खट्टर काका से ‘फेंकन फ्रॉम फरीदाबाद’ की गुप्तगू

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 16-07-2017


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श्याम आनंद झा

खट्टर काका को आप जानते होंगे। उमर ज्यादा हो गई है, थोड़े से सिनिकल हो गए हैं।

बगल के गांव से जवारी भोज का न्यौता आया था। सोचा भोज के लिए खट्टर काका से अच्छा दूसरा साथी कौन मिल सकता है! 

दरवाजे के बाहर, खुले खलिहान में खट्टर काका खाली देह खटिया पर बैठे थे। नीचे धोती, कंधे पर गमछा। और पैर के नीचे वही खड़पा। खटिया पर एक झोरी और बगल में एक सोटा रखा हुआ था। यह देख कर ख़ुशी हुई कि खट्टर काका में ज्यादा बदलाव नहीं आया था। नजदीक आने पर देखा कि खटिया के आगे छोटी सी मेज लगी थी, खट्टर काका स्टील के प्लेट से अचार और प्याज मिश्रित भूजे हुए चूड़ा के साथ मछली फ्राई फांक रहे थे, 

खट्टर काका का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए, मैंने गला साफ़ किया। परन्तु, टेंगरा मछली फ्राई के साथ कच्चा प्याज के सामने में क्या मेरी हैसियत और क्या मेरी बिसात ! अभी खट्टर काका का सारा ध्यान लौंगिया मिर्च पर था कि सही अनुपात में उसे कैसे काटा जाय। 

प्रतीकात्मक चित्र।

‘खट्टर काका, परनाम।”

खट्टर काका ने पीली वाली कबई मछली के बीच का काँटा निकालते हुए मेरी तरफ़ ऐसे देखा और जैसे उन्होंने सोते हुए किसी अनजान इन्सान को देख लिया हो।

‘काका की आँख कमजोर हो गई हो’, यह सोचकर, मैंने कहा, “ हम तिरलोचन। पहचाने??

“के तिरलोचन?”

“तिरलोचन फ्रॉम फरीदाबाद!”

खट्टर काका की कबई मछली के स्वाद के आनंद में बंद हो चुकी आँखें, बंद ही रहीं, जैसे वह अन्दर ही अंदर कुछ ढूंढ रहे हों। 

“फेंकना?”

खट्टर काका की स्मृति दुरुस्त है। इस नाम से मुझे सिर्फ खट्टर काका बुलाते हैं।

“जी। बट नाउ तिरलोचन! नो मोर फेंकन!”

खट्टर काका की बंद आँखें खुलीं। लेकिन मेरे लिए नहीं, प्लेट में रखी तली हुई अद्भुत खुशबू बिखेरती विलुप्त प्राय इन मछलियों के लिए! 

“अंग्रेजी बोलने से इन्सान बदल नहीं जाता, फेंकन ! तुम देहाती का देहाती रह गया, समझे!”

“क्यों, कैसे?” मेरा शहरी मैं कसमशा उठा। 

“संस्कृत में जिन्हें काव्यों का ज्ञान नहीं होता उन्हें देहाती भुच्च कहा जाता है।” खट्टर काका ने प्याज के एक टुकडे को दांत से काटते हुए कहा। “सो तुम भी देहाती भुच्च हो क्योंकि काव्य के ज्ञान से तुम भी उसी तरह वंचित हो जिस तरह मछली के स्वाद से फरीदाबाद हरियाणा के लोग।” 

कोने में खड़ा धुला हुआ सिलवटा बता रहा था कि भांग पीने का कार्यक्रम हो चुका था। खट्टर काका तरंग में थे ही। 

“लेकिन इसमें काव्य चर्चा कहाँ से आ गई?” 

मैंने यह सोच कर दांव मारा कि भांग पीने वालों के लिए अपनी बातों का सूत्र पकड़ना उतना ही मुश्किल होता है जितना बहती नदी में तैरती मछली पकड़ना। 

“छंद का ज्ञान रखने वाला एक अबोध बालक भी बता सकता है कि तिरलोचन फ्रॉम फरीदाबाद से ज्यादा छंदयुक्त फेंकन फ्रॉम फरीदाबाद है।” 

प्रतीकात्मक चित्र।

भांग खट्टर काका ने पी रखी थी, लेकिन भक जैसे मेरा खुल गया हो। मैंने स्वीकृति में सर हिलाया और बात को बदलते हुए कुछ कहना ही चाह रहा था कि खट्टर काका ने कहा, “अपार्ट फ्रॉम दैट, यू हैव नो मैनर्स..” 

