कंवल भारती की कलम से सहारनपुर का सच

बहस-मुबाहिसा , , मंगलवार , 16-05-2017


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कंवल भारती

नोट-ये लेख जाने-माने बुद्धिजीवी और दलित चिंतक कंवल भारती की फेसबुक दीवाल से लिया गया है। यह पोस्ट सहारनपुर घटना और उसके बाद उस पर समाज में होने वाली प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित है। दो टुकड़ों में बंटे इस लेख का पहला हिस्सा यहां दिया जा रहा है।......

मुरादाबाद। मुझे गर्मी बहुत ज्यादा लगती है। इसलिए कोशिश यही करता हूं कि दोपहर में घर में ही रहूं और बहुत कम बाहर निकलूं। पर कुछ रिश्ते-नाते ऐसे होते हैं, जिन्हें निभाना ही पड़ता है। फिर गर्मी नहीं देखी जाती और जिस्म को झुलसाने वाली तेज धूप में भी घर से निकलना ही पड़ता है। सुबह फोन आया कि रमेश गुप्ता जी का ऐक्सीडेंट हो गया है, और मुरादाबाद के विवेकानंद अस्पताल में भर्ती हैं। यह बहुत ही दुखद समाचार था। उनसे पारिवारिक सम्बन्ध हैं। सुख-दुःख में हम हमेशा एक-दूसरे के काम आये हैं। उनकी बेटी का फोन था, वह फोन पर ही रो रही थी— ‘अंकल जी, सिर और पैर में बहुत चोट आई है। यहां के डाक्टर कह रहे हैं, टांग काटनी पड़ेगी। एक डाक्टर की सलाह पर हम पापा को मुरादाबाद ले आये हैं। यहां डाक्टरों ने कहा है कि कोशिश करेंगे कि टांग काटने की जरूरत नहीं पड़े। आप जल्दी आ जाइये, पापा आपको याद कर रहे हैं।मैंने उसे फोन पर ढाढस बंधाया और कहा कि बस मैं घर से निकल रहा हूं। मैंने घड़ी देखी, ग्यारह बजे थे। शीघ्र ही मैंने कपड़े पहिने, ऐटीएम के साथ कुछ रुपये जेब में डाले और रिक्शा करके रेलवे स्टेशन पहुंचा, उत्तराखंड सम्पर्क क्रांति का समय था, पर वह एक घंटा लेट थी, सो बाहर आया, संयोग से लोहिया ग्रामीण सेवा की बस मिल गयी, जो अखिलेश सरकार ने शुरू की थी। खैर मैं मुरादाबाद पहुंचा और वहां से बैटरी रिक्शे से विवेकानन्द। जब मैं प्राइवेट वार्ड में उनके कमरे में दाखिल हुआ, तो एक बज चुका था। कमरे में तीन लोग पहले से ही मौजूद थे, जिन्हें मैं नहीं जानता था। गुप्ता जी के पैरों पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था, और सिर पर भी ड्रेसिंग थी, कुछ टांके आये थे। मैंने दुखी मन से गुप्ता जी को देखा, और बेंच पर बैठ गया। बातचीत में पता चला कि उनमें एक शुक्ला जी हैं, दूसरे एक माथुर साहेब थे, जो एलआईसी में काम करते थे, और तीसरे एक रिटायर्ड प्रिंसिपल ओपी सिंह थे। खैर, मैंने गुप्ता जी से एक्सीडेंट के बारे में जानकारी ली, जो उनके बेटे राहुल ने विस्तार से बताई। 

