मिशन नहीं दलाल और दरबारी पत्रकारिता

बहस-मुबाहिसा , , सोमवार , 15-05-2017


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उपेंद्र चौधरी

नई दिल्ली। भारत ही नहीं विश्व भर में पत्रकारिता का जन्म सत्ता और व्यवस्था की कमियों को उजागर करने के लिए हुई थी। भारत में आजादी की लड़ाईं के समय हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गुलाम भारत में पत्रकारिता क्रांति की ज्वाला बन कर धधकी। लेकिन स्वतंत्रता संघर्षों में निखरी भारतीय पत्रकारिता आजादी के बाद अपने मूल्यों को अक्षुण नहीं रख सकी। पत्रकारिता अब देश और समाज निर्माण में अपना योगदान करने के बजाय सत्ता के गलियारों से होते हुए दरबार तक पहुंच चुकी है।

समाचार पत्रों और पत्रकारों से उम्मीद

पत्रकारिता से व्यवस्था की छेद की तरफ ऊंगलियां उठाने की उम्मीद की जाती हैं, लेकिन इस समय पत्रकारिता उसी छेद में अंटने की कोशिश कर रही है। केन्द्रीय सत्ता , राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं में अधिकांश पत्रकार अंटने की कोशिश में लगे रहते हैं। मीडिया में व्यवस्था देने वाले पत्रकारों को इनमें से किसी व्यवस्था तंत्र में अंटने से कोई परहेज नहीं है। जिन्हें परहेज है, वे मौजूदा पत्रकारिता और व्यवस्था द्वारा किनारे फेंक दिए जा रहे हैं। लिहाजा सोशल मीडिया पर आड़ी-तिरछी रेखायें खूब चल रही हैं, इससे पत्रकारिता की धूल भी उड़ रही है और कभी-कभार व्यवस्था की चूलें भी हिल रही हैं।

सोशल मीडिया ने खोली मीडिया हाउसों की पोल

सोशल मीडिया खुला और उन्मुक्त मंच है। जहां खबर और विचार को बिना किसी बंधन और बाधा के दिया जा रहा है। यह अलग बात है कि अभी तक सोशल मीडिया की कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं है। मीडिया हाउस में जहां पत्रकारों को सशर्त कार्य करना पड़ता है वहीं सोशल मीडिया किसी भी शर्त से मुक्त है।  मीडिया हाउस में जहां ऐसी खबरों को भी देना पड़ता है जिससे आप सहमत नहीं होते हैं। कई खबरों की सत्यता भी संदिग्ध होती है। ऐसी खबरों को करते समय ढेर सारे पत्रकारों की लेखनी तड़पती - छटपटाती है। संस्थानों में सशर्त कार्य करने वाले पत्रकारों को सिर्फ पत्रकारिता का हुनर मालूम होता है। ये हुनरमंद लोग पत्रकारिता की नौकरी करते हैं, जीवन जीने के लिए कुछ या बहुत पैसे बनाते हैं। खबरों की सत्यता और विचारधारा की परख करने छूट उन्हें नहीं मिली है। मीडिया हाउस और संपादकों के हित को देखते हुए उन्हें खबरों को प्रकाशित करना या रोकना पड़ता है। सीधे शब्दों में कहें तो मीडिया हाउस और पत्रकार सत्य को उजागर करने के साथ सत्य को दबाने में भी लगे हैं।

मूल और मूल्य में विभाजित कला और पत्रकारिता

आज की पत्रकारिता का स्वरूप दो सतरों में विभाजित है। कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे विमल रॉय, वी शांताराम, गुरुदत्त ,राजकपूर, ऋत्विक घटक, आमिर खान आदि फिल्मकारों की परंपरा से बाहर के भी फिल्मकार हैं, जिन्हें फिल्म बनाने का हुनर तो खूब मालूम है, लेकिन उस हुनर का इस्तेमाल वो पैसे बनाने में करते हैं, उन्हें जीवन के ऐसे पक्ष दृश्यात्मक रूप से पकड़ में आते ही नहीं, जो सही मायने में जीवन को गहरे से प्रभावित कर रहे होते हैं। संस्थानों में होने वाली पत्रकारिता के पत्रकारों के हुनर कुछ कुछ वैसा ही होता है, जैसे राजा रविवर्मा, अवनींदनाथ टैगोर, रजा, नंदलाल बोस, जहांगीर सबवाला, अमृता शेरगिल, वॉन गॉग, लियोनार्दो द विंची, माइकल एंजेलो की परंपरा के बाहर के चित्रकार भी चित्रकारिता तो करते हैं, लेकिन जिनकी चित्रकारिता में जिंदगी की कोई गहरी जुंबिश नहीं दिखायी पड़ती है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रेमचंद, निराला, फकीर मोहन सेनापति, पन्नालाल पटेल, शरतचंद आदि से अलग मिजाज के साहित्यकार भी साहित्य तो रचते हैं, लेकिन जिनमें जीवन की गहरी प्रासंगिता नहीं होती। यह अलग बात है कि जीवन की प्रासंगिकता से जुड़े फिल्म, साहित्य, कला आदि के वाहकों ने अपने जीवन में बड़े ही दुख-पीड़ा झेले हैं। उसकी वजह भी यही थी कि वो अपने जीवनकाल में जनपक्ष में खड़े रहे, उनके जीवन के बाद भी उनकी रचनायें व्यवस्था को आज भी चेताती रहती हैं, लोगों को समझाती रहती हैं। उनकी रचना बड़े-बड़े बदलाव के कारण बनती रही हैं। आज हम प्रगति के जिस चरण में जहां भी खड़े हैं, उसे लाने में उनकी बड़ी भूमिका है। उनकी रचनायें बड़ी-बड़ी व्यवस्था से लोहा लेती रहीं। व्यवस्था से लोहा लेने वाली उन रचनाधर्मिता को व्यवस्था फूटी आंखों नहीं देखना चाहती, क्योंकि ये व्यवस्था से बदलाव की मांग करती हैं, व्यवस्था पर लोगों के पक्ष में खड़े होने का दबाव डालती है। पत्रकारिता की भूमिका भी ऐसी ही रही है। इस संदर्भ में जब हम पत्रकारिता की बात करते हैं, तो उसमें वो पत्रकारिता भी शामिल होती है, जिसे लेकर शहीद-ए-आजम भगत सिंह को घोर दुख है और उसमें वो पत्रकारिता भी शामिल है, जिसकी अपेक्षा करते हुए भगत सिंह दुख जताते हैं।

