धर्म के बाजार में विज्ञापन से क्या डरना?

धर्म-संस्कृति , , शुक्रवार , 22-09-2017


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चंद्रशेखर शर्मा

शारदीय नवरात्र पर्व गुरुवार से शुरु हो चुका है। इस दफा गरबा के नाम पर या उसके बहाने या उसकी आड़ में एक विज्ञापन विशेष खासा सरगर्म है। कंडोम का विज्ञापन है ये! इससे हमारी संस्कृति और पता नहीं क्या-क्या खतरे में आ गया है। कई ‘‘साधुमना’’ भयभीत हैं तो कई चिंतित और कुछ ऐसे भी हैं, जो इस विज्ञापन की वजह से संस्कृति के उड़ रहे मखौल से अत्यंत मुदित! मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना !

बहरहाल बरसों से सुनते आ रहे हैं कि गुजरात में गरबा यानी नवरात्र सम्पन्न होने के बाद बड़ी तादाद में गर्भपात के मामले सामने आते हैं। जाहिर सी बात है यदि होता होगा, तो ये सिलसिला दशहरा-दीपावली के बाद शुरू होता होगा। खास बात ये कि जब-जब भी ऐसा सुना है तो संदर्भित सूबा गुजरात ही रहा है और अभी जो तथाकथित विज्ञापन विशेष सरगर्म है, उसका मजमून भी गुजराती भाषा में लिपिबद्ध है! तथाकथित इसलिए कि अपन ने इस विज्ञापन को सोशल मीडिया पर ही देखा है, जहां फोटोशॉप सहित अनेक प्रकार की खुराफातें और शरारतें संभव।

यदि ऐसा नहीं है और गुजरात में वो विज्ञापन लगा है तो क्यों न इसे वहां नवरात्र के बाद होने वाले ‘‘चलन विशेष’’ की पुष्टि माना जाए? फिर गरबे तो अब दूसरे सूबों में भी तकरीबन उसी उत्साह, जोश और शानो शौकत से विस्तार पा गए हैं। बिलकुल सम्भव है कि वहां का वो चलन विशेष भी इन सूबों में गरबों के साथ नत्थी हो चला आए या कौन जाने आ भी चुका हो। फिर विज्ञापन को भाषा बदलते और यहां आते क्या देर लगेगी? सो भयभीत, चिंतित और मुदित होने के साथ थोड़ा विचार भी हो जाए तो क्या बुरा है?

गुजरात में गरबा नृत्य

भक्ति और आराधना का फैशन शो

सबसे पहले तो ये कि विशुद्ध रूप से भक्ति और आराधना से जुड़े एक उत्सव में एक ऐसा विलास जुड़ गया है जो वर्जित और अस्वीकार्य होना चाहिए था। क्या कारण हैं कि भक्ति और आराधना का उत्सव पांडालों में नौ दिनी डांसिंग फैशन शो हो गया? दूसरी बात ये कि उसके बाद वाले चलन को आप नहीं रोक सकते तो उस चलन को सुरक्षित बनाने वाले उत्पाद के विज्ञापन पर मुंह फुलाना क्या है? क्या ऐसे मामलों में हम हमेशा आदिमानव और दुनिया की निगाह में हंसी के पात्र बने रहेंगे? सबसे बड़ी बात ये कि कोई विज्ञापन आपकी संस्कृति को परिभाषित करे या न करे अलबत्ता उसे जिस रूप में लिया जाता है, उससे लेने वालों की चेतना का पता जरूर लगता है। फिर भी यदि आप चाहते हैं कि ऐसे अवसर विशेष पर ऐसे विज्ञापन आईन्दा न आएं तो उन पर कानूनन प्रतिबंध लगाइए। अलबत्ता इससे नासूर छिप तो जाएगा, पर ठीक नहीं होगा। थोड़ा विचार करिएगा।






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