्पीड़न और गैरबराबरी झेलते हुए निराश्रित हैं और उनके संविधान प्रदत्त गारंटी संकट में हैं।

सिन्हा ने प्रधानमंत्री के नियमित विदेशी दौरों और विदेशी डिगेनेटरीज की पसंद-नापसंद की परवाह किए बिना उनकी झप्पी लेने का मखौल बनाते हुए उन्होंने कहा कि विदेश नीति पूरी तरह सारहीन और पड़ोस तक में दयनीय ढंग से नाकाम होकर रह गई है। चीन हमारे हितों को रौंद रहा है। पाकिस्तान के खिलाफ हमारे बहादुर जवानों की जोशीली सर्जिकल स्ट्राइक को व्यर्थ गंवा दिया गया। पाकिस्तान भारत में निरंतर आतंक का एक्सपोर्ट कर रहा है और हम असहाय बने देख रहे हैं। जम्मू-कश्मीर जल रहा है, वाम अतिवाद अनियंत्रित है और आम आदमी अभूतपूर्व ढंग से मुश्किलों का सामना कर रहा है।

मोदी-शाह युग में भाजपा में हाशिए पर पड़े यशवंत सिन्हा ने आरोप लगाया है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। दोस्त बताते हैं कि पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंगों तक में सांसदों को पहले की तरह अपनी राय रखने का मौका नहीं मिल पाता है। पार्टी की दूसरी बैठकों में भी संवाद हमेशा एकतरफा रहता है। वे बोलते हैं, आप सुनते हैं। प्रधानमंत्री के पास आपके लिए वक़्त नहीं है। पार्टी मुख्यालय कॉरपोरेट ऑफिस में तब्दील हो गया है जहां सीईओ से मिल पाना नामुमकिन है।

यशवंत सिन्हा के मुताबिक, इन चार सालों में सबसे बड़ा संकट हमारे लोकतंत्र पर गहराया है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को बेमानी व कलंकित किया गया है। संसद को मजाक की हद तक सीमित कर दिया गया है। हाल के बजट सत्र में संसद के हंगामे के दौरान उसे हल करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक बार भी विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक करना जरूरी नहीं समझा। तब (पीएम) दूसरों पर दोष मढ़ने के लिए उपवास पर बैठ गए। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बजट सत्र का पहला हिस्सा कभी इतना संक्षिप्त नहीं रहा था। अटल बिहारी वाजपेयी के दिनों से तुलना करुं जब हमें विपक्ष के साथ तालमेल बनाने और संसद की कार्यवाही सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश होते थे। स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव के साथ जिस भी नियम के मुताबिक विपक्ष चाहता था, बहसें होती थीं।

यशवंत सिन्हा ने कहा है कि हमारे लोकतांत्रिक इतिहास गाथा में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस अभूतपूर्व थी। इसने उस सड़ांध को साफ तौर से सामने ला दिया जिसे हमारे देश की उच्चतम न्यायिक संस्था को पीड़ित करने के लिए फैलने दिया गया था। जजों ने बार-बार साफ तौर से बताया कि हमारे देश में लोकतंत्र खतरे में है।

यशवंत सिन्हा ने लिखा कि आज की तारीख में अगर हमारी पार्टी का मकसद संचार माध्यमों खासकर मीडिया और सोशल मीडिया को नियंत्रित कर चुनाव जीतना भर रह गया है तो उस पर भी भारी खतरा है। मैं नहीं जानता कि अगले लोकसभा चुनाव में आप में से कितनों को टिकट मिलेगा। पुराने अनुभवों के आधार पर कहूं तो आधों को नहीं। टिकट मिलने पर आपके चुनाव जीत पाने की निष्पक्ष संभावनाएं बहुत दूर हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में  भाजपा को महज 31 फीसदी वोट मिले थे और 69 फीसदी वोट खिलाफ पड़े थे। इसलिए विपक्ष एकजुट हुआ तो आप कहीं के न रहोगे।

`डियर फ्रेंड, स्पीक अप` शीर्षक से यशवंत सिन्हा ने अपनी पार्टी की सरकार की वजह से देश के संकट को गिनाते हुए लिखा है कि देश आप से राष्ट्रहित में आवाज़ बुलंद करने की मांग कर रहा है। खुशी की बात है कि आखिर, पार्टी के अनुसूचित जाति के पांच सांसदों ने (अपने) समुदाय से किए गए वादे नहीं निभाने के लिए सरकार से अपनी निराशा का इजहार किया। उन्होंने अपील की कि उन तमाम मसलों पर जिनसे हमारा साबका पड़ रहा है, नेताओं के सामने खुलकर अपनी राय रखी जाए। दिलचस्प यह है कि नेताओं की जगह उन्होंने `बॉसेज`शब्द का इस्तेमाल कर पार्टी पर `कुछ लोगों` के कब्जे की तरफ भी इशारा किया। उन्होंने आगाह किया कि आपकी खामोशी देश का बड़ा अपकार करेगी।

भावी पीढ़ियां आपको कतई माफ नहीं करेंगी। आज जो सरकार में हैं और देश को रसातल में ले जा रहे हैं, उनसे जवाबदेही की मांग करना आपका अधिकार है। पार्टी हित से देश हित बड़ा है और किसी व्यक्ति के हित से पार्टी हित। आडवाणी जी और जोशी जी से खासतौर से प्रार्थना है कि वे राष्ट्रहित में स्टैंड लें और इस बात को सुनिश्चित करें कि अतुलनीय बलिदानों के जो मूल्य उन्होंने बनाए हैं उसे भावी पीढ़ियों के हाथों में सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए जरूरी कदम समय के भीतर उठाए जाएं।

यशवंत सिन्हा ने कहा कि बेशक कुछ मामूली उपलब्धियां भी हैं लेकिन बड़ी नाकामियों ने उन्हें धुंधला दिया है। मुझे उम्मीद है कि इस चिट्ठी में मैंने जो मसले उठाए हैं, उन्हें आप गंभीरता से तव्ज्जो देंगे। कृपया साहस कीजिए और आवाज़ उठाइए और लोकतंत्र व देश को बचाइए।

(इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित इस पत्र का अनुवाद पत्रकार धीरेश सैनी ने किया है।)




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