सहारनपुर पर चर्चा

कमरे में टीवी था, और संयोग से आजतकपर सहारनपुर की ख़बर चल रही थी। शब्बीरपुर गांव में दलितों के जले हुए घरों को दिखाया जा रहा था, जिसे देखकर मेरा खून खौल रहा था। पर उस माहौल में मैं कुछ कह नहीं सकता था। पर, मैंने देखा है, कि कुछ लोग किसी भी अवसर पर देश-जहान की बातें करने लगते हैं, भले ही वह अवसर गमी का हो। मैंने तो मौत के अवसर पर श्मशान पर भी लोगों को राजनीतिक बहस करते हुए देखा है। रमेश के बेटे ने कैंटीन से चाय मंगा ली थी, पर मैं महसूस कर रहा था, उनके चेहरों पर कोई शिकन नहीं पड़ी थी। वह बिल्कुल सहज थे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। वे सब आराम से चाय पी रहे थे। पर वह चाय मेरे हलक के नीचे नहीं उतर रही थी, सो मैंने मना कर दिया, ‘बेटे! मैं चाय नहीं पीता हूं, मेरी चाय अपने पापा को दे दो।रमेश ने मेरी स्थिति को भांप लिया था। उसने कहा, ‘यह ठीक नहीं हुआ है। 
क्या ठीक नहीं हुआ, भाई साहेब!ओपी सिंह ने पूछा।
यही जो सहारनपुर में ठाकुरों ने किया।रमेश ने जवाब दिया। 

अरे रमेश भाई, कैसी बात कर रहे हैं? आपको पूरी बात नहीं मालूम। चमारों ने महाराणा प्रताप की शोभायात्रा पर पत्थर फेंके थे, और एक ठाकुर की हत्या कर दी थी। तब क्या ठाकुर उनसे पिटकर घर बैठ जाते?’

शुक्ला जी बोले, ‘घर क्यों बैठ जाते? ठीक किया, सालों को सबक सिखा दिया।

पंडित जी की खुल गयी कलई

बिल्कुल, पंडित जी, सालों के पर निकल आये थे। मायावती के आदमी थे। ठाकुर-वामनों को गालियां देते थे। बहुत पैसे कमा लिए थे। हमारी बराबरी करने लगे थे। अब सबकी अक्ल ठीक हो गयी।यह ठाकुर ओपी सिंह थे।
रमेश से बोला नहीं जा रहा था, फिर भी उसने कहा, ‘अगर उन्होंने तुम्हें सबक सिखा दिया, तब क्या होगा?’
ठाकुर ओपी सिंह बोले, ‘अरे उनकी ऐसी-तैसी। किसी को हाथ तो लगा कर दिखाएं? कोई भी जिंदा नहीं बचेगा।
वे मुझे सवर्ण समझ रहे थे और मैं भी नहीं चाहता था कि वे मेरी जाति जान कर बनावटी भाषा में किन्तु-परन्तु करें। मैं उनके भीतर के हिन्दूवाद को पूरी तरह बाहर निकालना चाहता था। इसलिए, मैंने रमेश को इशारा कर दिया था कि वह बीच में न बोले। 
कुछ देर के बाद माथुर बोले, ‘यह आरक्षण खत्म होना चाहिए। इसने देश का बहुत नुक्सान किया है। कम योग्यता वाले नौकरी कर रहे हैं, और योग्य लोग सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे हैं।
अब मैं अपना हस्तक्षेप जरूरी समझ रहा था। रमेश ने मुझे इशारे से मना किया, पर मैंने उसकी बात नहीं मानी। मैंने कहा, ‘माथुर साहब, आप बहुत सही बात बोल रहे हैं। आरक्षण तो खत्म होना ही चाहिए, हर विभाग में जब सवर्ण दिखाई देंगे, तभी तो रामराज आएगा। इन लोगों ने तो रामराज का रास्ता ही रोक दिया है। अब देखो न, दलितों को डाक्टर बनाया, तो उनसे आपरेशन करना नहीं आया। पेट में ही तौलिया और कैंची छोड़ दिए। उन्हें रक्षा में भर्ती किया, तो पाकिस्तान को गोपनीय दस्तावेज़ बेच दिए। पुलिस में भर्ती किया, तो शब्बीरपुर में अपने सामने खड़े होकर आग लगवा दी। सचमुच ये नौकरी के काबिल नहीं हैं, इनको आरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
मेरी बात सुनकर माथुर ही नहीं, ठाकुर, शुक्ला भी घूम गए। डाक्टरों के द्वारा आपरेशन तौलिया और कैंची छोड़ने और रक्षा दस्तावेज़ बेचने की बात पर तो उन्हें सांप सूंघ गया, पर शब्बीरपुर में पुलिस ने सामने खड़े होकर आग लगवाई, इस बात पर वे भड़क गए।

