सत्ता और पूंजी की चाकरी कर रही है मुख्यधारा की मीडिया

सोशल मीडिया , , मंगलवार , 05-03-2019


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मदन कोथुनियां

लोकतांत्रिक देशों में लोकतंत्र का पैमाना उस देश का मीडिया तय करता है। जो देश क्रांति के दौर से गुजरकर लोकतंत्र की भूमिका में आये हैं व जिसने राजशाही खत्म करके जितना लंबा रास्ता तय किया है उसके अनुरूप लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती गईं। जैसे-जैसे लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हुईं वैसे-वैसे मीडिया भी परिपक्व होता गया। आज यूरोप के देशों में देखा जाए तो सरकारों की नीति या फैसले को लेकर मीडिया में खबरें आती हैं तो जनता सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतर जाती है। इससे यह साबित होता है कि जनता के बीच वहां के मीडिया की विश्वसनीयता काफी हद तक मजबूत है। भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में देखा जाए तो मीडिया सदा विश्वसनीयता के लिए जूझता रहा है। असल में यहां पर राजशाही के खिलाफ कोई बगावत नहीं हुई है। जनता जब निरंकुश राजशाही के खिलाफ उतरती है तो समझा जाना चाहिए कि जनता अपने अधिकार समझने लग गई है और बगावत करके नई व्यवस्था स्थापित करने की तरफ आगे बढ़ रही है। भारत में राजशाही के खिलाफ जनता नहीं उतरी बल्कि राजशाही को या तो विदेशी आक्रमणकारियों ने हराकर अपनी राजशाही कायम की या विदेशियों ने अपनी ताकत के बल पर संधियों और समझौतों से अधीनता स्वीकार करवाई।

अंग्रेजी काल मे मीडिया का महत्व उभरकर भारतीयों के सामने आया था। लेकिन उस समय वर्ण व्यवस्था से पीड़ित समाज में ब्राह्मणों के पास ही शिक्षा का एकाधिकार था इसलिये मीडिया पर कब्जा इसी वर्ग का हो गया। वर्ण व्यवस्था के शीर्ष वर्गों ने बाकी वर्गों के सामने सारे कष्टों के जनक के रूप में अंग्रेजों को प्रस्तुत कर दिया और अंग्रेजों को भगाकर सत्ता हड़पना ही एकमात्र उद्देश्य तय कर दिया। आजादी के आंदोलन का समग्र रूप से विश्लेषण किया जाये तो मीडिया की असल भूमिका समझ में आ जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब सत्ता का हस्तांतरण किया गया तो कांग्रेस के श्रेष्ठी वर्ग ने सत्ता पर कब्जा कर लिया और मीडिया जो श्रेष्ठी वर्ग के कब्जे में था वो सत्ता के साथ गठबंधन करने में कामयाब हो गया। वामपंथी, कांग्रेसी व आरएसएस रूपी ग्रुपों में बंटकर श्रेष्ठी वर्ग ने जो नूराकुश्ती सत्ता के लिए शुरू की उसी अनुरूप मीडिया भी इन तीन वर्गों में बंटकर इनके मुखौटे बनकर विचारधारा के प्रचार-प्रसार में लग गया। और अंग्रेजों के बाद हासिल आजादी से जो सपने जनता को दिखाए गए वो धूमिल होते गए।

दुनिया से जैसे-जैसे वामपंथी देश पूंजीवाद की तरफ लौटने लगे उसी अनुरूप भारत मे भी वामपंथी विचारधारा खेत-खलिहानों,कारखानों से निकलकर चंद शीर्ष नेताओं के बंगलों तक सिमट गई और खेत खलिहान नक्सलवाद की रक्तरंजित क्रांति के मैदान बन गए। शुरुआत में कांग्रेसी विचारधारा मजबूत रही मगर 80के दशक के अंत मे समाजवादी विचारधारा की एक लहर सी उठी मगर अस्थायी सत्ता के कारण कांग्रेस समर्थक मीडिया ने जमकर बवाल काटा और फिर से कांग्रेस सत्ता में लौट आयी।इंदिरा गांधी के समय मीडिया सरकार का मुखौटा बनकर कार्य करने लगा।सिखों के खिलाफ किस तरह नफरत का जहर भारतीय मीडिया ने बोया वो उस दौर के अखबार देखने से पता चलता है।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया व एक सहानुभूति की लहर पैदा की जिसके बूते राजीव गांधी की सरकार भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटी थी। भारतीय मीडिया सदा सत्ता की गुलाम रही है और उसको जनता के बुनियादी मुद्दों से कभी सरोकार नहीं रहा है।यह पहला टर्निंग पॉइंट था जब मीडिया खुलकर कांग्रेस की भाषा बोल रहा था।

2002 में जब गुजरात के दंगे हुए तो भारतीय मीडिया ने कभी उसकी सच्चाई लोगों के सामने नहीं आने दी और जरूरी सूचनाएं छुपाकर सत्ता के लिए सराहनीय रिपोर्टिंग की। आरएसएस से सहानुभूति रखने वाले मीडिया ने काफी हद तक देशभर में हिंदुत्व की विचारधारा को स्थापित किया।उसके बाद कांग्रेस के पहले कार्यकाल में मीडिया ने सत्ता के साथ पींगे हांकी मगर दूसरे कार्यकाल में जब घोटालों की बाढ़ सी आ गई और लगा कि सत्ता फिसल जायेगी तो पलटी मारी और संघम शरणम गच्छामि का झोला पहनकर बाबा रामदेव,अन्ना हजारे आदि को आगे करके 2002से तैयार हिन्दू हृदय सम्राट को अलादीन का चिराग बताकर जनता के सामने पेश कर दिया। अभी बिखरे विपक्ष के बीच मीडिया को अहसास हो रहा है कि सत्ता में बदलाव नहीं होने जा रहा है इसलिए तमाम घोटालों,नाकामियों पर पर्दा डालकर मीडिया सत्ता का मुखौटा बनकर कार्य करता हुआ प्रतीत हो रहा है।

असल में भारतीय उपमहाद्वीप में निरक्षर और गरीब जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है। उसी का फायदा उठाते हुए सत्ता निरंकुश राजशाही की तरह व्यवहार करती है और मीडिया अपनी भूमिका भूलकर गुलामी व माल बंटवारे की बेईमान आदतों के कारण विश्वसनीयता खोता जा रहा है।ग्लोबल दुनिया व डिजिटल दुनिया के दौर में अब सोशल मीडिया रूपी हथियार जरूर आमजन के हाथ लगा है। लेकिन अभी वो दौर नहीं आया है कि जनता बगावत कर सके। भारतीय उपमहाद्वीप में सोशल मीडिया भी मुख्यधारा के मीडिया के पीछे चलता प्रतीत हो रहा है। भारत में अब पूंजीवादी घरानों के पास मीडिया है और पूंजी व मीडिया के माध्यम से सत्ता को हांकने की लगाम अपने हाथ में ले चुके है।ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी है कि मुख्यधारा का मीडिया जनता के बुनियादी मुद्दों को लेकर प्राइम टाइम करेगा। श्रेष्ठी वर्ग से व्यापारी वर्ग की तरफ मीडिया का माइग्रेशन जरूर हुआ है। लेकिन  जनता के मुद्दों पर मीडिया हमेशा की भांति खामोशी की चादर ओढ़कर चल रहा है।




   


 








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