शहीद – ए -आजम भगत सिंह की नजर में पत्रकारिता

सन् 1928 में भगत सिंह के पत्रकारिता के उद्देश्यों और चलन को बखूबी रेखांकित किया था। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।  अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएं हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आंसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि भारत का बनेगा क्या ?’’

पत्रकारिता और सोशल मीडिया  

बताने की जरूरत नहीं कि भगत सिंह के जमाने में पत्रकारिता सिर्फ अखबारों के जरिये हो रही थी, आज रेडियो, टेलीविजन और साइबर मीडिया में भी हो रही है। शहीद-ए-आजम के जमाने में यह हाल तब था, जब पत्रकारिता का हुनर सिखाने वाला कोई संस्थान नहीं होता था। ऐसी धारणा जानबूझकर फैलायी जाती रही है कि समाज के संवेदनशील रचनात्मक लोग पत्रकारिता में आते थे। जमाने में साइबर मीडिया का रूप थोड़ा अलग है। यहां स्वतंत्रता भी है, अराजकता भी है और संस्थागत चरित्र भी है। जिन्हें पत्रकारिता का सिर्फ हुनर मालूम है, वो इस न्यू मीडिया में खबरें बेचकर न्यूज का अच्छा कारोबार कर रहे हैं। जिनके अंदर पत्रकारिता है, वो भी यहां अपनी बात कह रहे हैं। यहां इन दोनों से अलग सिर्फ अपनी अभिव्यक्ति को आकार देने वालों की संख्या बहुत बड़ी है, और वो भी कभी-कभी पत्रकार होने का भ्रम पाल लेते हैं। यानी साइबेर स्पेस पर पत्रकारिता करने वालों के लिए जबरदस्त स्पेस हासिल है और और गाली-गलौच करने वालों को यहां गली-चैराहे भी उपलब्ध हैं। अभिव्यक्ति के मामलों में यह सबका मंच है,एक लिहाज से अभिव्यक्ति का एक संपूर्ण लोकतांत्रिक मंच या जिन्हें भाषा नहीं आती,उनका भी मंच या जिन्हें दूसरों की भाषा चुराकर कट-पेस्ट करके भाषा की छद्म बहादुरी करते हुए पत्रकारिता करने का भ्रम पालना है,उनका भी मंच या जो किसी के कंटेंट और भाषा से इत्तेफाक रखते हैं,तो शेयर करते हुए उनका भी मंच। मगर पत्रकारिता वो नहीं, जिसे भूलवश समझा जा रहा है।

यही कारण है कि कला, साहित्य और पत्रकारिता कई बार पूरे जनसमूह को वैसा ही दिखने लगता है, जैसा देखने को वो मूलतः विरोधी होता है। क्योंकि पत्रकारिता, कला और साहित्य के चरित्र मूलतः जनवादी होते हैं और जनवादिता से किसी भी व्यवस्था को सबसे बड़ा खतरा महसूस होता है। इसलिए व्यवस्था इनके नकली नायकों, प्रतीकों को रंग-रोगन करके और सरकारी प्रचारतंत्र के जरिये उन्हें बार-बार लोगों को परोसकर पत्रकारिता, कला और साहित्य को अपने मूल रंग से अलग कर देती है। इसीलिए जब कभी ये क्षेत्र जनवादिता के खिलाफ दिखता हो, तो मान लेना चाहिए कि व्यवस्था उसे अपने मनमाफिक नचाने की कोशिश कर रही है। 

सोशल मीडिया पर सिटीजन जर्नलिस्ट सूचनाओं से लैस तो हो सकता है,संभव है कि उसके पास जो जानकारियां है, वह राष्ट्रीय पत्रकारिता करने वालों के पास भी नहीं हो। संभव है कि समस्याओं से दो-चार होने का अनुभव जो नागरिक पत्रकारों के पास हो, वह क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पत्रकारों के पास नहीं हो। लेकिन यह बात बहुत हद सही है कि न तो वह पत्रकारिता कर रहा होता है और न वह खालिस पत्रकार होता है। क्योंकि उसकी पत्रकारिता से दंगे भड़क सकते हैं। किसी की मानहानि की जा सकती है। बिना सुबूत यहां कुछ भी उड़ाया जा सकता है। निस्संदेह वह पत्रकारिता को सहायता करने वाली नागरिक पत्रकारिता ही होती है। इस भूमिका में वह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है और सोशल मीडिया इसी संदर्भ में बहुत ज्यादा प्रासंगिक भी हो जाता है। लेकिन यह मान लेना कि वहां पत्रकारिता का मूल तेवर और मौलिक चरित्र मौजूद होता है, बहुत बड़ी भूल होगी।

 

 






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