जैसे सांप सूंघ गया हो

कैसे कह सकते हैं, आप कि पुलिस ने आग लगवाई है?’ ओपी सिंह ने आंखें तरेर कर मुझसे पूछा।
मैंने कहा, ‘क्या आप वहां मौजूद थे, जब ठाकुर आग लगा रहे थे?’
उसने कहा, ‘नहीं.
फिर तुम कैसे पुलिस को क्लीन चिट दे रहे हो?’

क्या आप उस वक्त थे?’ उसने सवाल किया।
मैंने कहा, ‘नहीं। 
फिर आप कैसे पुलिस पर आरोप लगा सकते हैं?’

मैंने कहा, ‘इसलिए कि यह कामन सेन्स है कि हर शोभायात्रा और जुलूस में पुलिस साथ-साथ चलती है, चाहे वह किसी भी धर्म-समुदाय का हो। जब ठाकुर दलितों के घरों में आग लगा रहे थे, तो पुलिस अधिकारी मौजूद थे। पर उन्होंने उन्हें आग लगाने से नहीं रोका, क्योंकि वे सवर्ण थे, पुलिस में आने का उनका पुश्तैनी हक है। 
माथुर की तो बोलती बंद हो गयी, और शुक्ला दांत भींचने लगे थे। पर मैं देख रहा था कि ठाकुर ओपी सिंह का मुंह तमतमा रहा था। 
मैंने अपनी बात जारी रखी, और ओपी सिंह को ही संबोधित करके कहा, ‘सिंह साहब, शब्बीरपुर के जाटव ठाकुरों के खेतों में ही काम करते थे। क्या यह संभव है कि वे अपने मालिकों के जुलूस पर पथराव करेंगे, जिनकी रोजी-रोटी उन पर निर्भर करती है?’ 
ठाकुर की बिल्लोरी आंखें निस्तेज हो गयीं थीं। मैंने कहा, ‘ठाकुर साहब, यह आरक्षण ही उन्हें आपका गुलाम बनाये हुए है, आप इसे खत्म करा ही दो, फिर देखना इस देश में क्या होता है?’ 
क्या हो जायेगा?’ उसने हैरानी से पूछा।

जब चेहरे पड़ गए पीले

यह तो मैं नहीं जानता, कुछ तो होगा ही।मैंने आगे कहा, ‘जो चीज उन्हें आरक्षण ने दी है, वह उनका आर्थिक विकास है। क्या आपको नहीं पता कि उनके इसी आर्थिक विकास को नष्ट करने और उनको जमीन पर लाने के लिए, शब्बीरपुर में जाटवों के घरों को जलाया गया। अब वे सड़क पर हैं, ऊपर खुला आसमान है। न खाने को कुछ है और न ओढ़ने को। आपकी मनचाही हो गयी। आपकी खुशी भी वाजिब है। वे हिन्दू तो हैं नहीं, जो आप उनकी चिंता करें। मरने दो।

उनके चेहरे पीले पड़ गए थे। मैंने घड़ी में देखा, पांच बज गए थे। वे तो लोकल थे, पर मुझे बस पकड़ कर रामपुर आना था। सो, मैंने रमेश से कहा, ‘यार चलता हूं। कल मैं तीन दिन के लिए बाहर जा रहा हूं। लौटकर आता हूं।यह कहकर मैं उन सबसे विदा लेकर जैसे ही चलने के लिए खड़ा हुआ, कामरेड ब्रह्मस्वरूप जी आ गए, जिनकी रमेश से भी दोस्ती थी। मुझे देखकर बोले, ‘कहां चले?’ मुझे मजबूरन कुछ देर और बैठना पड़ा।

(क्रमशः आगे जारी)






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