हँसो मत! हम सब के भीतर एक ‘शर्मा’ बैठा हुआ है

खरी बात , , बृहस्पतिवार , 01-06-2017


judge-mahesh-chandra-sharma-peacock-cow

हिमांशु कुमार

राजस्थान के जज शर्मा जी ने कहा कि मोर सारी ज़िन्दगी ब्रह्मचारी रहता है, वह रोता है तो उसके आंसू मोरनी पी लेती है और गर्भवती हो जाती है, इसलिए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया है, और भारत सरकार द्वारा अब गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए और उसे मारने वाले को आजीवन कारवास का दंड देना चाहिए।

हम सब लोग शर्मा जी की खिल्ली उड़ा रहे हैं,
लेकिन क्या हम सभी लोग शर्मा जी जैसे ही दंत कथाओं और अंधविश्वास को जानकारी मान कर नहीं जी रहे हैं ?

भारतीय समाज में कई तरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं।


मैं इंग्लैण्ड में पढ़े दिल्ली के एक बड़े हस्पताल में प्रेक्टिस करने वाले ऐसे एक डॉक्टर को जानता हूँ जो सच में मानता है  कि उसका बेटा गुरुओं के आशीर्वाद से हुआ है,

कुछ सालों पहले तक मैं भी मानता था कि मंगलवार को व्रत रखने से मेरे सभी काम बन जायेंगे,

बच्चा रोता है तो ज्यादातर घरों में उसकी नज़र उतारी जाती है,

हम मोर वाली कहानी पर ही यकीन नहीं करते बल्कि नाग की मणी, छींकने पर काम बिगड़ जाना, बिल्ली का रास्ता काट जाना, दुआओं, बददुआओं, स्वर्ग नरक, पूजा नमाज़, इन सब पर यकीन रखते हैं,

अब मैं खुद को अपने आसपास अकेला पाता हूँ,

कुछ महीने पहले जब मेरे पिता की मृत्यु हुई तो मैंने घोषणा करी कि कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं होगा, पापा के शव को मेडिकल कालेज को दान दिया जायेगा,
तो मेरी बड़ी बहन ने कहा कि बिना अंतिम संस्कार के आत्मा की मुक्ति कैसे होगी?
मैंने कहा कि आत्मा और रूह कुछ नहीं होती.

आप असल में खुद कुछ भी नहीं सोचते,

आप सोच की परम्परा की अगली कड़ी बन जाते है,

और हजारों सालों तक समाज एक ही ढर्रे पर चलता रहता है,

औरतों के अधिकारों के बारे में, दूसरे धर्म वालों के बारे में, जाति के बारे में जैसे आपके पिताजी सोचते थे, वैसे ही आप भी सोचने लगते हैं,

 

भारतीय समाज में कई तरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं।


इसलिए धर्म के बारे में, संस्कृति के बारे में, मान्यताओं के बारे में आप कुछ नया नहीं सोच पाते,

इसका नतीजा यह होता है कि सारी दुनिया उसी पुरानी सोच में फंसी रह जाती है,


आप के कपड़े बदल जाते हैं, मकान बनाने का तरीका बदल जाता है, गाड़ी बदल जाती है लेकिन सोच नहीं बदलती,

आप अपनी हालात के लिए किस्मत को, अपने पुराने कर्मों को या ईश्वर को ज़िम्मेदार मानते रहते हैं,

राजस्थान के जस्टिस शर्मा भारतीय समाज का ही प्रतिनिधित्व करते हैं,

हमारा मुख्यधारा का समाज शर्मा जैसा ही सोचता है,

अगर कोई इंसान समाज से अलग तरह से सोचने की कोशिश करता है तो उसे गालियाँ, अपमान और अलगाव मिलता है,

इसलिए भी डर के मारे लोग समाज की सोच से अलग सोचने की हिम्मत नहीं करते हैं,

समाज में इज्ज़त वाला बन के रहने के लिए भी हम आसपास के समाज जैसा बन कर रहते हैं,

जो इंसान ईश्वर या अल्लाह की महानता के बड़े बड़े दावे करता है उसे समाज में बड़ी इज्ज़त मिलती है,

लेकिन जो कहता है कि इंसान की बदहाली के लिए समाज की व्यवस्था ज़िम्मेदार है और इस समाज को अच्छा बनाने का काम भी इंसान को ही करना पड़ेगा, वह गाली खाता है,

इसलिए राजस्थान के जज शर्मा का मज़ाक उड़ाने से पहले अपनी हालत पर भी नज़र डाल लीजिये एक बार,  

आप सब के भीतर भी एक शर्मा बैठा हुआ है।






Leave your comment