दलित चिंतक कंवल भारती पूछ रहे हैं... भीम आर्मी क्यों?

मुद्दा , , सोमवार , 29-05-2017


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कंवल भारती

(सहारनपुर की घटनाओं के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी को इस समय दो तरफ से घेरा जा रहा है। एक तरफ बीजेपी और आरएसएस जैसे संगठन हैं जो इसे नक्सली जैसा संगठन साबित करने कोशिश कर रहे हैं, ताकि इसका दमन आसान हो जाए। दूसरी तरफ बहुजन की राजनीति करने वालीं मायावती हैं जो भीम आर्मी को बीजेपी और आरएसएस का संगठन बताने की कोशिश कर रही हैं, ताकि उनके वोट बैंक में सेंध न लगे। लेकिन इसके अलावा भी कुछ शुभचिंताएं और कुछ सवाल हैं, जिन्हें पूछा जाना ज़रूरी है। इसी तीसरे पक्ष के तहत कंवल भारती ने भीम आर्मी को लेकर कुछ सवाल उठाए हैं, जिन्हें पढ़ा और समझा जाना ज़रूरी है।-  मॉडरेटर)

भीम आर्मी का पोस्टर

भीम आर्मी के पास क्या है?
अगर नेतृत्व परिपक्व नहीं है, तो वह जिस तेजी से उभरता है, उसी तेजी से कमजोर भी हो जाता है। भीम आर्मी क्यों? अवश्य ही यह नाम तमाम तरह की उन सेनाओं के अनुकरण में रखा गया है, जिन्हें आरएसएस और हिन्दू संगठन चला रहे हैं। वे धर्म के नाम पर इस तरह की सेनाएं चला सकते हैं। उनके पास संख्या बल है, सत्ता बल है और धन बल है। वे अपनी सेनाओं के लोगों को हर तरह की सहायता करते हैं। उनमें जो पूर्ण कालिक होते हैं, उन्हें जीवन-निर्वाह के लिए वेतन देते हैं, और उनको भरपूर राजनीतिक संरक्षण देते हैं। अगर वे हिंसक गतिविधियों में पकड़े जाते हैं, तो वे उनकी कानूनी मदद भी करते हैं। किन्तु, भीम आर्मी के पास क्या है? उसके पास न संख्या बल है, न धन बल है और न सत्ता बल है। जिन मायावती के चन्द्रशेखर ने गुण गाये, उनने भी भीम आर्मी को नकार दिया।
भीम संगठन क्यों नहीं?

सवाल है कि भीम आर्मी बनाने की क्या जरूरत थी, भीम संगठन भी बनाया जा सकता था। जिन सेनाओं का चन्द्रशेखर अनुकरण कर रहे हैं, उनके सदस्यों की सांस्कृतिक ट्रेनिंग होती है, उनका ब्रेनवाश किया हुआ होता है। भीम आर्मी के किस सदस्य की सांस्कृतिक ट्रेनिंग हुई है?

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण'

'अपरिपक्व हैं चंद्रशेखर'

मुझे चन्द्रशेखर तक अपरिपक्व दिखाई देते हैं। वह अपने नाम के आगे रावणशब्द लगाये हुए हैं। उनकी अपरिपक्वता यहीं से शुरू होती है। जंतर-मंतर पर अपने भाषण में वे रावण के गुण गिना रहे थे। कह रहे थे कि रावण चरित्रवान था, शीलवान था, विद्वान था, यह था...वह था...इत्यादि। अगर रावण के मिथ को लेकर चलेंगे, तो राम की जबर्दस्त प्रतिक्रांति होगी, उसे आप रोक नहीं पाएंगे। महाराणा प्रताप के साथ यही तो हुआ। उसे सम्पूर्ण हिन्दू समाज का आदर्श बनाने की कार्ययोजना आरएसएस की है। सहारनपुर में महाराणा प्रताप की शोभायात्रा इसी कार्ययोजना का हिस्सा थी। और अब जोरशोर से उसे व्यापक बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है। आज बलरामपुर में खुद मुख्यमंत्री योगी ने महाराणाप्रताप को हिन्दू आदर्श बनाने की पुरजोर घोषणा की है।

प्रतिक्रांति का ख़तरा

याद कीजिये, जब महाराष्ट्र में नामदेव ढसाल अपने शुरूआती दौर में हनुमान को लेकर जोरशोर से तर्क करते थे, और मजाक उड़ाते थे, तो उनकी सभा में हजारों की संख्या में मौजूद दलित हँसते थे और तालियाँ बजाते थे। उसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि महाराष्ट्र में जिन हनुमान की कभी शोभायात्रा नहीं निकलती थी, वह गली गली में निकलने लगी थी। हनुमान के रूप में एक बड़ी प्रतिक्रांति हुई। नामदेव ढसाल का क्या हुआ, उसे बताने की जरूरत नहीं है, सब जानते हैं। इसलिए रावण के नाम से कोई भी राजनीति अपरिपक्व राजनीति के सिवा कुछ नहीं है।