इसी साल खट्टर काका के बारे में दिल्ली के जन्तर-मंतर में धरना पर बैठे एक सज्जन ने बताया था कि खट्टर काका अब अपनी बात साबित करने के लिए संस्कृत नहीं अंग्रेजी बोलते हैं। 

“किसी के दरवाजे पर जाने से पहले फोन करना चाहिए कि ऐसे ही नथुने उठाकर घुस आना चाहिए?” खट्टर काका अति पर उतर आए थे। 

“फ़ोन? खट्टर काका आपके पास फ़ोन है? आपने रखना शुरू कर दिया? जिन हाथों में पहले अष्टावक्र गीता होती थी, हैं अब उसमें फ़ोन रहता है??? नारायण नारायण!!” मेरे भी हाथ कुछ लग गया मालूम हो रहा था। 

“तुम गदहा हो, इसका मतलब यह तो नहीं कि हम बन्दर हो जाएंगे ?” खट्टर काका मेरी आँखों में आँखे डाल कर बोल रहे थे। “इस गांव का पहला रेडियो मेरे पास था, और आज पहला फोर जी सिम मेरे पास है। “आई ऑलवेज हैव दि लेटेस्ट, स्टुपिड!” खट्टर काका एग्रीसिव हो रहे थे। 

तब तक किचन से काकी यह देखने बाहर निकल आईं कि कौन आया है। खट्टर काका ने काकी की ओर भर आँख देखते हुए कहा, “एनी वे ये देहातिगिरी छोड़ो और किसी के दरवाज़े पर जाने से पहले फ़ोन करो कि वह क्या कर रहा है, कि उसके पास समय है? ये बेवकूफों की तरह मुंह उठा कर सीधे गवांरों की तरह किसी के दरवाज़े पर सिर्फ लुच्चे लफंगे आते-जाते हैं।”

“खट्टर क्या कह रहे हैं, आप? ये ग्रामीण संस्कृति है। यहाँ तो हर कोई हर किसी के यहाँ धड़ल्ले से आ जा सकता है। आप तो शहरी संस्कृति थोपने की कोशिश कर रहे हैं यहाँ, इससे अलगाववाद बढ़ेगा” मैं प्रतिवाद पर उतर आया था।

“रे भुच्च। तुम भी फरीदाबाद में रहकर भक्तई करने लग गए अलगाव वाद – आतंकवाद?? टेकनोलोजी का फायदा क्या है? हमारी तो अब जवानी नहीं रही, लेकिन मान लो हम तुम्हारी काकी के साथ अभी विहार करते होते और ....”

“बस-बस खट्टर काका, बस! ” उन्हें रोकना पड़ा। खट्टर काका अभी नशे में थे इसलिए उन्हें अपनी जवानी की श्रृंगारिक स्मृतियों की ओर मुड़ने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता।” 

मैंने विषय परिवर्तन करते हुए पूछा, “आज जवारी भोज है। जब सारे लोग भोज खाने के लिए जाने की तैयारी में हैं, आप मछली चूड़ा फ्राई खा रहे हैं”। 

खट्टर काका बोले, “अष्टावक्र संहिता में लिखा है, कि वर्षा के तीन महीने गृहस्थों को सामूहिक भोज नहीं खाना चाहिए?”

“खट्टर काका ये आप क्या कह रहे हैं? आप तो स्वंय भोज संकृति के प्रेमी हैं...”

प्रतीकात्मक फोटो।

अब तक अन्दर से काकी दो कप निम्बू की चाय बनाकर ले आई थीं। खट्टर काका ने निम्बू की चाय को सुस्वर सुड़कते हुए कहा, “बरसात के तीन महीने सिर्फ सन्यासी और दरिद्र लोग सामूहिक भोज खा सकते हैं, जिन्हें कीड़े मकोड़े खाने की आदत होती है। गृहस्थों के लिए ये पाप है!”

हमारे लिए ये एकदम नया उद्घाटन था। “तो ये जो जवार भोज करते हैं, सो?” 

खट्टर काका ने चाय की उपसंहारी चुस्की लेते हुए कहा, “इधर का लोग सब साफ़ पगला गया है! हलवाई को बुलाकर, जहरीले चीनी तेल की बनी पूरी- सब्जी और कृत्रिम दूध की मिठाई खिला कर ये ब्राह्मण भोजन का पुण्य कमाना चाहते हैं। लेकिन इनको मिलता क्या है.. ब्रह्म हत्या का पाप!”

“क्या कह रहे खट्टर काका, ब्रह्म हत्या का पाप?”

“और क्या? इस गांव में अब तक छ लोग भोज खाकर मर गए’, पूरी मिथिला में एक सर्वे करवाओ, हर साल हजारों लोग सिर्फ भोज खाने से मरते होंगे! तो इन अकाल मृत्यु के पाप किसके सर जाएगा?”

भोज खाते-खाते जान गँवा देने वाले कई महापुरुषों की वीर गाथाएं मुझे मालूम थीं, मगर मैंने इस दृष्टि से उसके बारे में सोचा नहीं था। मन ही मन मैंने भोज खाने के नफा नुकसान के बारे में सोचा। खट्टर काका की बातें दिमाग में गूँज गईं - बरसाती कीड़ा, जहरीले तेल, कृत्रिम दूध, ऊपर से परोसने वाले का पसीना, नाखून का मैल...’ ज्यादा सोच नहीं पाया उबकाई आने लगी।

“तो इन भोजों पर प्रतिबन्ध लगे? क्या चाहते हैं आप?” 

“रे फेंकन, हम सब समझते हैं। तुम नए हो। ऊ था हरिमोहन। ये उसी का खेल था कि खट्टर काका को उकसा कर कुछ से कुछ बोलवा लो और उसको बाद में पोथी बनाकर छाप दो। लोग गाली तुमको थोड़ी न देंगे। हमें देंगे। लेकिन हम दुनिया में किसी से डरते नहीं हैं, एक तुम्हारी काकी को छोड़ कर। पूछ लिए तो सुनो। भोज भात एकदम बंद होना चाहिए। सामूहिक तो बिलकुल ही। जो खर्च लोग माँ बाप के श्राद्ध में करते हैं, उन पैसों से माँ बाप की सेवा करो, उपनयन का भोज बंद हो, वे सारे पैसे पढ़ाई पर खर्च हों..” खट्टर काका ने खटिया पर रखी अपनी झोरी से एक लौंग और दालचीनी का एक टुकड़ा निकाला और और उसे मुंह में डालते हुए कहा। 

“तो आप चाहते हैं ब्राह्मण भूखा रहे, मिथिला की संस्कृति नष्ट हो जाय, आपने तो हिन्दू धर्म से बैर मोल ले लिया लगता है!” मुझे खट्टर काका की पुरातन संस्कृति विरोधी बातें बुरी लग रही थीं।

खट्टर काका ने कहा, “इस मृत प्राय संस्कृति से इतना प्रेम है तो इधर मेरे दरवाजे पर कभी मत टपना”। उन्होंने खटिया से सोटा उठाते हुए कहा, “और अगर अगली बार आए तो टंगड़ी तोड़ देंगे।”

काकी आगे आ गईं और खट्टर काका के हाथ से सोटा छीनते हुए कहा, “क्या कर रहे हैं आप? ये सोटा चलाने की उमर है आपकी? इस गांव में तो सभी मूर्ख ही हैं, एक फेंकना को मार देने से सारे मूर्खों का संहार नहीं हो जाएगा। सोटा छोड़िये और फेसबुक पर अपनी बातें लिखिए।” 

हमने भी अपनी जान बचा समझ कर उठते हुए कहा, कोई बात नहीं फेसबुक पर हम लिख देंगे खट्टर काका की बात!”

“हाँ तो जाओ और मुझे भी टैग करना। एक भी गलत सलत लिखा तो देखना कि तुम्हरी क्या गत करते हैं।” 

भगवान बचाए खट्टर काका से.. खैर, उमर ज्यादा हो गई है, थोड़े से सिनिकल हो गए हैं।

  (श्याम आनंद झा की फेसबुक वाल से साभार।)





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