रावण नहीं आंबेडकर

रावण को दलित आन्दोलन का हिस्सा मत बनाइए। अपनी लड़ाई का हिस्सा डा. आंबेडकर को बनाइए, जोतिबा फुले को बनाइए, उसके केन्द्र में बुद्ध को लाइए, कबीर को लाइए, रैदास को लाइए। इससे दलित आन्दोलन को प्रगतिशील धार मिलेगी।
आर्मी से हिंसा का बोध

आर्मी से शांति और अहिंसा का बोध नहीं होता है, बल्कि हिंसा का बोध होता है. लगता है जैसे हथियारों से लैस कोई गिरोह हो। जो जुल्म का बदला जुल्म और हत्या का बदला हत्या से लेना चाहता हो। क्या भीम आर्मी ऐसा ही काम करना चाहती है? मैं समझता हूँ, शायद ही चन्द्रशेखर और उनके साथी इसका जवाब हाँमें देंगे। फिर भीम आर्मी क्यों? भले ही भीम आर्मी की कोई हिंसक गतिविधि न हो, पर प्रतिक्रियावादी हिन्दुओं में यह हिंसक प्रतिक्रांति को और भी ज्यादा हवा देगा। इससे समानता स्थापित होने वाली नहीं है। 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए भीम आर्मी के प्रदर्शन की तस्वीर (फाइल)। साभार : गूगल

'दलित बनाम हिन्दू' RSS का एजेंडा

जंतरमंतर पर बेशक विशाल भीड़ थी। उसमें तमाम संगठनों के लोग थे, बहुत सारे दूसरे लोग भी थे, जो भीम आर्मी के सदस्य नहीं थे, बल्कि उनके प्रतिरोध को अपना समर्थन देने गए थे। मैंने चन्द्रशेखर का भाषण भी सुना था, जिसमें मुद्दों की कोई बात नहीं थी। उस पर उनका भाई हर पांच मिनट के बाद उनके कान में कुछ कह देता था, जो बहुत अशिष्ट लग रहा था। फिर माइक पर फोन नम्बर बोले जा रहे थे। यह पूरी तरह राजनीतिक अपरिपक्वता थी। वहाँ जिग्नेश मेवाणी और कन्हैया कुमार भी मौजूद थे, जो ज्यादा परिपक्व हैं। उन्होंने अपने आन्दोलन से न सिर्फ सरकार को झुकाया है, बल्कि देश भर में एक बड़ा प्रभाव भी छोड़ा है। किन्तु सहारनपुर की घटना को भीम आर्मी ने जिस अपरिपक्वता से दलित बनाम हिन्दू का मुद्दा बना दिया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। दलित बनाम हिन्दूऔर दलित बनाम मुस्लिमपूरी तरह आरएसएस का एजेंडा है, इसे दलितों को समझना होगा। इससे हिन्दूराष्ट्र की उसकी परिकल्पना को बल मिलेगा। यह लोकतंत्र के हित में नहीं है। दलित बनाम हिन्दू की लड़ाई को हमें सामाजिक न्याय की लड़ाईमें बदलना होगा। इस लड़ाई में हमें उन तमाम लोगों को, जो किसी भी वर्ग, धर्म या जाति के हों, अपने साथ लेना होगा, जो अत्याचार और विषमता के विरुद्ध लड़ रहे हैं। 
धर्मपरिवर्तन की धमकी का क्या मतलब?

भीम आर्मी की एक अपरिपक्वता यह भी है कि तुरंत ही धर्मपरिवर्तन की बात करने लगे। हमें न्याय नहीं मिला तो धर्मपरिवर्तन कर लेंगे’. यह क्या पागलपन है? धर्मपरिवर्तन क्या धमकी देकर किया जाता है? क्या इसका मतलब यह है कि न्याय मिल गया, तो धर्मपरिवर्तन नहीं करेंगे, हिन्दू बने रहेंगे? धर्म निजी मामला है, विचारों का मामला है। किसी को अगर धर्मपरिवर्तन करना है, तो करे, उसकी धमकी देने की क्या जरूरत है? चलो मान लिया कि न्याय नहीं मिला, और धर्मपरिवर्तन कर भी लिया, तो कितने दलित धर्मपरिवर्तन कर लेंगे? हजार, दस हजार? बस इससे ज्यादा तो नहीं। क्या कर लेंगे ये हजार-दस हजार धर्मान्तरित लोग? क्या पूरी यू.पी. के दलितों का धर्मपरिवर्तन करा दोगे? दलितों में ही एक संगठन भावाधसहै, जो दलितों के धर्म बदलने पर आरएसएस की तरह ही उनकी घर वापसी का कार्यक्रम चलाता है। 
भीम आर्मी के सदस्यों ने बाबासाहेब की कोई किताब नहीं पढ़ी है, वरना वे इस तरह अपरिपक्व राजनीति नहीं करते। 

(लेखक कंवल भारती की यह टिप्पणी उनके फेसबुक वॉल से ली गई है।)






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